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पर्यवेक्षण विभाग

  
 

बैंककारी विनियमन अधिनियम 1949 के प्रावधानों के अंतर्गत, नाबार्ड को राज्य सहकारी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का निरीक्षण करने की सांविधिक जिम्मेदारी सौंपी गई है. इसके अतिरिक्त, नाबार्ड राज्य-स्तरीय सहकारी संस्थाओं जैसे राज्य सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंकों, शीर्षस्थ बुनकर समितियों, विपणन महासंघो आदि का निरीक्षण स्वैच्छिक आधार पर करता रहा है.

  
 

निरीक्षण के उद्देश्य

पर्यवेक्षण के माध्यम

पर्यवेक्षण की कार्य-नीति

वर्तमान बल-क्षेत्र

स्थलेतर / परोक्ष निगरानी पद्धति

पर्यवेक्षण बोर्ड

अन्य पहल

क्षेत्रीय कार्यालयों का ढ़ांचा

  

निरीक्षण के उद्देश्य

 

वर्तमान तथा भावी जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करना.

सुनिश्चित करना कि इन बैंकों द्वारा अपना कारोबार सम्बद्ध अधिनियमों / नियमों / विनियमों / नियमावली आदि के प्रावधानों के अनुसार किया जाता है.

सुनिश्चित करना कि नाबार्ड / भारतीय रिज़र्व बैंक / सरकार द्वारा बताए तथा जारी किए गए नियमों, दिशा-निर्देशों आदि का पालन किया जाता है.

बैंकों की वित्तीय सुदृढ़ता की जाँच-पड़ताल करना.

इन संस्थाओं को सुदृढ़ बनाने हेतु ऐसे तरीके सुझाना, जिन्हें अपनाकर वे ग्रामीण ऋण के क्षेत्र में अपनी भूमिका पहले से अधिक कुशलतापूर्वक निभा सकें.

पर्यवेक्षण के माध्यम

 

31 रास बैंकों, 367 जिमस बैंकों, 19 रासकृग्रावि बैंकों तथा 96 क्षेग्रा बैंकों (विलयन प्रक्रिया के अंतर्गत) एवं अन्य शीर्षस्थ सहकारी संस्थाओं का आवधिक प्रत्यक्ष निरीक्षण करना.

अनुपूरक मूल्यांकन

स्थलेतर / परोक्ष निगरानी पद्धति

संविभाग निरीक्षण / प्रणालियों का अध्ययन

पर्यवेक्षण की कार्य-नीति

 

बैंकिंग क्षेत्र के सुधारों के मद्देनज़र, वाणिज्यिक बैंकों को बदलते परिदृश्य में अधिक स्पर्धाशील तथा दीर्घकालिक बनाने के उ­ ÿñश्य से नए अन्तरराष्ट्रीय मानदण्ड तथा प्रथाएँ उन पर लागू की गई. भारत सरकार / भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा लागू किए गए वित्तीय सुधारों के मद्देनज़र उभर रहे बैंकिंग के माहौल में सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को भी कार्य करना था. तद्नुसार, अलग-अलग चरणों में मानदण्ड उन पर लागू किए गए. अभी पूँजी पर्याप्तता मानदंड इन बैंकों पर लागू नहीं किए गए हैं तथापि अन्य मानदण्ड अर्थात आय की पहचान, परिसम्पत्ति वर्गीकरण तथा प्रावधानन आदि जो रिज़र्व बैंक ने पहले वाणिज्यिक बैंकिंग क्षेत्र पर लागू किए थे, 1995-96 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों 1996-97 में राज्य सहकारी बैंकों जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों तथा 1997-98 में राज्य सहकारी कृषि व ग्रामीण विकास बैंकों पर लागू किए गए. नाबार्ड सुनिश्चित तथा समयबद्ध पर्यवेक्षक कार्यनीति के द्वारा बैंकों को मदद करता है कि वे नए वित्तीय अनुशासन के अनुसार चल सकें ताकि निर्धारित विवेकपूर्ण मानदण्ड को व्यवहार में उतारा जा सके.

वर्तमान बल :

संशोधित कार्यनीति के अंतर्गत नाबार्ड ने निरीक्षण में, बैंक के प्रमुख /मूल कार्यों जैसे पूँजी पर्याप्तता, आस्तियों की गुणवत्ता प्रबंधन, आय, तरलता तथा पद्धतियाँ का अनुपालन आदि पर पहले से अधिक ध्यान केनवन्द्रत किया गया. इस प्रकार अपने प्रत्यक्ष सांविधिक निरीक्षणों में नाबार्ड ने मूल मूल्यांकन पर बल दिया है. संपार्श्विक मूल्यांकन अनुपूरक निरीक्षणों के लिए छोड़ दिया गया. सूक्ष्म-स्तर के पहलुओं पर ध्यान, बैंक स्वयं अपने आन्तरिक निरीक्षण में देंगे या अन्य अभिकरण जैसे लेखा-परीक्षक. इस दिशा में, नाबार्ड ने सहकारी बैंकों के मुख्य कार्यपालक तथा मुख्य लेखा-परीक्षकों के साथ समय-समय पर कार्यशालाएं तथा बैठकें आयोजित करके यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि बैंकों की कार्यप्रणाली के अन्य पहलू जैसे आन्तरिक जाँच व नियन्त्रण प्रणालियाँ, राजस्व तथा ऋण व जमाराशियाँ पर ब्याज के रूप में आय की वसूली तथा सामान्य बैंकिंग लेन-देन करने संबंधी नेमी पद्धतियाँ को संबंद्ध बैंक तथा उनकी संगामी / सांविधिक लेखा-परीक्षा प्रणालियों में अपनाई जा रहीं थी.

स्थलेतर निगरानी पद्धति

पर्यवेक्षण की नई कार्यनीति के अंतर्गत प्रत्यक्ष निरीक्षण के अनुपूरक के रूप में अप्रत्यक्ष / स्थलेतर निगरानी पद्धति लागू की गई है. इसके उ­ेश्य सतत आधार पर महत्वूपर्ण आंकड़े प्राप्त करना व उनका विश्लेषण करना पर्यवेक्षण संबंधी गम्भीर म­ों की पहचान करना तथा ऐसे मामलों जिनकी ओर गहन ध्यान दिए जाने की जरूरत है, के संबंध में चेतावनी संकेत देना. इस प्रणाली के अन्तर्गत मूलत:, सहकारी बैंकों तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की सांविधिक तथा गैर-सांविधिक विवरणियों के आधार पर उनकी कार्यप्रणाली की डेस्क-संविक्षा की जाती है. जहाँ समय-समय पर किए जाने वाले प्रत्येक्ष निरीक्षणों से निर्धारित अवधि में बैंकों के कार्यनिष्पादन का समग्र मूल्यांकन करने का प्रयास किया जाता है, वही अप्रत्यक्ष / स्थलेतर निगरानी पद्धति के द्वारा लगातार पर्यवेक्षण किया जाता है और यह पद्धति प्रत्यक्ष निरीक्षण के अनुपूरक के रूप में कार्य करती है.

पर्यवेक्षण बोर्ड (रास./जिमस बैंकों तथा क्षेग्रा बैंकों के लिए)

नाबार्ड अधिनियम 1981 की धारा 13(3) के अन्तर्गत पर्यवेक्षण बोर्ड ( रास / जिमस/ क्षेग्रा बैंकों के लिए) का गठन निदेशक मंडल की आन्तरिक समिति के रूप में किया गया है. पर्यवेक्षण बोर्ड के अधिकार तथा कार्य मोटे तौर पर निम्नानुसार हैं -

निरीक्षण पर्यवेक्षण संबंधी नीतिगत मामलों के संबंध में निर्देश तथा मार्गदर्शन देना, निरीक्षण के निष्कर्षों की समीक्षा करना तथा समुचित सुधारात्मक उपायों के सुझाव देना.

धोखाधड़ी तथा आन्तरिक जाँच व नियंत्रण संबंधी मामलों पर, पर्यवेक्षण बोर्ड द्वारा की गई अनुवर्ती कार्रवाई की समीक्षा करना.

सहकारी बैंकों / क्षेग्रा बैंकों की कार्यप्रणाली में उभर रहे पर्यवेक्षण संबंधी मु­ ों जैसे गैर-निष्पादक आस्तियाँ वसूली, निवेश संविभाग, ऋण अनुप्रवर्तन व्यवस्था प्रबंधन प्रथाएँ, धोखाधड़ी के मामले आदि की पहचान करना.

यथावश्यक अनुवर्ती कार्रवाई के उपाय सुझाना.

नाबार्ड के निरीक्षण-कर्ता अधिकारियों को यथावश्यक कौशल तथा ज्ञान देने के

उ­द्देश्य से समुचित प्रशिक्षण के बारे में सिफ़ारिशें करना.

पर्यवेक्षण विभाग के सुदृढ़ बनाने हेतु उपाय सुझाना.

बोर्ड के अधिक्रमण, भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा लाइसेन्स देने से इनकार आदि के संबंध में निदेशों तथा अन्य विनियामक कार्रवाई की सिफारिशें करना.

किए गए निरीक्षणों तथा उनकी रिपोर्टों की गुणवत्ता का पर्यवेक्षण करना.

स्थलेतर निगरानी व अन्य अनुपूरक तरीकों से प्राप्त जानकारी तथा उन पर की गई कार्रवाई की समीक्षा करना.

नाबार्ड के निदेशक मंडल द्वारा समय-समय पर सौंपे गए अन्य कार्य, जो भी हो, करना.

पर्यवेक्षण बोर्ड ने अपनी स्थापना के समय अर्थात 20 नवम्बर, 1999 से 30 जुन, 2006 तक 33 बैठकें आयोजित की हैं और उनमें सहकारी बैंकों तथा क्षेग्रा बैंकों के कार्य-निष्पादन की समीक्षा की है. पर्यवेक्षण बोर्ड के प्रेक्षणों (अब्ज़रवेशन्स) के आधार पर संबंद्ध प्राधिकारियों को कमियों से अवगत करा दिया गया है ताकि वे यथावश्यक सुधार-उपाय कर सकें और भारतीय रिज़र्व बैंक के यथोचित विनियामक कार्रवाई करने हेतु संस्तुतियाँ की जा सकें.

अन्य पहलें

पर्यवेक्षित बैंकों की दैनन्दिन कार्यप्रणाली का अनुप्रवर्तन भारतीय रिज़र्व बैंक / नाबार्ड द्वारा निर्धारित विभिन्न सांविधिक विवरणियों, जिनमें स्थलेतर निगरानी की विवरणियाँ भी शामिल हैं, के आधार पर किया जाता है.

पर्यवेक्षण के नीतिगत तथा परिचालनगत मामलों पर चर्चा करने हेतु समय-समय पर ग्रामीण आयोजना व ऋण विभाग, भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ बैठकें आयोजित की जाती हैं.

राज्य स्तर पर पंजीयक सहकारी समितियाँ, शीर्षस्थ बैंक, सहकारित व वित्त विभाग, राज्य सरकार, लेखा-परीक्षा निदेशक तथा बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1937 की धारा II (यथा ) का अनुपालन न कर रहे बैंकों आदि के प्रतिनिधियों सहित इस प्रकार के समूह गठित किए गए हैं ताकि उनकी बैठकों में धारा (II) का अनुपालन न करने वाले बैंकों के संबंध में यथोचित कार्यनीति बनाई जा सके और उन बैंकों द्वारा बनाई गई कार्य-योजना का अनुप्रवर्तन किया जा सके और इस प्रकार वे धारा (II) का अनुपालन फिर से कर सकें.

समय-समय पर नाबार्ड के प्रबंध निदेशक, शीर्षस्थ बैंकों, पंजीयक सहकारी समितियाँ, राज्य सरकार आदि से विचार-विमर्श किया जाता है.

क्षेत्रीय कार्यालयों का ढाँचा

क्षेत्रीय कार्यालयों के स्तर पर पर्यवेक्षण अनुभागों में यथोचित तथा पर्याप्त संख्या में अधिकारी पर्याप्त किए जाते हैं जो पर्यवेक्षण विभाग, प्रधान कार्यालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार संपर्क करें. बैंकों का निरीक्षण, निरीक्षण रिपोर्टें जारी करने, अनुवर्ती कार्रवाई जैसे समीक्षा, अनुप्रवर्तन, अनुपालना तथा स्थलेतर निगरानी आदि का कार्य देखते हैं.

  
 

हमें संपर्क करें

  
प्रभारी अधिकारी
  
(i)नाम:

श्री जी सी. पाणीग्रही

(ii)पदनाम:मुख्य महाप्रबंधक
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(b)ई-मेल आईडी:dos@nabard.org
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