भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा श्री बी शिवरामन की अध्यक्षता में कृषि के लिए संस्थागत ऋण की समीक्षा हेतु गठित समिति (क्राफिकार्ड) नें 28 नवंबर 1979 को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में नाबार्ड की स्थापना की अनुशंसा की थी. संसद ने 81 के अपने अधिनियम सं 61 के माध्यम से इसकी स्थापना का अनुमोदन किया.
मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा के बाद समिति इस निष्कर्ष पर पहुँची कि समेकित ग्रामीण विकास हेतु अपनाई जाने वाली कार्यनीति के संदर्भ में ऋण कार्यकलापों के समेकन का अपेक्षित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक नई व्यवस्था करनी होगी. ग्रामीण विकास हेतु ऋण की अत्यधिक आवश्यकता तथा एक निश्चित समय सीमा में ग्रामीण इलाकों के कमज़ोर वर्गों का विकास करने की आवश्यकता की पृष्ठभूमि में इस व्यवस्था के लिए एक अलग संस्था की स्थापना की आवश्यकता प्रकट की गई. मौद्रिक एवं ऋण विनियमन के मामलों में केन्द्रीय बैंक के रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक के पास अनेक मूलभूत कार्यों की ज़िम्मेदारी थी जिसकी वजह से वह ऋण की उभरती हुई जटिल समस्याओं पर एकनिष्ठ ध्यान केन्द्रित करने की स्थिति में नहीं था. इस स्थिति के कारण नाबार्ड की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ.
क्राफिकार्ड ने एक नए बैंक की स्थापना के माध्यम से कृषि के क्षेत्र में अल्पावधि, मध्यावधि एवं दीर्घावधि ऋण संरचना का एकीकरण करना भी उचित समझा. इस अनुशंसा का परिणाम है - नाबार्ड. इसकी स्थापना रु. 100 करोड़ की प्रारंभिक पूँजी के साथ की गई थी जिसे बढ़ाकर रु. 2,000 करोड़ कर दिया गया. यह पूँजी पूरी तरह भारत सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा अभिदत्त है.
National Bank for Agriculture and Rural Development