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National Bank for Agriculture and Rural Development
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परिचय

उऎर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हमारे देश के समग्र आर्थिक विकास हेतु अत्यन्त महत्वपूर्ण है.  अंतरराष्ट्रीय बाजार में फॉसइल फुएल की अनिश्चित आपूर्ति एवं बार-बार मूल्य में बढोत्तरी के मददेनजर नवीकरण योग्य, सुरक्षित एवं अप्रदूषित उऎर्जा की वैकल्पिक स्रोत की खोज की आवश्यकता प्राथमिकता प्राप्त कर रही है.  बायोडिजल के रूप में तेल उत्पादन करनेवाली उऎर्जा की स्रोतों की अनेक प्रजातियों में पोंगामिआ पिन्नाटा को उसके विभिन्न अनुकूल गुण जैसे इसकी कठोर प्रकृति, उच्च तेल वसूली एवं गुणवत्ता आदि के कारण सर्वाधिक उपयुक्त प्रजातियों में एक माना गया है.  इसके पौधे को संयुक्त वन प्रबंधन, किसान की क्षेत्र मेड़, बंजरभूमि/परती भूमियों के माध्यम से निम्नकोटि की जमीन पर रोपा जा सकता है.

देश में पोंगामिआ तेल के उत्पादन से कई मिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा की बचत होगी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे.

कृषि एवं ग्रामीण ऋण के क्षेत्र में पॉलिसी बनाने एवं आयोजना व परिचालन के मामले में एक शीर्ष संस्था के रूप में नाबार्ड, अन्य वित्तीय संस्थाओं के साथ मिलकर ग्रामीण क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा विकास के लिए ऋण प्रदान करने में सक्रिय रूप से शामिल हैं. ऊर्जा रोपण, बायोडीजल फसल/वृक्ष जात तेलहन के माध्यम से बंजरभूमियों की विकास को एक बल क्षेत्र के रूप में चुना गया है जिसके लिए नाबार्ड बैंकों को रियायती ब्याज दर पर 100% पुनर्वित्त प्रदान कर रहा है.

2. वितरण

पोंगामिआ पिन्नाटा फैबेशॅ (पैपिलियनेशॅ) परिवार का है. इसे डेरिस इंडिका एवं पोंगामिआ ग्लैब्रा के नाम से भी पुकारा जाता है.  छाया के लिए इस पेड का रोपण किया जाता है और इसका विकास एक सजावटी पेड के रूप में होता है.  यह कुछ नाइट्रोजॅन फिक्सिंन पेडों में से एक है जो ऐसे बीज पैदा करते हैं जिसमें 30-40% तेल होती हैं. प्राकृतिक रूप से यह नदियों और तटों के किनारे उगता है और एशिया महाद्वीप में होता है.  इसे सड़कों, नहरों के किनारे और खुली फार्म भूमि पर भी उगाया जाता है.

2.2. परिस्थिति - विज्ञान

पोंगामिआ का जन्म आर्द्र एवं उपोष्णीय पर्यावरण में होता है जहांॅ का अधिकतम तापमान 270 से 380 सेल्सीयस एवं न्यूनतम तापमान 1o से 160o सेल्सीयस है. जिन क्षेत्रों में वार्षिक वृष्टि 500 से 2500 मिमी तक होती है वहाँ पोंगामिआ खूब फलता-फूलता है.  परिपक्व पोंेगामिआ वृक्ष जल प्लावन एवं हल्के पाले का सामना कर सकते हैं.  ये प्रजातियां 1200 मीटर की ऊँचाई तक बढते हैं.

2.3. मृदा

पोंगामिआ कई प्रकार की मिटि्टयों यानी पत्थरी से लेकर रेतीली व मटियार मिट्टी में भी उगाई जा सकती है.  परन्तु शुष्क बालू पर इसका उत्पादन अच्छा नहीं होता. खारापन के प्रति यह अत्यधिक उदार है. नहरों अथवा समुद्र किनारों पर स्वच्छ अथवा नमक पानी में इनका उगना सामान्य सी बात है.  सुनिश्चित आर्द्रता के साथ अच्छी तरह से निष्कासित मिटि्टयों पर इसकी सर्वाधिक विकास देखी जाती है.
 

3.  वानस्पतिक विशेषताएंॅ

इन पेडों के छाल नरम, धूसर एवं पतले होते है. इसके पत्ते छोटे-छोटे, आयातकार,आमने सामने 5-9 संख्या में,अरोमिल चमकीले हरे रंग के होते हैं और पर्णवृन्त 4-5 सेंटीमीटर लम्बे होते हैं. कांख संबंधी असीमाक्ष पुष्प समूह पत्तों से भी छोटे एवं लगभग 20 सेंटीमीटर लंबाई के होते हैं. फूल एक सेमी के एकव्यासीय, अंतर्वक होते हैं. फली आयाताकार, 3-6 सेमी लंबी और 2-3 सेमी चौडी होती हैं जिसका छिलका मोटा, काष्ठीय एवं दबा हुआ होता है.पोंगामिआ रोपण के चौथे अथवा पाँचवे वर्ष में उसमें फूल आने लगते हैं. अप्रैल से जुलाई के बीच इसके कांख असीमाक्ष में सफेद व बैंगनी रंग के फूल  आते हैं.

अण्डाशय के दो अण्डों में से केवल एक अण्डा अनिवार्यत: बीज में बदलेगा.  गर्भाधान / निषेचन के पश्चात् पहले निषेचित अण्डा स्ट्रांग सिंक एक्टिविटी द्वारा बाद में आनेवाले अण्डे का निरोध करती हैं. भ्रूण का गर्भपात सिब्लिंग स्पर्धा के कारण होता है.

फली की लम्बाई 4.5 सेन्टीमीटर एवं चौडाई 1.5 - 2.5 सेन्टीमीटर होती है और इसके दोनों छोर नुकीले होते हैं तथा जब ये पक जाती हैं तब आपीत धूसर दिखती है और उसमें 1 अथवा 2 बीज होते हैं.  ये बीज अण्डाकार, वृक्काकार, सम्पीडित, रक्तिम भूरा, पूरी तरह से शख्त, 2-3 सेंटीमीटर लम्बी होती हैं.  ये फली अनुवर्ती साल में फरवरी से मई के बीच पक जाती हैं.

4. व्यावसायिक उपयोग

(i) तेल- अखाद्य तेल, जिसका व्यावसायिक नाम 'करंजा तेल' है तथा जो अपनी औषधीय गुणों वऎे कारण जानी जाती है, निकालने वऎे लिए व्यापक रूप से बीजों का दोहन किया जाता है.  विभिन्न आयु के वृक्षों पर 9 से लेकर 90 किलोग्राम तक वहाँ फल उत्पन्न होते हैं. वहाँ पर बीजों वहाँ संग्रहण की कोई सुव्यवस्थित तरीका नहीं है. विभिन्न बीजों में 95% गरी/दाने (कॅ:नॅल) एवं लगभग 27.0% तेल होती हैं.  तेल निष्कासन के लिए निष्कासन यन्त्रों का उपयोग कर दानों से लगभग 24 से 26.5% तक तेल निकाला जा सकता है परन्तु गाँव के कोल्हू से केवल 18-22% तेल निकलते हैं.  कच्चे तेल का रंग पीला, नारंगी व भूरा होती हैं और ये रंग तेल के रखे रहने पर और भी गहरे हो जाते हैं.  इसका स्वाद कडुआ होता है और गंध अरुचिकर होती हैं जिसके लिए इस तेल को खाया नहीं जाता.

इस तेल का उपयोग खाना बनाने एवं लैम्प में डालने के लिए इंर्धन के रूप में किया जाता है.  चिकनाई, वाटर-पेंट बाइंडर, कीटनाशक, साबुन बनाने एवं चमडे बनाने की उद्योगों में भी इस तेल का उपयोग किया जाता है.  गठिया तथा मनुष्य एवं जानवरों के कई चर्म रोगों के उपचार के लिए औषधियाँ बनाने में इस तेल का उपयोग किया जाता है जो विशेष महत्व रखता है.  धवल रोग अथवा खुजली से प्रभावित चर्म रोग की वर्णकता बढाने में यह कारगर है.

(ii) लकडी - प्रति किलोग्राम 4600-4800 केसीएल तापजनक/ऊष्मीय मूल्य के साथ पोंगामिआ का उपयोग आमतौर पर जलावन लकडी के रूप में किया जाता है.  फिर भी यह टिकाउऎ नहीं होती, जल्दी इस पर कीडे लग जाते हैं एवं आरी से इसके दो टुकडे आसानी से किये जा सकते हैं.  इस लिए इमारत बनाने में इस लकडी का उपयोग अच्छा नहीं माना जाता है.  कैबिनेट, गाडी वऎे पहिये, पोस्ट, कृषि उपकरण, हथियारों के दस्ते एवं कंघी आदि बनाने इस लकडी का उपयोग किया जाता है.

(iii) चारा एवं आहार - चारे के रूप में इन प्रजातियों की उपयोगिता के बारे में भिन्न भिन्न मत हैं. रिपोर्ट के अनुसार कुछ स्थानों पर ये पत्ते बछडों एवं बकरियों द्वारा खाये जाते हैं.  फिर भी, कई इलाकों में ये पत्ते आमतौर पर कृषि जानवरों द्वारा नहीं खाये जाते.  शुष्क क्षेत्रों में इन पत्तों का उपयोग विशेषकर चारे के रूप में होता है.  बीजों से तेल निकालने के पश्चात् बाकी बचे अवशिष्ट यानी प्रेसकेक का उपयोग पोल्ट्री आहार के रूप में किया जाता है.

(iv) अन्य उपयोग - इसके पत्ते एवं प्रेसकेक मिट्टी में मिल जाने पर मिट्टी की उर्वरता बढ जाती है.  इसके सूखे पत्तों का उपयोग भंडार में रखे नये अनाजों को कीडों से बचाने के लिए किया जाता है.  मिट्टी में प्रेसकेक का प्रयोग करने पर यह कीटनाशक का काम करती है विशेषकर गोलकृमियों का नाश करती है. 

पोंगामिआ एक सूखा प्रतिरोधी, नाइट्रोजन फिक्सिंग फलीदार वृक्ष है.  यह लवण सहिष्णु भी है और कुछ हद तक हल्के तुषारपात को सहने की क्षमता भी इसमें है.  यह एक अच्छा छायादार पेड है.  इस पेड की छाया ठंडक देती है एवं स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती है. 

प्रायत:  पोंगामिआ का रोपण छायादार अथवा सजावटी वृक्ष के रूप में वासभूमि पर एवं रास्तों व नहरों के किनारों पर किया जाता है.  जब छायादार अथवा सजावटी वृक्ष के रूप में इसका रोपण किया जाता है तब कांड की उपयुक्त उऎंॅचाई प्राप्त करने के लिए इसके शाखाओं की छंॅटाई की आवश्यकता पड सकती है.  इन पेडों के पार्श्व जडों की सघन नेटवर्क के कारण ये मृदा क्षरण पर नियंत्रण रखते हैं एवं बालू के टीलों को बांधे रखते हैं जिसके लिए इन प्रजातियों को अधिमान्यता दी जाती हैं.  इसके जड, छाल, पत्ते, रस एवं फूलों में औषधीय गुण है.  पोंगामिआ कृषि वानिकी के लिए अनुपयुक्त है कारण यह अत्यधिक मात्रा में जड चुसकी (रूट सकर) पैदा करते हैं.  इसका रोपण विशेषकर वन एवं वनेतर बंजरभूमि एवं कम्युनिटी भूमि आदि पर किया जाना चाहिए.

5.1. बीज संग्रहण एवं भंडारण

पोंगामिआ को बडी सहजता से सीधे बुवाई द्वारा अथवा नर्सरी में बढी पौधों के रोपण द्वारा अथवा 1-2 सेन्टीमीटर व्यास का स्टम्प काट कर रोपा जा सकता है.  शाखा काट कर एवं जड चूसक द्वारा इसे फैलाया भी जा सकता है.  प्रायद्वीपीय भारत में बुवाई का सीजन अप्रैल से जून तक है और प्रति वृक्ष में लगभग 10 किलोग्राम से लेकर 50 किलोग्राम से अधिक की बीज पैदा होती हैं.  प्रति किलोग्राम में 1500-1700 बीज होते हैं. पॉड सूरज की किरणों से सूख जाती हैंं और फलों से बीज निकाली जाती हैं. इन बीजों को फ्रूट शेल के साथ हवा-बन्द डिब्बों में / 5 डिग्री सेल्सीयस में बन्द रखने पर लगभग एक साल तक इनका उपयोग किया जा सकता है.

5.2. बीज अंकुरण

आमतौर पर बुवाई से पूर्व बीजों की किसी भी प्रकार की पूर्व उपचार करने की जरूरत नहीं पडती है.  परन्तु 5 मिनट के लिए बीजों को गरम पानी में डुबो कर रखने से बीजों की अंकुरण प्रतिशत एवं क्षमता में वृद्धि होती है.  निम्नाभिमुखी बीजाण्डद्वार (माइव्रऎोपाइल) के साथ बियाड (सीड बेड) / पॉली पॉट / सैण्ड ट्रे में बीजों की बुवाई की जाती हैं. बुवाई के दो सप्ताहों के भीतर बीज अंकुरित हो जाती हैं. अपने विकास की पहली मौसम में पौध 25-30 सेन्टीमीटर ऊँची हो जाती हैं. अगले वर्षा ऋतु में, जब पौधें 60 सेंटीमीटर की हो जाती हैं, तब पौधों को भूमि पर रोपी जाती है. पौधों की वृहत् जड पद्धति होती है.  रोपण के समय पौधों की जडों पर मिट्टी लगी रहनी चाहिए. पौधों को जीवित रखने एवं उनके अच्छे विकास के लिए यह आवश्यक है कि रोपण के पश्चात् प्रथम तीन सालों के लिए प्रत्येक वर्ष खरपतवार पर नियंत्रण रखा जाए. इन पौधों के रोपण के लिए रोपण मान में 5मी x 4मी के अंतराल पर 30 सेंटीमीटर का गड्ढा खोदना समीचीन है.

रास्तों/रास्तों के किनारे पर पौधा रोपण के लिए पौधों के बीच लगभग 8 मीटर की दूरी होनी चाहिए.  थोक में पौधा रोपण के क्षेत्र में पौधों के बीच दूरी 2 x 2 मीटर से लेकर 5 x 4 मीटर के बीच हो सकती हैं.  पोंगम पौधे छाया मे अच्छी तरह बढती हैं एवं इन पौधों को विद्यमान वृक्षों के स्टैण्ड में अन्त:रोपण किया जा सकता है.  नर्सरी एवं फील्ड में उपकारी पोंगामिआ पौधों पर जड ग्रन्थिकाओं का होना आम सी बात है.

5.3. छंटाई

बुवाई एवं रोपण के प्रथम 3-4 सालों के लिए प्रत्येक वर्ष दो या तीन बार छंटाई की आवश्यकता पडती है.

5.4. कीट एवं रोग

पोंगामिआ अनेक कीटों एवं रोगों को आकर्षित करता है.  ऐसे कीडों की लगभग 30 प्रतिशत प्रजातियाँ हैं जो सीमान्त भूमि पर आम तौर पर मार्गों व पट्टों पर उगे पोंगामिआ को हानि पहुंॅचाते हैं.  इनमें गल इन्डुसर्स, लीफ माइनर्स, फेलिएज फीडर्स, शूट बोर्स, सैप सकर्स, फ्लावर फीडर्स एवं फ्रुट सीज बोरर्स शामिल हैं. इनमें गल इन्डुसर्स एवं लीफ माइनर्स को उनकी विनाशक क्षमता एवं सर्वव्यापक उपस्थिति वऎे कारण प्रमुख स्थान प्राप्त है.

6.0. इकाई लागत

प्रति हेक्टेयर 5 मी x 4 मी फासले पर एक हेक्टेयर में पोंगामिआ पिन्नाटा की खेती की लागत प्रति हेक्टेयर (असिंचित स्थिति) लगभग रु.25080 है.  व्यय की विभिन्न मदों के ब्यौरे हैं - भूमि की तैयारी, जुताई, गढ्ढों की खुदाई, पौधा एवं सामग्री, खाद एवं उर्वरक, गुडाई, पौधों को पानी देना एवं उन्हें सुरक्षित रखना आदि.  पोंगामिआ पिन्नाटा रोपण की इकाई लागत संबंधी विवरण अनुबंध-। में दिये गये हैं.

7.0. वित्तीय विश्लेषण

पौधा छठवें साल से उपज देता है और साल वार साल लाभों में इजाफा होता जाता है जो दसवें साल में स्थिर हो जाता है (अनुबंध-।।).  निवेश लागत एवं उपजों की उपर्युक्त मापदण्डों के साथ वित्तीय विश्लेषण किया गया है.  बीसीआर एवं आईआरआर क्रमश: 1:47:1 एवं 22.39  है.  विस्तृत विवरण अनुबंध-।।। में दिये गये हैं.

8.0. उधार की शर्त्तें

8.1. मार्जिन राशि

लाभार्थी अपने वर्ग यानी लघु एवं अन्य किसान के अनुरुप नाबार्ड के मानदण्डों के अनुसार 5 से 25% के बीच अपना न्यूनतम अंशदान (डाउन पेमेंट) करेगा. लाभार्थी का अपना श्रम भी मार्जिन राशि आवश्यकता की ओर उसका अंशदान माना जाएगा.  वर्तमान मॉडल परियोजना के मामले में विभिन्न वित्तीय संकेतकों के परिकलन के लिए मार्जिन राशि 10% रखा गया है.

8.2. ब्याज की दर
नाबार्ड से प्राप्त पुनर्वित्त पर ब्याज दर का निर्धारण नाबार्ड द्वारा समय-समय पर जारी परिपत्रों के अनुसार होगा.  वित्तपोषक बैंक के निर्णय के आधार पर अंतिम उधारकर्ता पर ब्याज दर लागू की जाएगी.  फिर भी, मॉडल परियोजना की वित्तीय लाभप्रदता एवं बैंक साध्यता का परिकलन करने के लिए हमने 12% ब्याज दर मान लिया है.

 

8.3.  पुनर्वित्त की मात्रा

बंजर भूमि विकास परियोजना के तहत जिन वैयक्तिक किसानों एवं / अथवा व्यक्तियों के समूहों जैसे सहकारी समितियों को बैंकों द्वारा ऋण प्रदान किये गये हैं वे नाबार्ड से बैंक ऋण का 100% तक पुनर्वित्त प्राप्त करने के पात्र हैं.

8.4. ऋण की चुकौती

चुकौती अवधि निर्धारित करते समय उसमें पांॅच वर्षों की तैयारी अवधि (गेस्टेशॅन अवधि) शामिल किया जा सकता है.  मूल धन एवं ब्याज की चुकौती छठे साल से शुरु होगी जबकि ऋण की पूरी चुकौती 10 साल में होगी.

 

 

 

 

 
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
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