ग्रामीण आधारभूत सुविधा विकास निधि - एक मूल्यांकन अध्ययन - अध्ययन रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
आरआईडीएफ का व्यापक स्तर पर नीति, कार्यक्रम और कार्य निष्पादन मूल्यांकन अध्ययन करने हेतु भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम), बेंगलूरु को अध्ययन का कार्य सौंपा गया. अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष नीचे दिए जा रहे हैं.
- ग्रामीण आधारभूत ढांचे के विकास में आरआईडीएफ ने उल्लेखनीय योगदान किया है. अखिल भारतीय स्तर पर अब तक 117.84 लाख हेक्टेयर की सिंचाई संभावनाओं का सृजन किया गया है. ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 64,16,010 श्रमदिवसों तक का आवर्ती रोजगार सृजित किया गया है. मार्च 2007 के अंत तक सिंचाई क्षेत्र में लगभग 1,736 मिलियन तक के श्रमदिवसों का गैर-आवर्ती रोजगार सृजित किया गया. 1995-2007 की अवधि के दौरान सिंचाई में निवेश से हुए वृद्धिशील उत्पादन का मूल्य रु.13,539 करोड़ आकलित किया गया.
- सेक्टरवार आबंटनों के मामले में, सिंचाई और सड़क सेक्टरों को निधियों का अधिकांश हिस्सा प्राप्त हुआ. आस्ति आधारित/ सेक्टर आधारित निवेशों के रूप में वर्गीकृत करने पर यह पाया गया है कि सभी वर्गीकरणों में इन सेक्टरों को पर्याप्त हिस्सा मिला है. सेक्टोरल और परियोजनावार बल कमोबेश निधि के दिशानिर्देशों के अनुरूप रहा.
- सड़कों की बेहतर स्थिति के लिए परियोजना वित्तपोषण और प्रबंधन में नाबार्ड की भूमिका को सहायक माना गया. सड़क और सिंचाई परियोजनाओं दोनों परियोजनाओं के मामलों में अधिकारियों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने यह बताया है कि अन्य परियोजनाओं की तुलना में नाबार्ड की परियोजनाएँ शीघ्र पूरी होती हैं क्योंकि नाबार्ड की प्रणालियाँ सुव्यवस्थित होती हैं
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- गुणवत्ता और लागत से संबंधित मानदंड उच्च स्तर के थे, और कार्यस्थलों के नियमित निरीक्षणों के कारण ठेकेदारों और अन्यों ने भी इन मानदंडों का बेहतर रूप से अनुपालन किया. इन सड़कों के फलस्वरूप कृषि, गैर-कृषि क्षेत्र और वाणिज्यिक कार्यकलापों में समग्र विकास हुआ. एक उल्लेखनीय निष्कर्ष यह सामने आया जो योजनाकारों के लिए रुचिकर हो सकता है कि इससे राज्यों द्वारा प्रदान की जा रही सेवाओं तक पहुँच बेहतर हुई है और सेवाओं की डिलीवरी भी बेहतर हुई है क्योंकि अब कार्यकर्ताओं की इन स्थानों तक पहुँच आसान हो गई है. सिंचाई के क्षेत्र में भी इसी प्रकार की टिप्पणियाँ की गईं. परियोजनाओं की समय पर पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सुव्यवस्थित निधि प्रवाह एक उल्लेखनीय कारक के रूप में उभर कर आया है. इन परियोजनाओं के कारण भूमि की कीमतों में जोरदार उछाल आया है.
- अध्ययन से यह पाया गया है कि परियोजनाओं के कार्यान्वयन के पश्चात् कृषि और अन्य ऋणों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. इससे यह बात उजागर हुई कि ग्रामीण आधारभूत ढांचे के निर्माण से आय सृजन के जोखिमों में कमी और भूमि के समानांतर मूल्य में वृद्धि द्वारा स्थानीय क्षेत्रों के साथ-साथ उधारकर्ताओं को भी ऋण प्राप्त करने योग्य बनाने में सहायता मिलती है.
- आरआईडीएफ के प्रबंधन पर होने वाले व्ययों की पूर्ति करने हेतु नाबार्ड प्रबंधन शुल्क के रूप में निधि की 0.5 प्रतिशत की राशि प्रभारित करता है. नाबार्ड इस सीमा में रहकर ही अति दक्षता से प्रबंध करने का प्रयास कर रहा है. उधार लेने और उधार देने व प्रबंधन शुल्क के बीच की कीमत-लागत अंतर राशि को नाबार्ड आदिवासी विकास निधि (टीडीएफ) हेतु आबंटित कर देता है. यह काफी सराहनीय बात है. इसे वित्तीय समावेशन में सुधार लाने हेतु नाबार्ड द्वारा गठित वित्तीय समावेशन निधि (एफआईएफ) और वित्तीय समावेशन प्रौद्योगिकी निधि (एफआईटीएफ) में अंतरित किए जाने की अनुमति भी दी जा सकती है. वित्तीय समावेशन में सुधार भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के लिए भी प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र है
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- आरआईडीएफ की समूह निधि के संबंध में प्रत्येक वर्ष बजट के माध्यम से घोषणा की जाती है अतः इसकी प्रमात्रा के संबंध में अनिश्चितता की स्थिति बनी रहती है. यदि केन्द्र सरकार एक-साथ तीन वर्ष के लिए इस निधि हेतु वचनबद्धता दे तो यह काफी सहायक हो सकता है. यह वचनबद्धता न्यूनतम होगी और यदि किसी वर्ष कृषि उधारीकरण में कमी बढ़ जाती है, तो वित्त मंत्रालय अधिक राशि का आबंटन कर सकता है. निधि को स्थिरता प्रदान करने से लंबे समय के लिए योजना बनाने और निधि की समग्र दिशा और कार्यक्षमता में सुधार लाने में मदद मिलेगी.
- आरआईडीएफ के प्रबंधन के लिए नाबार्ड ने संगठनात्मक प्रक्रियाओं के धरातल पर सृजित इंटैंजिबुलों, परियोजना स्वीकृति समिति (पीएससी) और राज्य स्तर पर अन्य उच्च स्तरीय समितियों (एचपीसी), ग्रामीण आधारभूत परियोजना मूल्यांकन और प्रबंधन कौशलों आदि जैसी संगठनात्मक पूँजियों का सृजन किया है. इस पर ध्यान देना अति आवश्यक है
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- पीएससी सबसे शीर्ष स्तर की समिति है जिसमें नाबार्ड, भारतीय रिजर्व बैंक, राज्यों और केन्द्र सरकार के उच्च स्तरीय प्रतिनिधि शामिल रहते हैं. पीएससी आरआईडीएफ के कार्यान्वयन के क्षेत्र में एक सबसे बड़ी ताकत है. यह नीति बनाने और परियोजनाएँ मंजूर करने वाली निकाय है. उच्च स्तरीय होने के कारण यह समिति वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण रखती है और राज्यों और सेक्टरों दोनों के बीच न्यायसंगत और निष्पक्ष आबंटन प्रणाली अपनाने का प्रयास करती है. निधि के लिए समिति द्वारा तय किए गए मानदंड ही न्यायोचित वितरण के प्रति उसकी गम्भीरता को व्यक्त करते हैं. समिति यह सुनिश्चित करती है कि कार्यक्रम की समग्र देखरेख त्रुटिरहित हो.
- नाबार्ड ने प्रस्तावों के प्रस्तुतीकरण हेतु प्रमुख सेक्टरों के लिए सुव्यवस्थित और विस्तृत फार्मेट डिजाइन किए हैं. फार्मेट इन सेक्टरों के विशेष लक्षणों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं. तकनीकी मूल्यांकन परामर्शदाताओं द्वारा और वित्तीय मूल्यांकन नाबार्ड के अधिकारियों द्वारा किया जाता है. यह प्रक्रिया काफी सुव्यवस्थित है. संवितरणीकरण की प्रक्रिया भी निर्बाध रूप से चलती रहती है. नाबार्ड की प्रक्रियाओं के बारे में सभी सरकारी विभागों के अधिकारियों द्वारा सर्वत्र की गई यह टिप्पणी ही इस बात की द्योतक है कि यह प्रक्रिया कितनी दक्षता से कार्य कर रही है.
- यह प्रक्रिया पूरी तरह से उपयोगकर्ता विभागों पर निर्भर करती है. तथापि, वे सीपीएम/ पीईआरटी की आधुनिकतम तकनीकों का पालन नहीं करते हैं. इस कार्यप्रणाली पर जोर दिया जाए, चाहे परियोजनाएँ छोटी अर्थात् रु.2 करोड़ से भी कम की हो क्यों न हो. एजेंसी से कहा जाए कि वह कम से कम तीन चरणों की पहचान करे तथा तदनुसार नाबार्ड को सूचित करे. मध्यम और बड़ी परियोजनाओं और डीपीआर में पहचान किए गए सभी महत्वपूर्ण कार्यकलापों के लिए इस प्रकिया को अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए.
- वित्त मंत्रालय इस उद्देश्य के लिए ग्रामीण आधारभूत संरचना बॉण्डों (आरआईबी) की तर्ज पर नाबार्ड द्वारा संसाधन संग्रहण और विदेशी विनिमय रिजर्वें की उगाही के लिए अरिरिक्त उपायों की तलश कर सकता है. ग्रामीण आधारभूत संरचना बॉण्डों के लिए नाबार्ड को बाज़ार में उतरने की अनुमति दी जा सकती है. यह सुझाव है कि दो से तीन वर्षों की समयावधि में इस निधिकरण में लगभग रु.25,000 करोड़ से रु.30,000 करोड़ तक की वार्षिक वृद्धि की जा सकती है. आरआईडीएफ के माध्यम से आने वाली समूह निधि में भी प्रति वर्ष रु.20,000 करोड़ की वृद्धि की जा सकती है तथा नाबार्ड को अपने बल-बूते अपने संसाधनों को अतिरिक्त रु.10,000 करोड़ तक बढ़ाने की अनुमति दी जानी चाहिए. जैसा कि पहले ही बताया गया है कि निधि प्रतिबद्धता कम से कम तीन वर्ष की कर देनी चाहिए क्योंकि इससे निधि से संबंधित अनिश्चितता में कमी आएगी. निधि का पता चल जाने से पीएससी तत्काल प्रभाव से बैठक करके प्रक्रिया का शुभारंभ कर सकती है.
- समग्र रूप में इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए कि नाबार्ड को राज्य सरकार स्तर पर प्रक्रियाओं में सुधार लाने के प्रयासों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए क्योंकि यही वह बात है जो इस प्रक्रिया और निधि की प्रभावशीलता सुनिश्चित कर सकती है. यही वह कारण है जिसकी वजह से अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियाँ भी एसपीवीज़ के साथ व्यवहार को तरजीह देती हैं. नाबार्ड को इन एसपीवीज़ द्वारा अपने परिचालनों में अपनाई जा रही प्रणालियों का स्वागत करने का प्रयास करना चाहिए. यह सिफारिश की जाती है कि नाबार्ड वर्तमान सरकारी विभागों और एसपीवीज़ की प्रक्रियाओं का तुलनात्मक अध्ययन करे तथा उपयुक्त प्रणालीगत मध्यस्थता करे
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- एक बात सभी सेक्टरों और राज्यों पर लागू होती है हमारा प्रेक्षण है कि रखरखाव के लिए वे काफी कम प्रावधान करते हैं. सृजित आस्तियों के रखरखाव पर राज्य काफी कम प्रावधान करते हैं. इसमें सुधार का एक उपाय यह हो सकता है कि उपयोगकर्ताओं पर उपयोग-प्रभार लगाया जाए. परन्तु इसके लिए राज्य कोई उत्साह नहीं दिखा रहे हैं. फिलहाल नाबार्ड के माध्यम से निधीकृत परियोजनाओं से देश में काफी बड़ा आस्ति का आधार बन गया है. अपनी पूर्व की खेपों के तहत निधीकृत परियोजनाओं की ओर नाबार्ड को पुनः ध्यान देना चाहिए. जितना महत्वपूर्ण इन आस्तियों का निर्माण होता है, उतना ही महत्वपूर्ण उनका प्रबंधन और रखरखाव होता है. आरआईडीएफ की ही तर्ज पर ग्रामीण आस्ति प्रबंधन निधि (आरएएमएफ) का गठन किए जाने की जरूरत है. प्रतिवर्ष रखरखाव के लिए कम से कम प्रतिवर्ष रु.10,000 करोड़ की जरूरत है किन्तु इसका प्रावधान करने के लिए राज्यों को प्रोत्साहित करना चाहिए. इस निधि का एक-तिहाई हिस्सा केन्द्र सरकार अनुदान के रूप में दे सकती, एक-तिहाई हिस्सा राज्य सरकार अपने बजट से दे सकती है और एक-तिहाई हिस्सा आरआईडीएफ के माध्यम उधार राशियों के रूप में अथवा किसी अन्य अतिरिक्त उधारीकरण प्रक्रिया से आ सकता है. इस निधि का प्रबंधन भी नाबार्ड द्वारा किया जा सकता है.
- नाबार्ड के पास निगरानी के लिए काफी व्यापक व्यवस्था है तथा वह इसका उपयोग विभिन्न पद्धतियों से करता है. नाबार्ड ने निगरानी की पद्धति का निर्णय करने हेतु परियोजनाओं को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है : श्रेणी I : रु.2 करोड़ से कम की परियोजनाएँ, श्रेणी II: रु.2 करोड़ और रु.20 करोड़ के बीच की परियोजनाएँ तथा श्रेणी III : रु.20 करोड़ से अधिक की परियोजनाएँ. नियमित निगरानी काफी नेमी प्रकार की और पारंपरिक होती है. यहाँ सूचना लेने-देने का बोझ अधिक हो सकता है. नाबार्ड को विभिन्न प्रयोजनों और स्तरों को ध्यान में रखते हुए रिपोर्टों के फार्मेटों को नवोन्मेषी रूप में डिजाइन करना होगा.
- नाबार्ड को ग्राहक विभागों की प्रक्रियाओं का अध्ययन करना चाहिए और उनकी प्रणालियों और रिपोर्टिंग में सुधार करने हेतु सुझाव देने चाहिए. वह अपनी स्वयं की निगरानी और ट्रैकिंग में सुविधा के लिए अपने ग्राहक विभागों को ऑटोमेटेड सिस्टम भी उपलब्ध करा सकता है. स्वयं की प्रणाली में सुधार लाकर भी नाबार्ड मूल्य श्रृंखला में वृद्धिशील प्रगति ला सकता है. मुख्य गतिविधि तो ग्राहक संगठनों में ही होती है. मूल्य श्रृंखला में बड़े सुधार के लिए ग्राहकों की प्रणालियों का उन्नयन भी काफी महत्वपूर्ण है. उधार देते समय यही कार्य अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियाँ करती हैं.
- परियोजनाओं के प्रति लोगों की उदासीनता को दूर करने तथा उनके रखरखाव और मरम्मत इत्यादि के लिए लोगों की सहभागिता काफी सहायक सिद्ध हो सकती है. इसके लिए परियोजना की शुरुआत और उसकी परिकल्पना के समय से ही उनको शामिल किया जाना अति आवश्यक होता है. लोगों की सहभागिता का दूसरा पहलू है कार्यान्वयन के दौरान उनको शामिल किया जाना. सामाजिक निगरानी और लाभार्थी सहभागिता से निश्चित रूप से बेहतर रखरखाव और संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद मिलती है. सभी परियोजनाओं में परियोजना विशेष की विशेषताओं और उद्देश्यों को दर्शाते हुए एक नामपट्ट लगाया जाता है. उसमें वित्तीय विवरण भी दर्शाए जाते हैं. नामपट्ट स्थानीय भाषा में बनवाया जाता है. नामपट्ट पर वॉरंटी अवधि का भी उल्लेख रह सकता है. नामपट्ट में उन व्यक्तियों के नाम भी दिए जाएँ जो उस परियोजना और उसके वॉरंटी रखरखाव के लिए उत्तरदायी होते हैं. उसमें अगले उच्च स्तर के अधिकारियों से संपर्क के विवरण भी दिए जाने चाहिए.
- यह पाया गया कि जल उपयोगकर्ता संघों (डब्ल्यूयूए) का गठन कहीं-कहीं ही किया गया था और जहाँ किया भी गया था वहाँ वे प्रायः अप्रभावी थे. नाबार्ड को इस संबंध में और अधिक विश्लेषण करना चाहिए और उन क्षेत्रों का पता लगाना चाहिए जहाँ वह इस संबंध में मददगार हो सकता है और जल उपयोगकर्ता संघों के गठन को सुनिश्चित करने हेतु पद्धतियों का सुझाव दे सकता है. फिलहाल हमारी राय में यह स्पष्ट नहीं है कि इस संबंध में नाबार्ड की उपलब्धि क्या हो सकती है. उपयोगकर्ता प्रभार कदाचित ही लगाए जाते हैं. यह उभर कर सामने आया है कि यह स्थिति किसानों की असहमति के कारण कम, राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण अधिक है.
आरआईडीएफ समर्थित गोकुल ग्राम योजना की ओआरजी-मार्ग द्वारा सामाजिक लेखा-परीक्षा
किसी परियोजना के सामाजिक कार्यनिष्पादन को मापने और उसमें सुधार लाने की प्रक्रिया को सामाजिक लेखा-परीक्षा कहा जाता है. इसके अंतर्गत लोगों की रुचि, प्राथमिकताओं और समझ को आकलित करने का प्रयास किया जाता है ताकि कार्यान्वयन की प्रक्रिया खुली और लोगों के प्रति जवाबदेह बनाई जा सके. कुछ ग्रामीण आधारभूत संरचना परियोजनाओं से हुए फायदों को अनिवार्य रूप से समाज के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए और इस उद्देश्य के लिए गुजरात में कार्यान्वित की गईं आरआईडीएफ समर्थित गोकुल ग्राम योजना परियोजनाओं की ओआरजी-मार्ग नामक एक बाहरी एजेंसी द्वारा सामाजिक लेखा-परीक्षा करवाई गई. प्रत्येक गाँव में पाँच वर्ष (1995-2000) की समयावधि के अंदर 16 बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध करवाने हेतु योजना बनाने के समय से लेकर निगरानी तक और योजना के तहत सृजित आस्तियों के रखरखाव में लोगों की सहभागिता प्राप्त करने के उद्देश्य से गोकुल ग्राम योजना (जीजीवाई) की परिकल्पना की गई थी. नाबार्ड ने मार्च 2000 में गोकुल ग्राम योजना के कार्यान्वयन के लिए आरआईडीएफ-V के तहत रु.70 करोड़ की मंजूरी प्रदान की. इस योजना के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा ग्रामीण सड़कों और प्राथमिक पाठशालाओं का निर्माण प्रस्तावित था
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2. ग्रामीण सड़कें और प्राथमिक पाठशालाएँ गोकुल ग्राम योजना के प्रमुख घटक थे. अतः आरआईडीएफ के अंतर्गत समर्थन प्राप्त इन आधारभूत संरचनाओं को इस अध्ययन के लिए चुना गया. एजेंसी ने छह ग्रामीण सड़कों (बनासकांठा और राजकोट जिलों की तीन-तीन) और आठ प्राथमिक पाठशालाएँ (अमरेली से 2, बनासकांठा से 3 और राजकोट जिले से 3) को कवर किया.
3. ओआरजी-मार्ग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष और सुझाव/ सिफारिशें निम्नानुसार हैं :
- कुल व्यय का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण विकास विभाग (नाबार्ड के हिस्से सहित) के बजटीय प्रावधानों में से पूरा किया गया और शेष को बनासकांठा और अमरेली जिलों में चल रही अन्य चालू परियोजनाओं की निधियों से पूरा किया गया.
- अधिकांश नमूना परियोजनाएँ प्रस्तावित समय के भीतर ही पूरी कर ली गईं थी. तथापि, कुछ परियोजनाएँ देरी से पूरी हुईं. निधियों की देरी से प्राप्ति और ग्राम स्तर पर आंतरिक विरोध, देरी के प्रमुख कारणों के रूप में सामने आए. इसके अलावा कुछ परियोजनाओं में अतिरिक्त निर्माण कार्यों को किए जाने के कारण लागत में वृद्धि भी देखी गई.
- परियोजना क्षेत्र के लोगों ने कमोबेश सड़कों की गुणवत्ता की सराहना की है. अधिकांश लोग पाठशाला कक्षों की वर्तमान स्थिति और निर्माण कार्य की गुणवत्ता से संतुष्ट थे.
प्रभाव
पाठशाला कक्ष परियोजनाओं से प्राप्त फायदे
- नए पाठशाला कक्षों में बच्चों को बैठने की जगह उपलब्ध हुई और गर्मी, बारिश और सर्दी से सुरक्षा मिली. गर्म और बरसाती दिनों में भी बच्चों की उपस्थिति में 20-25 प्रतिशत की वृद्धि हुई.
- पाठशाला कक्षों के कारण बाधाएँ और मनभटकाव नहीं हुआ तथा बच्चों का ध्यान पढ़ाई में लगने लगा, इससे शिक्षा के वातावरण में भी सुधार हुआ.
- पाठशाला कक्षों में अब आवश्यक पुस्तकों, उपकरणों, मानचित्रों आदि को रखने के लिए सुरक्षित स्थान उपलब्ध हो गया.
सड़क परियोजनाओं से प्राप्त फायदे
नई सड़कों के कारण गाँव साफ-सुथरे दिखाई देने लगे. नई सड़कों ने बरसात के मौसम के दौरान राहगीरों/वाहनों की आवाजाही को सुगम बनाया, साग-सब्जी, बर्तन, कपड़े, अखबार, दूध इत्यादि बेचने वालों की आवाजाही आम हो गई.
- सड़क के कारण लोगों की डेयरी, सहकारी संस्थाओं, डाक-घरों, स्वास्थ्य केन्द्रों, दुकानों आदि जैसे ग्रामीण संसाधनों तक पहुँच आसान हो गई.
- बारिश के मौसम में जिन आंतरिक सड़कों का उपयोग काफी दूभर था, उनके कुछ अंशों के सुधार से ही समय और परिश्रम की बचत होने लगी.
सुझाव/ कार्रवाई बिंदु
चयन प्रक्रियाओं को अधिक दक्ष और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से नोडल एजेंसी के रूप में कार्यरत जिला ग्रामीण विकास प्राधिकरण योजना के विभिन्न चरणों के कार्यन्वयन के लिए परियोजना कार्यस्थलों के प्राथमिकीकरण हेतु कुछ मानक निर्धारित कर सकता है.
- चयन प्रक्रियाओं को अधिकाधिक सहभागितामूलक और लिंगभेद रहित बनाने के लिए आवश्यकता की पहचान की प्रक्रिया में महिलाओं को शामिल किए जाने की जरूरत है.
- आस्तियों को दीर्घकाल तक बनाए रखने के लिए ग्राम स्तर के स्वयं सेवी समूह/महिला समूह लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाएँ. आस्तियों के रखरखाव के लिए ग्राम पंचायत समुदाय से राजस्व की वसूली कर सकती है
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- कार्यान्वयनकर्ता एजेंसियाँ कार्यकलापों और निधीकरण के स्रोतों के लिए अलग अलग वित्तीय लेखों का रखरखाव करें.
- गाँवों को वास्तव में 'गोकुल ग्राम' बनाने के लिए ग्रामीण आधारभूत सुविधाओं से संबंधित सरकार के सभी कार्यक्रमों को एकसाथ मिलाने हेतु विभिन्न विभागों की सहायता के लिए एक साझा मंच तैयार करना काफी जरूरी है.
योजनाओं की भौतिक प्रगति की जाँच हेतु नाबार्ड त्रैमासिक आधार पर फील्ड स्तर पर इन कार्यक्रमों की निगरानी जारी रख सकता है और बाहरी राय प्राप्त करने हेतु कार्यक्रम के मूल्यांकन का कार्य किसी राष्ट्रीय स्तर के संगठन को सौंप सकता है.
- छत्तीसगढ़ में आरआईडीएफ निवेशों का प्रभाव मूल्यांकन
- आरआईडीएफ के तहत सड़कों और पुलों में निवेश का प्रभाव आकलन
- दिंडिगल जिले में आरआईडीएफ के तहत वित्तपोषित ग्रामीण सड़कों में निवेशों का मूल्यांकन अध्ययन
- ग्रामीण पुलों में आरआईडीएफ के तहत निवेशों का एक्स-पोस्ट मूल्यांकन अध्ययन
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