1) कुहियों की लाइनिंग
2) औगासी पंप नहर
3) ग्रामीण विद्युतीकरण
4) संयुक्त वन प्रबंधन
5) एक लाख ट्यूबवेल परियोजना
6) गोकुल ग्राम योजना
7) माइनरों का निर्माण
8) सरस्वती बाल विद्या संकल्प योजना के अंतर्गत प्राथमिक पाठशालाएँ
9) वाटरशेड दृष्टिकोण से मृदा और जल संरक्षण
10) रबड़ परियोजना
11) ग्रामीण पेय जल आपूर्ति
12) वर्ष जल संग्रहण संरचनाएँ
13) शंकरपुर मछली हार्बर
हिमाचल प्रदेश
कुहियों की लाइनिंग के लिए परियोजना
- पृष्ठभूमि
हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक विशेषताओं में व्यापक उतार-चढ़ावों के कारण राज्य में सिंचाई संसाधनों के विकास के लिए अलग-अलग प्रणालियों को अपनाना बेहद जरूरी हो जाता है. इनमें प्राकृतिक जल प्रपात यहाँ पानी के प्रमुख स्रोत हैं. प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त पानी को गुरुत्वाकर्षण पर आधारित खेतों की कच्ची नालियों के माध्यम से परंपरागत रूप से क्षेत्र के भीतरी भागों में वितरित किया जाता रहा है. इससे जहाँ पानी का अपव्यय होता है, वहीं दूरस्थ छोरों पर रहने वाले खेत अक्सर सिंचाई सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं. इन नालियों को हिमाचल प्रदेश में लोकप्रिय रूप में कुई कहा जाता है तथा जीवनदायिनी के रूप में इनका सम्मान किया जाता है. जिन क्षेत्रों में सिंचाई के कोई अन्य साधन विकसित कर पाना संभव नहीं है वहाँ उपर्युक्त आधारभूत ढांचागत बाधाओं को दूर करने के लिए हिमाचल प्रदेश राज्य सरकार ने वहाँ 10 हेक्टेयर से 70 हेक्टेयर वाले कमांड एरिया को पानी की सुविधा देने के लिए कुइयों को जोड़ने की परियोजना बनाई है.
- परियोजना के विवरण
परियोजना के अंतर्गत मुख्य नहर, खेत की नालियों, हेडवीर/ चेकडैम, वाटर ड्रॉप संरचनाओं, फुटपाथ क्रॉसिंग, आदि उप-घटकों सहित अलग-अलग स्थानों के लिए अलग-अलग क्षमताओं की पक्की नालियों के निर्माण को परिकल्पित किया गया है. इसके लिए रु. 35,000 प्रति हेक्टेयर की औसत लागत आएगी. परियोजना में किसी भी प्रकार की ऊर्जा के प्रयोग की परिकल्पना नहीं की गई है.
3. परियोजना का अनोखापन
- यह परिकल्पना की गई थी कि आयोजना बनाने में विशेषकर खाका तैयार करने में, निष्पादन और कुइयों के रखरखाव में कृषक विकास संघ अर्थात् जल उपयोगकर्ता संघों (वाटर यूजर्स एसोसिएशन) के माध्यम से उपयोगकर्ताओं को शामिल किया जाएगा.
- किसी परियोजना विशेष के निष्पादन की जिम्मेदारी जल उपयोगकर्ता संघ की थी. ईंट, सीमेंट, सरिया आदि जैसी सामग्री हिमाचल प्रदेश सरकार का कृषि विभाग उपलब्ध कराएगा तथा जल उपयोगकर्ता संघ अपनी पारस्परिक सहायता से अथवा स्थानीय राजमिस्त्रियों को लगाकर, कृषि विभाग के मृदा संरक्षण अधिकारियों के मार्गदर्शन में निर्माण कार्य करवाएगा. परियोजना लागत के 10 प्रतिशत की मामूली दर पर ठेकेदार के लाभ के रूप में राशि जल प्रयोगकर्ता संघ के बैंक खाते में जमा कर दी जाती है ताकि इस राशि का उपयोग खेत की नालियों आदि के रखरखाव के लिए किया जा सके.
- परियोजना में यह भी परिकल्पना की गई है कि प्रत्येक उपयोगकर्ता परिवार जल उपयोगकर्ता संघ की समूह निधि में प्रति वर्ष रु. 50 की मामूली राशि का अंशदान करेगा तथा यह भी प्रस्तावित था कि इस समूह निधि से मिले ब्याज में से खर्च करके और सामुदायिक श्रमदान के माध्यम से कुइयों का रखरखाव किया जाएगा.
4. फीडबैक
3400 हेक्टेयर से अधिक के कुल कमांड एरिया के लिए 157 कुइयों के निर्माण के साथ ही परियोजना पहला चरण पूरा हो चुका है. इस परियोजना के एक मूल्यांकन अध्ययन से निम्नलिखित निष्कर्ष सामने आए हैं - (i) कार्यों की योजना बनाने और उनके निष्पादन में व्यापक रूप से जल प्रयोगकर्ता संघों का शामिल किया गया; (ii) कार्यों की गुणवत्ता अति संतोषजनक रही; (iii) परियोजना पूरी होने के बाद की शुरुआती अवधि में जल उपयोगकर्ताओं के क्षमता निर्माण में निवेश काफी आवश्यक है, विशेषकर पारंपरिक फसलों के स्थान पर उच्च मूल्य अर्जित करने वाली फसलों को अपनाने हेतु जल संसाधनों का किफायती उपयोग करने तथा संरचनाओं के अपने-आप रखरखाव करने और उनमें सुधार सुनिश्चित करने के लिए सामूहिक भावना को पैदा करने के लिए क्षमता निर्माण में निवेश; (iv) जल स्रोत के कैचमेंट क्षेत्र में कुछ निवेश से सिंचाई प्रणाली का उपयोग बढ़ेगा और उसकी उपादेयता में वृद्धि होगी.
उत्तर प्रदेश
पहले से बनी हुई बड़ी सिंचाई परियोजनाओं का जीर्णोद्धार -
औगासी पंप नहर का आधुनिकीकरण
वर्ष 1981-82 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में यमुना नदी के दाएँ किनारे पर औगासी पंप नहर राष्ट्र के नाम समर्पित की गई. इसे दो चरणों में 50 क्यूसेक क्षमता वाले तीन पंपों की सहायता से 150 क्यूसेक पानी ले जाने के लिए डिजाइन किया गया था.
पहले चरण में 30 मीटर हेड तथा दूसरे चरण में 17 मीटर के तहत इन पंपों का चलाया जाना अपेक्षित था. प्रथम चरण में पंपों को पहले 33 केवी के समर्पित फीडर के साथ एक तैरती बड़ी नौका पर स्थापित किया गया था और द्वितीय चरण में उन्हें पक्के पंपहाउस में लगा दिया गया. दोनो चरणों में लगाए गए सभी पंप और मोटरें 20,000 घंटों से अधिक समय के लिए चल चुकी हैं और 20 वर्ष से अधिक की पुरानी हो चुकी हैं. मशीनें अपना उपयोगी काल पूरा कर चुकी हैं. इन पंपों से पानी निकालने का स्तर काफी गिर गया था. वर्तमान में लगी हुई 33 केवी की लाइन, पंपों और मोटरों को निरंतर बिजली की आपूर्ति नहीं कर रही है. प्रथम चरण में बिना पंप हाउस के इतनी बड़ी क्षमता वाले पंपों को तैरती बड़ी नौका में चलाने में काफी कठिनाई है. गाद इकट्ठा होने, किनारों के क्षरण आदि के कारण भी नहर और वितरण प्रणाली की क्षमता में कमी आई है. इन सभी समस्याओं के मिले-जुले प्रभाव के रूप में, सकल सिंचित क्षेत्र 12692 हेक्टेयर से घटकर 2000 हेक्टेयर हो गया.
परियोजना
इस परियोजना में निम्नलिखित उपायों को अपनाकर पंप नहर का आधुनिकीकरण करना परिकल्पित किया गया है -
(i) प्रथम चरण में पक्के पंप हाउस का निर्माण करना. (ii) पुराने हो चुके सभी पंपों और मोटरों को बदलना [7 : 4 पहले चरण में (1 स्थानापन्न के रूप में) और द्वितीय चरण में 3). (iii) 60 किलोमीटर की दूरी से प्रथम चरण के पंपिंग स्टेशन तक पूरी तौर से सिर्फ इसके लिए 133 केवी की लाइन के माध्यम से बिजली लाना. (iv) नहरों और उप-नहरों की जरूरत के अनुसार उनको विभाजित करना और (v) वीआरबी, फाल्स, एफबीज़ जैसी नहर संरचनाओं को स्थायी रूप देना.
परियोजना की अनोखी विशेषताएँ : तीन प्रमुख कारणों से नहर से कम जल निकासी होती थी. ये निम्नानुसार हैं -
i) उच्च क्षमता वाले सभी पंप और मोटरें तैरती चलायमान शहतीरों पर चलाई जा रही थीं जिसे चलाना काफी कठिन होता है.
ii) 33 केवी लाइन से बिजली की आपूर्ति अक्सर उपलब्ध नहीं रहती है और वोल्टेज में काफी उतार-चढ़ाव रहता है.
iii) पंप और मोटरें काफी पुराने हो चुके हैं और ये मशीनें अपने उपयोगी काल से अधिक का समय पूरा कर चुकी हैं.
अतः इस परियोजना का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पक्के पंप हाउस का निर्माण, नए पंपों और नई मोटरों को फिर से स्थापित किया जाय तथा 60 किलोमीटर की दूरी से प्रस्तावित पंप हाउस तक 133 केवी की एक समर्पित लाइन द्वारा बिजली की आपूर्ति लाने के लिए एक छोटी सी राशि के निवेश के माध्यम से उपर्युक्त कठिनाइयों को दूर किया जाय. इन उपायों को अपनाकर वर्तमान नहर और उसकी वितरण प्रणाली को अच्छी तरह से बहाल किया जा सकता है और निर्दिष्ट 12692 हेक्टेयर सकल क्षेत्र की सिंचाई के लिए फिर से उपयोग में लाया जा सकता है.
प्रत्याशित लाभ : परियोजना की लागत रु. 20.73 करोड़ होने का अनुमान है.
अनुमान है कि परियोजना से 12692 हेक्टेयर की भूमि के लिए सिंचाई सुविधा फिर से बहाल हो जाएगी तथा इससे रु. 5.10 की वार्षिक वृद्धिशील आय सृजित होगी.
निष्कर्ष
प्रति हेक्टेयर रु.16300.00 की एक छोटी सी लागत से बड़ी मात्रा में अप्रयुक्त संभावनाओं को प्राप्त किया जा सकता है. वर्तमान निवेश से 10692 हेक्टेयर के अतिरिक्त क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं को बहाल किया जाएगा. जिस पर रु. 20.73 करोड़ की कुल लागत आएगी.
सुझाव
प्रतिभागी सिंचाई प्रबंधन (पीआईएम) के साथ-साथ जल उपयोगकर्ता संघ की सहायता द्वारा सिंचाई प्रणाली की कार्यक्षमता और उपयोगिता में सुधार लाया जा सकता है. हम कुल परियोजना लागत की 0.5 प्रतिशत तक की राशि की सहायता देकर इस कार्यकलाप को सहयोग प्रदान करते हैं.
पश्चिम बंगाल
ग्रामीण विद्युतीकरण परियोजना
पृष्ठभूमि :
यद्यपि पश्चिम बंगाल के 37910 गाँवों में से 80 प्रतिशत गाँवों में बिजली आ गई है फिर भी लगभग 7500 बसे हुए गाँव/ पुरवा में आज भी बिजली पहुँचनी बाकी है. इन गाँवों के लोगों को आज भी स्वच्छ ऊर्जा की मूलभूत न्यूनतम सुविधा नहीं मिल पाई है जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और गैर कृषि कार्यकलाप थम से गए हैं. मूलभूत ढांचे के अभाव के कारण भी इन क्षेत्रों के ग्रामीण युवाओं के शहरी क्षेत्रों में सामूहिक विस्थापन को भी बढ़ावा मिल रहा है.
पश्चिम बंगाल ग्रामीण विद्युत विकास निगम (डब्ल्यूबीआरईडीसी) के माध्यम से पश्चिम बंगाल सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के विद्युतीकरण के लिए सामूहिक परियोजनाएँ बना रही है. पश्चिम बंगाल सरकार का प्रस्ताव है कि 33 केवी के मुख्य वितरक सबस्टेशन से कुल 214 हेक्टेयर के परियोजना क्षेत्र में ग्रामीण घरों और कृषि हेतु पंप सेटों को बिजली पहुँचाने के लिए चरणबद्ध रूप से बुनियादी ढांचों का सृजन किया जाए. इस परियोजना से 3000 गाँवों और पुरवा के लगभग 32 लाख लोगों को लाभ होगा.
2. परियोजना घटक :
ग्रामीण विद्युतीकरण हेतु बिजली आपूर्ति के लिए बुनियादी ढांचा परियोजना, इसमें निम्नलिखित घटक शामिल हैं :
11 केवी उप-वितरण लाइनें - 3000 ckt. किलोमीटर.
11 केवी स्पुर लाइनें/ कनेक्शन - संख्या 3400
100 केवीए, 63 केवीए, 25 केवीए आदि की क्षमता वाले डिस्ट्रीब्यूशन ट्रान्फॉर्मरों की स्थापना जिससे वितरण प्रणाली की क्षमता में 150 एमवीए की वृद्धि होगी और
एमवी/ एलवी वितरण लाइनें - लंबाई में लगभग 6000 सीकेएम.
इस कार्य में एसीएसआर/ एएसी कंडक्टरों को स्थापित करना, आरसीसी/ पीसीसी/ लकड़ी के खंबे लगाना, सुरक्षा उपकरण लगाना, डिस्ट्रीब्यूशन ट्रान्स्फॉर्मरों, केपेसिटरों को लगाना और मीटरिंग आदि शामिल है.
3. कुल लागत
परियोजना के कार्यान्वयन में शामिल कुल परिव्यय रु. 181 करोड़ है तथा यह परियोजना 2005 में पूरी हो जाएगी.
4. विशेषताएँ :
इन परियोजनाओं का कार्यान्वयन डब्ल्यूबीआरईडीसी करेगा और इनके कार्यान्वयन के लिए तकनीकी-सह-वाणिज्यिक सहयोग डब्ल्यूबीआरईडीसी ही प्रदान करेगा. तथापि, इन परियोजनाओं के दौरान ग्राम पंचायतों/ परिषदों के रूप में ग्रामीण समुदाय की इनमें सीधी भागीदारी भी रहेगी.
5. सुझाव :
समुदाय के सर्वांगीण विकास के लिए महिलाओं और ग्रामीण युवाओं को वितरण प्रणाली के परिचालन और रखरखाव, बिजली की बचत, जवाबदेही और बिजली के प्रभावी उपयोग के बारे में प्रशिक्षण प्रदान करने/ क्षमता निर्माण की आवश्यकता है.
इन डाउन स्ट्रीम वितरण प्रणालियों को गुणवत्तात्मक बिजली उपलब्ध कराने हेतु राज्य सरकार अपस्ट्रीम बिजली प्रणाली में सुधार लाने हेतु योजना बना सकती है.
आन्ध्र प्रदेश
परियोजना : संयुक्त वन प्रबंधन (जेएफएम)
भूमिका
भारत में लगभग 640 हजार वर्ग-किलोमीटर क्षेत्र में वन हैं. इस प्रकार देश का लगभग 27 प्रतिशत भाग वनों से घिरा है. राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार, देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के लगभग एक-तिहाई हिस्से में वन होने चाहिए. अधिक जनसंख्या के कारण कृषि, मकान निर्माण और ईंधन के लिए जंगलों को निर्ममता से काटा जा रहा है. इसके परिणामस्वरूम वन क्षेत्रों में भारी कमी आई है और जंगलों का विनाश हुआ है तथा पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है. लगातार क्षीण होते जा रहे वनीय संसाधनों को बचाकर रखने की काफी जरूरत है. इसकी जिम्मेदारी सरकार को और वन क्षेत्रों के आस-पास रहने वाले लोगों को उठानी होगी. राज्य वन विभाग ने संयुक्त वन प्रबंधन (जेएफएम) की कार्यनीति के माध्यम से वनों की सुरक्षा का बीड़ा उठाया है. इसका उद्देश्य है वनों की सुरक्षा और उनके प्रबंधन में लोगों की भागिदारी सुनिश्चित करना. जंगलों के खाली स्थानों में वृक्षारोपण और मृदा-नमी संरक्षण के लिए छोटी-छोटी वित्तीय निविष्टियों के माध्यम से वनों को फिर से लगाने की संभावना पर ही संयुक्त वन प्रबंधन का पूरा दारोमदार टिका है. वनों के फिर से स्थापित करने से आय के अवसर मिलेंगे और इस प्रकार विभिन्न लकड़ी से भिन्न वनीय उत्पादों की उपलब्धता और संग्रहण बढ़ेगा और बाद में लकड़ी आधारित वनीय उत्पादों में भी वृद्धि होगी.
संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम पूर्व के वन प्रबंधन कार्यक्रमों से बिल्कुल विपरीत है. पूर्व के वन प्रबंधन कार्यक्रम में विभाग के कर्मचारियों को वन समुदायों से कार्यपरक संबंध स्थापित करने पड़ते थे. वन प्रबंधन को सरकार और जनता का संयुक्त प्रकल्प होना चाहिए. ग्रामीण निर्धनता को दूर करना और लोगों को आत्म निर्भर बनाने हेतु उनकी ऊर्जा और उनके प्रयासों को एकजुट करना इस कार्यक्रम का लक्ष्य है. अतः संयुक्त वन प्रबंधन एक कार्यक्रम ही नहीं एक जीवन दर्शन भी है. आत्म-निर्भर बनाने और एक निर्दिष्ट भविष्य के लिए तैयार करना इसका उद्देश्य है. किन्तु इन उद्देश्यों की पूर्ति इस बात पर निर्भर करती है कि स्थानीय जरूरतों को किस हद तक पूरा किया जाता है तथा वन प्रबंधन के विभिन्न चरणों में किस सीमा तक लोगों को शामिल किया जाता है.
अवधारणा
मिट्टी का कटाव रोकने, मिट्टी के प्रोफाइल और जल स्तर में सुधार लाने, ग्रीन कवर को बहाल करने हेतु भूमि की आवश्यकता के अनुसार वाटरशेड प्रणाली को अमल कर निम्नकोटि के वन क्षेत्रों का उपचार करना ताकि निम्नकोटि के वनों की उत्पादकता बढ़ाई जा सके और वनों की सीमाओं पर रहने वाले ग्रामवासियों को शामिल करके कार्यान्वयन समूहों का गठन किया जा सके तथा इन समूहों के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों के गठन द्वारा पारिस्थितिक संतुलन बनाया जा सके.
उद्देश्य
- राज्य की वन संपदा को बहाल करना
- ग्रामीण लोगों विशेष रूप से भूमिहीन अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए रोजगार के अवसरों का सृजन करना
- सामाजिक और आर्थिक विकास द्वारा ग्रामीण लोगों का सशक्तीकरण
- संयुक्त वन प्रबंधन में शामिल लोगों को वन के उपयोग में हिस्सेदारी देना तथा रोजगार सृजन में निरंतरता बनाए रखना
- समूहों में बचत की आदत और स्वयं सहायता की भावना विकसित करना
- वन संरक्षण समिति समूहों और वन कर्मचारियों को प्रशिक्षण प्रदान करने में गैर-सरकारी संगठनों को शामिल करना
परियोजना के घटक
वन रोपण के कार्य/ वनों की बहाली हेतु उपचार की पद्धतियाँ, वन स्थित वाटरशेडों में मृदा-नमी का संरक्षण, ग्रामवासियों के लिए परियोजना में शामिल हरने के समय सहयोगी गतिविधियाँ और ग्राम वासियों का प्रशिक्षण आदि.
प्रमुख विशेषताएँ - वन संरक्षण समितियों (वीएसएस) के माध्यम से कार्यान्वयन, वन संसाधन प्रबंधन में जमीनी स्तर के लोगों की भागीदारी और स्वामित्व की भावना पैदा करना. वीएसएस और वन विभाग द्वारा संयुक्त बैंक खाते का रखरखाव. स्थानीय लोगों के योगदान का कोई उदाहरण, लगातार बैठकें आयोजित करना, वीएसएस में महिला को अध्यक्ष बनाना तथा स्वयं सहायता समूह का गठन करके महिला सशक्तीकरण. परियोजना कार्यान्वयन, लघु वनीय उत्पादों (एमएफपी) तथा निर्धारित समय पर बन कटाई से प्राप्त होने वाले बाँस और बल्लियों की बिक्री से मिली धनराशि जैसे उपभोगाधिकारों के बंटवारे से संबंधित नीति निर्माण में जन भागीदारी. वन पुनर्जीवीकरण, मृदा-नमी संरक्षण, सहयोगी सेवाओं आदि से रोजगार.
अनोखी बात
सुरक्षा और प्रबंधन वन विभाग के साथ मिलकर वन सीमाओं पर बसे गाँवों के लोगों की सच्ची भागीदारी. राज्य सरकार द्वारा कड़ाई से अनुप्रवर्तन (निगरानी).
असम
परियोजना : एक लाख शैलो (उथले) ट्यूबवेल लगाने की परियोजना
भूमिका
वर्षा की अनिश्चितता की दृष्टि से, एक वर्ष में एक से अधिक फसल की खेती करने के लिए सिंचाई सुविधाओं का होना काफी महत्वपूर्ण होता है. आजादी के पहले चार दशकों के दौरान भारत ने सिंचाई पर लगभग रु. 45,000 करोड़ खर्च किया है. इस अवधि के दौरान प्रति हेक्टेयर सिंचाई क्षमता सृजित करने की औसत लागत तेज़ी से बढ़कर पहली योजना के दौरान की रु. 1,500 से सातवी योजना के दौरान रु. 50,000 हो गई. (स्रोत : सीएमआयई डायरेक्टरी ऑफ इंडियन एग्रिकल्वचर, 1997)
असम में प्रचुर मात्रा में भू-जल भंडार है जिसका अभी तक उपयोग नहीं हो पाया है. राज्य सरकार ने सहभागितामूलक सिंचाई प्रबंधन की अवधारणा के आधार पर विशाल सिंचाई सुविधा का प्राथमिकीकरण किया है. इन विशाल अदोहित भू-जल संसाधनों का यदि तीव्रता से दोहन किया जाए तो यह कृषि उत्पादकता की दीर्घकालिक वृद्धि में अग्रणी भूमिका निभा सकता है. भू-जल संसाधनों के वैज्ञानिक दोहन से (i) संकटकालीन समय में पानी उपलब्ध कराने और वर्षाकाल में पानी के जमाव को कम करने में और (ii) सूखे मौसम में सिंचाई की उपलब्धता को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगा इस प्रकार यह जल प्रबंधन हेतु एक अति उपयोगी साधन है. असम में गर्मी के मौसम में धान की खेती के लिए सिंचाई सुविधा काफी महत्वपूर्ण होती है.
ग्रामीण ऋण प्रणाली की तमान समस्याओं के चलते राज्य में बैंक ऋण के माध्यम से सिंचाई के क्षेत्र में पूँजी निर्माण नगण्य रहा है. इन समस्याओं में बैंक ऋणों की कम वसूली, दीर्घावधि सहकारी ऋण प्रणाली की निष्क्रियता, बैंक ऋणों के लिए भूमि को बंधक करने में आने वाली कठिनाइयाँ आदि हैं. फसलों, खासतौर से ग्रीष्मकालीन धान के उत्पादन और उत्पादकता में सुधार लाने की दृष्टि से राज्य सरकार ने नाबार्ड के साथ मिलकर, ''समृद्ध कृषक योजना'' (एसकेजी) का शुभारंभ किया है. इसके अंतर्गत रु. 230 करोड़ के कुल वित्तीय परिव्यय और आरआईडीएफ V के तहत रु. 138 करोड़ के ऋण घटक के साथ राज्य में कुल 1 लाख उथले ट्यूबवेलों की स्थापना की जाएगी. कम लागत के ढांचों से नियोजित सिंचाई की व्यवस्था की जाएगी जो अधिक उपजवाली किस्मों और उर्वरकों के प्रगामी प्रयोग को बढ़ाने में सहायक रहेंगी. यही नहीं नियंत्रित सिंचाई, आधुनिक तकनीक के उन साधनों के प्रयोग में सहायक रहेंगी जो मूलतः आकार से अप्रमाणित होते हैं और छोटे किसानों के लिए उपयोगी होते हैं. असम सरकार की इस अनूठी परियोजना को राज्य की सिंचाई संबंधी आवश्यक जरूरतों को दृष्टि में रखते हुए नाबार्ड द्वारा एक विशेष मामले के रूप में मंजूरी दी गई है. परियोजना के अंतर्गत राज्य के 18 जिलों में तीन वर्ष की अवधि के अंदर अतिरिक्त 2 लाख हेक्टेयर के सिंचित क्षेत्र का सृजन किया जाना और फसल सघनता में 118 प्रतिशत से 246 प्रतिशत तक की वृद्धि करना परिकल्पित किया गया है.
उद्देश्य
राज्य में सिंचाई सुविधाओं के विकास के माध्यम से कृषि उत्पादन में वृद्धि लाना
परियोजना घटक
सरकार की एक लाख उथले ट्यूबवेल परियोजना के तहत उथले ट्यूबवेल योजना
प्रमुख विशेषताएँ
उथले ट्यूबवेलों की स्थापना में फील्ड प्रबंध समितियों (एफएमसी) की भूमिका
फील्ड मेनेजमेंट कमेटियों (एफएमसी) के नाम से जाने जाने वाले जन संस्थानों के माध्यम से इस कार्यक्रम के कार्यान्वयन में जन सामान्य की सहभागिता को सुनिश्चित किया जाना इस कार्यक्रम की मुख्य विशेषता है. एफएमसी ग्राम आधारित एक निकाय है जो कृषि विभाग में पंजीकृत है. इसमें किसान सदस्य होते हैं. सदस्यों की संख्या 50 से लेकर 400 तक होती है.
उथले ट्यूबवेलों की परियोजना का कार्यान्वयन
- 30000 उथले ट्यूबवेलों की स्थापना का पहला चरण 1999 में आरंभ किया गया था और राज्य सरकारी तंत्र ने इस विशाल कार्यक्रम का कार्यान्वयन बहुत तेजी से करते हुए समय से काफी पहले अर्थात् एक वर्ष में ही पूरा कर लिया है जो कि अपने-आप में एक कीर्तिमान है. 70000 उथले ट्यूबवेलों की स्थापना के दूसरे चरण में असम सरकार ने 69000 उथले ट्यूबवेलों की स्थापना कर दी है. सरकारी सूत्रों के अनुसार, कुल 99000 उथले ट्यूबवेलों की संस्थापना के साथ यह परियोजना पूरी कर ली गई है. ग्रीष्मकालीन धान की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है (राज्य में चावल की कुल #2346;ैदावार 1996-97 के 33.28 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 1999-2000 में 38.50 लाख मीट्रिक टन हो गई). चावल की प्रति हेक्टेयर पैदावार में भी वृद्धि दर्ज की गई है, अर्थात् उत्पादकता 1996-97 की 1336 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 1999-2000 में बढ़कर 1479 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई.
- ट्यूबवेलों की स्थापना के फलस्वरूप फसल चक्र में सकारात्मक परिवर्तन हुआ है, नई फसलें (गेहूँ, आलू आदि) लगाई गईं और एकल के स्थान पर बहु फसलीय (रबी और ग्रीष्मकालीन फसल) पद्धति शुरू हो गई.
- परियोजना क्षेत्र में किसान खेती की पारंपरिक पद्धतियों को छोड़कर कृषि वैज्ञानिक पद्धतियाँ अपना रहे हैं.
- विकास के बाद के चरण में फसल सघनता 118 प्रतिशत से बढ़कर 246 प्रतिशत हो गई. पहले किसान जो साल में एक ही फसल की खेती करते थे वे अब बहु फसलीय पद्धति अपनाने लगे हैं और साल में एक से अधिक फसलें लेने लगे हैं.
- परिचालनगत व्ययों को पूरा करने हेतु फील्ड मेनेजमेंट कमेटी अपने सदस्यों से जल प्रभार वसूल कर रही है यद्यपि इसके अंतर्गत मूल्यह्रास अथवा संरचनाओं के रखरखाव की लागत शामिल नहीं की जा रही है.
- बाज़ार के गिरे भावों और कुछ जिलों में निविष्टियों की लागतों में वृद्धि के बावजूद परियोजना से पहले की आमदनी की तुलना में घ्किसानों की बाद की आमदनी में दुगुनी/ तिगुनी वृद्धि हुई है.
अनोखी बात
यह परियोजना सिंचाई के क्षेत्र में सहभागितामूलक सिंचाई प्रबंधन के साथ-साथ राज्य सरकार के साथ मिलकर सिंचाई संरचनाओं की लागत बांटने की एक अनूठी मिसाल है
योजनाओं की परिचालनात्मक लागतों को पूरा करने हेतु उपयोगकर्ता अंशदान दे रहे हैं.
गुजरात
परियोजना : गोकुल ग्राम योजना (जीजीवाय)
भूमिका
ग्रामीण विकास को अब केवल रोजगार सृजन और आय अर्जित करने के माध्यम के रूप में ही नहीं लिया जाता है; यह अब उन बातों से ऊपर उठ चुका है और इसके अंतर्गत उन सब बातों पर ध्यान दिया जाने लगा है और ध्यान दिया जाना चाहिए भी, जिनसे शिक्षा, स्वच्छता, सड़कें, आवास, पेय जल, बिजली और इसी प्रकार की अन्य बेहतर सुविधाओं के माध्यम से जन सामान्य के जीवन की गुणवत्ता में सुधार आ सके. विकास के मार्ग को गति देने और उसके लाभों को सबको समान रूप से वितरित करने हेतु सामाजिक क्षेत्र में ग्रामीण आधारभूत संरचना को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है.
1995-96 में गुजरात सरकार ने राज्य के प्रत्येक गाँव में 16 बुनियादी सुख-युविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए 'बॉटम-अप' आयोजना दृष्टिकोण के माध्यम से एक कार्यक्रम की परिकल्पना की है. गाँवों के वृहत विकास हेतु परिकल्पित इस कार्यक्रम का नाम 'गोकुल ग्राम योजना' है. इस कार्यक्रम के अनुसार विकासात्मक प्रयासों को चरणबद्ध रूप में शुरू और पूरा किया जाएगा. अर्थात् प्रत्येक वर्ष में कुल गाँवों में 20 प्रतिशत गाँवों का चयन किया जाएगा और इस प्रकार 5 वर्ष की अवधि में पूरा राज्य कवर किया जाएगा. यद्यपि गोकुल ग्राम योजना (जीजीवाय) वर्ष 1195-96 में प्रारंभ की गई थी, किन्तु कुछ तकनीकी कारणों के कारण, कार्यक्रम की गति बीच में थम गई थी और बाद में वर्ष 1998-1999 में इसे फिर से प्रारंभ किया गया.
अवधारणा
राज्य के सभी गाँवों में 16 बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराना, गाँवों की आधारभूत संरचना में सुधार लाना और गाँवों को आत्म निर्भर बनाना तथा ग्राम स्तरीय गोकुल ग्राम समितियों को शामिल करते हुए आदर्श गोकुल ग्राम बनाना.
उद्देश्य
जन-सामान्य की सहभागिता के साथ बुनियादी सुविधाओं सहित आदर्श ग्रामों का सृजन करना.
परियोजना के घटक
आरआईडीएफ के तहत चयनित गाँवों में प्राथमिक पाठशालाओं और ग्रामीण सड़क संपर्क को सहयोग प्रदान करना.
कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएँ
लोगों की सहभागिता
कार्यक्रम के कार्यान्वयन में लोगों की सहभागिता काफी अधिक है. योजना के बारे में जागरूकता काफी अधिक थी. यहाँ तक की आदिवासी लोगों में भी इसकी जागरूकता अच्छी थी.
इस कार्यक्रम से ग्रामीण गुजरात में आधारभूत संरचनागत सुविधाओं में सुधार लाने में काफी सहायता मिली है. बुनियादी सुविधाओं से वंचित कई गाँवों को कुछ ही समय में वांछित आधारभूत सुविधाएँ प्राप्त हो गईं.
उपलब्धियों के रूप में नई सड़कें बनीं, पाठशालाओं में नए कक्षों का निर्माण हुआ और महिलाएँ सशक्त (सिलाई कक्षाओं के माध्यम से) हुईं.
कार्यक्रम से राज्य के सामाजिक ढांचे में भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा. कई ग्रामवासियों की यह राय थी कि सामुदायिक भवनों (कम्यूनिटी हॉल) के निर्माण जैसी सुविधाएँ आ जाने से गाँवों के लोग आपस में अधिक मिलने लगे हैं जिससे ग्रामवासियों में एकता की नई भावना का संचार हुआ है.
अपने राज्य के सभी गाँवों को एक निर्धारित समय सीमा के अंदर बुनियादी सुविधाओं से लैस करने तथा साथ ही गाँवों को दर्शनीय बनाने और उनके पर्यावरण में स्वच्छता लाने को सुनिश्चित करने के लिए गोकुल ग्राम योजना राज्य सरकार का एक विनम्र प्रयास है. बहरहाल, इस उद्देश्य के लिए अकेले राज्य सरकार के संसाधन ही पर्याप्त नहीं हैं. जहाँ गाँव-विशेष के लोग नकद और श्रमदान के रूप में अपना-अपना योगदान दे रहे हैं वहीं इस कार्यक्रम की सफलता के लिए सामान्य जनता द्वारा भी बड़े हृदय से अंशदान किया जाना बेहद जरूरी है. इस उद्देश्य के लिए दाताओं, न्यासों, संस्थाओं, औद्योगिक घरानों आदि से इस योजना की सहायता करने हेतु अपील की गई है. कुछ जिलों में अप्रवासी भारतीयों से काफी बड़ी मात्रा में राशि प्राप्त हुई है. परियोजना के लिए काफी लोग नकद या वस्तु के रूप में अपने अंशदान लगातार दे रहे हैं. इन अंशदानों पर आयकर में भी छूट की अनुमति दी जा रही है.
हरियाणा
परियोजना : बड़ी सिंचाई परियोजनाओं (एमजेपी) में लघु संरचनाओं का निर्माण
भूमिका
सभी सिंचाई परियोजनाओं में आउटलेट के नीचे उपलब्ध पानी का प्रबंधन अति महत्वपूर्ण होता है और इसे काफी समय से अनदेखा किया जाता रहा है. खेतों में उचित रूप से पानी का वितरण और पानी के उपयोग की समुचित पद्धतियों का अपनाया जाना काफी आवश्यक होता है क्योंकि सिंचित भूमि के प्रति हेक्टेयर को उपलब्ध कराए गए पानी की प्रति इकाई के बदले अर्जित लाभों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है. किसी सिंचाई परियोजना की समग्र सफलता उसके जलनिकासी बिंदु के बाद के स्थान में किए जाने वाले जल प्रबंधन पर निर्भर करती रहती है. बड़ी मात्रा में पानी के अपव्यय के कारण सृजित क्षमता की तुलना में उपयोग में लाई गई क्षमता में जमीन-आसमान का अंतर होता है. रिसाव के कारण पानी की बड़ी मात्रा में बरबादी, परियोजना की जल निकासी स्थान के निकटवर्ती और दूरवर्ती छोरों पर स्थित खेतों के बीच पानी का असमान बंटवारा, नहर प्रणाली का खराब रखरखाव और फील्ड चैनलों का अभाव कुछ ऐसे प्रमुख क्षेत्र हैं जिन पर ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है.
अवधारणा
राज्य में माँग की तुलना में सिंचित पानी की कमी की दृष्टि से उपयुक्त जल प्रबंधन के माध्यम से वर्तमान जल संसाधनों को बड़े क्षेत्रों तक पहुँचाना इसका उद्देश्य है.
उद्देश्य
राज्य की बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के माइनरों/ डिस्ट्रीब्यूटरियों की लंबाई बढ़ाकर वर्तमान जल उपलब्धता में ही सिंचाई के कवरेज में वृद्धि लाना.
परियाजना के घटक
माइनरों और डिस्ट्रीब्यूटरियों का निर्माण और हेड वर्क, माइनरों, आउटलेटों की लाइनिंग से संबंधित अन्य कार्य.
प्रमुख विशेषताएँ
सिंचित जल की समय पर उपलब्धता. गाँवों में जल से संबंधित विवादों में कमी
अनोखापन
माइनर आउटलेटों के नीचे के स्थानों में जहाँ भी जल उपयोगकर्ता संघों का गठन किया गया वहाँ सिंचित जल का वितरण समान रूप से हुआ (वाराबंदी) और कोई विवाद भी नहीं हुआ.
चिंता के क्षेत्र
माइनरों/ डिस्ट्रीब्यूटरियों के परिचालन और रखरखाव के लिए आबंटित बजट अपर्याप्त था. लाभार्थियों से प्राप्त पानी के प्रभार के रूप में की गई वसूली राज्य सरकार द्वारा परिचालन और रखरखाव पर किए गए व्यय की पूर्ति करने में अपर्याप्त थी.
सुझाव
माइनरों के रखरखाव के लिए करसेवा करने हेतु किसानों को प्रोत्साहित अथवा संगठित किए जाने की जरूरत है. चूँकि राज्य में संबंधित अधिनियम को अधिनियमित किया जा चुका है अतः जल उपयोगकर्ता संघों का गठन सुनिश्चित किया जाना चाहिए.
हिमाचल प्रदेश
परियोजना : सरस्वती बाल विद्या संकल्प योजना के तहत प्राथमिक पाठशालाएँ
भूमिका
यह तो सभी मानते हैं कि योजनाबद्ध रूप से कार्य करने का मुख्य लक्ष्य मनुष्य का विकास करना होता है और इसके लिए मानव संसाधनों का विकास करना सबसे पहली जरूरत होती है. (यह सर्वमान्य है कि योजनाबद्ध प्रयासों का मुख्य उद्देश्य मानव विकास होता है और इसके लिए मानव संसाधन विकास एक आवश्यक अपेक्षा होती है.) शिक्षा एक ऐसा उत्प्रेरक कारक होता है जिससे मानव संसाधन का विकास होता है. भारत में यह साबित करने के पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं कि जहाँ साक्षरता दर, विशेष रूप से महिला साक्षरता दर अधिक है, वहाँ जनसंख्या में वृद्धि, शिशु मृत्युदर की दर कम होगी, इसके साथ ही वहाँ आयु संभाव्यता भी अधिक होगी.
प्रारंभिक शिक्षा के सर्वव्यापीकरण (वीईई) का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्राथमिक शिक्षा को अत्यधिक प्राथमिकता प्रदान की जा रही है. इस प्राथमिकता के बावजूद विद्यालयों में छात्रों की भर्ती में हम अभी भी पीछे हैं और पढ़ाई बीच में ही छोड़ने की दर अभी भी अधिक है. जिला प्राथमिक शिक्षा योजना (डीपीईपी) और प्राथमिक शिक्षा को पोषण सहायता (मिड-डे मील्स) आठवीं योजना के दौरान की दो प्रमुख पहलें हैं. राज्यों ने यह दर्शाया है कि प्रारंभिक शिक्षा पर सार्वजनिक क्षेत्र का वर्तमान परिव्यय काफी कम है और प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में बारबरी, पहुँच, पढ़ाई जारी रखने और गुणवत्ता जैसे मुद्दों की दृष्टि से प्राथमिक चरण में इस परिव्यय को बढ़ाए जाने की जरूरत है. पाठशालाओं में भर्ती में सुधार लाने के लिए पक्के पाठशाला भवनों का अभाव एक बड़ी बाधा बनी हुई है तथा इस उद्देश्य के लिए आरआईडीएफ के अंतर्गत सहयोग से प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में अवश्य सुधार होगा.
प्राथमिक शिक्षा के सर्वव्यापीकरण की दिशा में एक कदम के रूप में हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया है. 6-11 वर्ष के आयु समूह वाले सभी पात्र बच्चों को शिक्षा तक पहुँच उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार ने बड़े पैमाने पर आधारभूत संरचना विस्तार कार्यक्रम प्रारंभ किया है. राज्य सरकार ने पूर्व में भी कई पाठशालाएँ खोली थी किन्तु राज्य में सर्वव्यापी शिक्षा हासिल करने का उद्देश्य प्राप्त करने के लिए पाठशाला भवनों की संख्या आवश्यकता से कम है. नए केन्द्रों में पाठशालाएँ शुरू करने से पहले स्थानीय समुदाय से यह अपेक्षा की जाती है कि वे बिना किराए के पाठशाला के लिए आवास उपलब्ध कराएँगे, परन्तु अधिकतर मामलों में उपलब्ध कराया गई आवास सुविधा या तो अपर्याप्त होती है या अस्थाई व्यवस्था होती है. आदर्श रूप में, प्रत्येक प्राथमिक पाठशाला में पाँच कक्षाएँ चलाने के लिए कम-से-कम पाँच कक्ष तो होने ही चाहिए परन्तु पिछले काफी वर्षों से अस्थाई व्यवस्था से ही बड़ी संख्या में प्राथमिक पाठशालाएँ खोल दी गईं. विद्यार्थियों के लिए अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करने के लिए पाठशाला भवनों के रूप में अतिरिक्त आधारभूत सुविधाओं की तत्काल आवश्यकता है.
राज्य सरकार ने स्वस्थ और सुरक्षित परिस्थितियों के अंतर्गत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की आवश्यकता की दृष्टि से राज्य की प्रत्येक प्राथमिक पाठशाला में समयबद्ध रूप में उपयुक्त आवास सुविधा उपलब्ध कराने के लिए आरआईडीएफ - IV के तहत नाबार्ड को एक परियोजना प्रस्तुत की है. राज्य सरकार ने इस परियोजना का नाम सरस्वती बाल विद्या संकल्प योजना रखा है.
उद्देश्य
खुले आसमान के नीचे, प्रकृति की विषमताओं को झेलते पाठशालाओं में पढ़ाई करते बच्चों के लिए सुव्यवस्थित पाठशाला कक्ष उपलब्ध कराना.
परियोजना के घटक
बच्चों के लिए पाठशाला कक्ष और संबंधित सुविधाएँ
प्रमुख विशेषताएँ
परियोजना का संबंध सामाजिक आधारभूत संरचना से है और इन आधारभूत संरचनाओं की राज्य के आठ जिलों में नितांत आवश्यकता है. ग्रामीण लोगों और राज्य सरकार द्वारा संयुक्त रूप से कार्यान्वयन. निर्माण के कार्यों और उनके पर्यवेक्षण में पंचायती राज संस्थानों और स्थानीय समुदायों का सक्रिय योगदान. ग्राम शिक्षा समितियों (वीईसी) द्वारा पाठशाला भवन के निर्माण का कार्य.
अनोखापन
आस-पास के गाँवों के लिए अब पाठशाला का पक्का भवन उपलब्ध है. पेड़ों तले/ खुले आसमान के नीचे के स्थान पर सुव्यवस्थित पाठशाला कक्षों में पढ़ाई होती है. इस सुखद अंतरण से हमारी भविष्य की पीढ़ी के बच्चों और युवाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है.
केरल
परियोजना : वाटरशेड दृष्टिकोण से मिट्टी और जल संरक्षण
भूमिका
केरल में वर्ष में 3125 मिलीमीटर औसत वर्षा होती है. इसमें से 70 प्रतिशत से अधिक की वर्षा दक्षिण-पश्चिमी मानसून ऋतु में 3-4 माह की छोटी से अवधि में ही पड़ जाती है. जून-सितंबर के दौरान बारिश की तीव्रता काफी अधिक 20 मिलीमीटर प्रति घंटा होती है तथा 70-85 सतही मिट्टी का बहाव इसी दौरान होता है. लहरदार भू-प्रदेशों सहित स्थलाकृति की विश्ष्टि प्रकृति के साथ-साथ तेज बारिश पड़ने से तेजी से बहता बारिश का पानी मिट्टी को काट देता है जिसके परिणामस्वरूप जबरदस्त भू-स्खलन होता है और निचले भू-भागों में पानी जमा हो जाता है. भू-क्षरण के कारण, बहती मिट्टी के साथ मिट्टी में मौजूद बहुमूल्य पोषक तत्व भी बह जाते हैं. चूँकि वर्षा का वितरण ठीक नहीं होता है, इस कारण भू-क्षरण के अलावा, कई मैजूदा बागानों को वर्षारहित महीनों (6-7 महीने) में नमी के दबाव से गुजरना पड़ता है और इस कारण पैदावार में कमी आ जाती है जो कि एक चिन्ता का विषय है.
भू-क्षरण के कारण भूमि की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और फसल उत्पादकता पर उसका दुष्प्रभाव पड़ता है, यह बात राज्य सरकार के ध्यान में काफी पहले अर्थात 1955 में ही आ गई थी. तदनुसार, राज्य में पहली पंचवर्षीय योजना के समय से ही मृदा और जल संरक्षण गतिविधियाँ प्रारंभ कर दी गईं थीं. वर्ष 1964 के दौरान केरल भूमि विकास अधिनियम, 1964 लागू कर दिया गया तथा इस अधिनियम को लागू करने का दायित्व मृदा संरक्षण विभाग को सौंपा गया. अनुमान है कि लगभग 9.52 लाख हेक्टेयर की भूमि गंभीर रूप से भू-क्षरण से प्रभावित है. राज्य सरकार ने वाटरशेड विकास के अपने प्रयासों को पूरा करने के लिए आरआईडीएफ सहायता माँगी है. राज्य के उस क्षेत्र की पहचान कर ली गई है, जिसमें तत्काल रूप से मृदा और जल संरक्षण उपायों की आवश्यकता है और उन्हें 62 वाटरशेडों के अंतर्गत चिह्नित (डीलीनिएट) कर लिया गया है. इनमें से चार जिलों में स्थित 11 वाटरशेडों को आरआईडीएफ - IV के तहत निधीकरण हेतु विचार किया गया है.
अवधारणा
राज्य में भूमि और जल के जैवभौतिक संसाधनों को और अधिक खराब होने से बचाना.
उद्देश्य
पानी के बहाव को रोकने के लिए दुर्बल क्षेत्रों के उपचार द्वारा हरियाली रहित वाटरशेडों में भूमि और जल संसाधनों को संरक्षित करना तथा ऊँचाई वाले प्रान्तों में मृदा और जल संरक्षण व मृदा में नमी के दबाव में और दबाव की अवधि में कमी लाकर उच्च मूल्य वाली बागान फसलों की उत्पादकता बढ़ाना/ उनका सुदृढ़ीकरण करना.
परियोजना के घटक
कृषि विज्ञान, घास विज्ञान और कृषि-वानिकी संबंधी उपायों के साथ-साथ मृदा और नमी संरक्षण की टिकाऊ संरचनाएँ.
प्रमुख विशेषताएँ
ऊँची भूमि की बागानी फसलों की उत्पादकता में जोरदार वृद्धि (विभिन्न फसलों में 33 प्रतिशत-121 प्रतिशत). अभियांत्रिकी संरचनाओं की अच्छी गुणवत्ता. अच्छा बैकवर्ड लिंकेज (चारे का बीज). फसल सघनता में बढ़ोत्तरी 38 प्रतिशत-105 प्रतिशत. मिट्टी के कटाव, पानी के बहाव में कमी, कुओं में पानी की उपलब्धता और मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि. उपचारित क्षेत्रों में मिट्टी में पानी की उपलब्धता 41 से 72 दिन की सीमा तक बढ़ गई. उपचारित क्षेत्रों में शुद्ध आय रु. 12100 और रु. 26955 प्रति वर्ष के बीच बढ़ गई. आर्थिक प्रतिफल दर : 25 प्रतिशत-105 प्रतिशत के बीच रही.
अनोखापन
परियोजना को ठेकेदारों को शामिल किए बिना पूरी तरह लोगों की सहभागिता अर्थात् इसे लाभार्थी समितियों के साथ मिलकर कार्यान्वित किया गया.
नागालैंड
परियोजना : वाटरशेड दृष्टिकोण से रबड़ के बागानों का विकास
भूमिका
नागालैंड का भौगोलिक क्षेत्र 16579 वर्ग मीटर है. इसकी जन संख्या 3 मिलियन है. यह अधिकांशतः ग्रामीण है और 1119 गाँवों में रहती है. झूम पद्धतियों और अंधाधुंध कटाई के कारण राज्य के बहुत बड़े क्षेत्र में पेड़ नहीं हैं और हरियाली भी नहीं है. इस प्रकार भूमि बंजर पड़ी हुई है और उसपर किसी प्रकार की आर्थिक गतिविधि नहीं होती है. व्यापक पैमाने पर झूम खेती और बड़े पैमाने पर वनों की कटाई के कारण भूमि की गुणवत्ता में गिरावट को देखते हुए तथा वन संसाधनों के महत्व और संरक्षण को दृष्टि में रखते हुए राज्य सरकार ने वर्ष 1993-94 में बंजर भूमि विकास के लिए एक अलग से संपूर्ण विभाग का सृजन किया. यह विभाग झूमियों को वृक्षारोपण करने और उसके साथ वार्षिक फसलों के अंतर्फसलीकरण के माध्यम से स्थापित खेती करने हेतु प्रोत्साहित करता आ रहा है.
यद्यपि आरआईडीएफ के तहत वृक्षारोपण की योजनाओं का कवर नहीं किया जाता है, फिर भी नागालैंड राज्य में चल रही विशेष परिस्थितियों के मद्देनजर राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत परियोजना को आरआईडीएफ मानदंडों के दायरे में लाने की संभावनाओं को तलाशने हेतु राष्ट्रीय बैंक ने एक अध्ययन किया था.
भारतीय रबड़ बोर्ड से सब्सिडी की उपलब्धता के चलते नाबार्ड ने इस कार्यक्रम पर विचार किया है.
अवधारणा
पारिस्थितिकी में सुधार लाने हेतु झूम खेती की भूमियों में कवर फसल के रूप में रबड़ का आर्थिक दृष्टि से वृक्षारोपण.
उद्देश्य
रबड़ के पेड़ों के रोपण को एक अभियान के रूप में प्रोत्साहित करना तथा वाटरशेड समुदायों के आर्थिक विकास के लिए झुम खेती के एक विकल्प के रूप में रबड़ के पेड़ों का रोपण उपलब्ध करवाना, मृदा क्षरण की रोकथाम, उत्पादकों के लिए दीर्घकालिक आय स्रोत का सृजन तथा प्राकृतिक रबड़ के राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि.
परियोजना के घटक
रबड़ के पेड़ों के रोपण हेतु उसकी 6 वर्ष की जेस्टेशन अवधि के पहले 3 वर्षों के लिए स्थापना लागत दी जाती है जिसमें राज्य सरकार और भारतीय रबड़ बोर्ड द्वारा रखरखाव और प्रसंस्करण सहयोग उपलब्ध कराया जाता है.
प्रमुख विशेषताएँ
रबड़ के बागानों और अन्य आर्थिक लाभवाली प्रजातियों के वृक्षों और आर्थिक लाभकारी छायादार फसलों को लगाकर आस्तियों के सृजन द्वारा झूम कृषि के दुष्प्रभावों को नियंत्रित करना. झूम खेती करने वाले किसानों को सुव्यवस्थित करना. महत्वपूर्ण आर्थिक प्रजाति होने के साथ-साथ रबड़, झूम खेती वाली बंजर भूमियों को जैविक सुरक्षा प्रदान करता है.
अनोखापन
राज्य वाटरशेड विकास विभाग के नेतृत्व में वृक्षारोपण अभियान में लोगों को शामिल करके यह परियोजना राज्य में वांछित वन व्यवस्था उपलब्ध करा रही है. एक विशेष मामले के रूप में नागालैंड में रबड़ को आधारभूत संरचना के रूप में विचार किया गया था.
पंजाब
परियोजना : कांडी (पंजाब) में ग्रामीण पेय जल
भूमिका
जीवन, पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने, आर्थिक विकास और सभ्यता को आगे बढ़ाने के लिए पानी अति महत्वपूर्ण है. विश्व के अनेक देशों के लिए जल संसाधनों की योजना और प्रबंधन तथा उसका इष्टतम उपयोग अति आवश्यक मुद्दा है, यही नहीं विशाल जनसंख्या के कारण भारत के लिए तो यह मुद्दा और भी महत्वपूर्ण है.
पंजाब राज्य का क्षेत्र 50362 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र है तथा यह देश के उत्तरी भाग में स्थित है. इस राज्य में उप-उष्णकटिबंधीय, उप-आर्द्र महाद्वीपिय मानसूनी मौसम रहता है और पंजाब में दक्षिण पूर्वी ग्रीष्मकालीन मानसून प्रभावी होता है. उप-पर्वतीय जिलों अर्थात् रोपड़, गुरदासपुर और होशियारपुर में 95-100 सेंटीमीटर की औसत वर्षा होती है और दक्षिण पश्चिमी जिलों में 33-43 सेंटीमीटर की. राज्य में सतलज, ब्यास और रावी नाम की तीन प्रमुख नदियाँ हैं. घग्घर एक अन्य नदी है जो पंजाब से होकर राजस्थान के थार रेगिस्तान तक जाती है. राज्य में जलविज्ञान संबंधी अनुकूल ढांचा उपलब्ध है जिसके फलस्वरूप राज्य में भूजल एक अति महत्वपूर्ण संसाधन के रूप में विद्यमान है. इसका प्रयोग सिंचाई और पेय जल उपलब्ध कराने हेतु सार्वजनिक स्वास्थ्य जल आपूर्ति के रूप में किया जाता रहा है. राज्य के दक्षिण पश्चिमी भाग में नहरों के माध्यम से सतह स्थित जल द्वारा पीने के पानी की आपूर्ति की जा रही है. इन नहरों को राज्य की प्रमुख नदियों से पानी प्राप्त होता है. पंजाब के मध्यवर्ती और उत्तरी जिलों में सार्वजनिक स्वास्थ्य ट्यूबवेलों से पेय जलापूर्ति की जाती है. ये ट्यूबवेल उस क्षेत्र के उथले जलस्रोत के साथ-साथ गहरे जलस्रोत में उपलब्ध पानी को भी खींच लेते हैं. एक ओर जहाँ बढ़ती जनसंख्या और फैलती आर्थिक गतिविधियाँ, घरेलू, औद्योगिक, कृषि आदि विविध आवश्यकताओं के लिए पानी की माँग बढ़ाती हैं वहीं दूसरी ओर बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण जल संसाधनों की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है.
अवधारणा
गाँवों के सभी परिवारों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना.
उद्देश्य
निजी कनेक्शनों और स्टैंड पोस्टों (सार्वजनिक नलों) के माध्यम से परिवारों को पेयजल की आपूर्ति करना.
परियोजना के घटक
पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर पानी की आपूर्ति के लिए ट्यूबवेलों और वितरण प्रणाली का विनिर्माण.
प्रमुख विशेषताएँ
परियोजना पाँच जिलों नामतः पटियाला, रोपड़, नवाँशहर, होशियारपुर और गुरदासपुर में कार्यान्वित की जा रही है. इससे कुल 218 गाँवों को लाभ होगा. परियोजना में विलेज सपोर्ट टीम (वीएसटी) नाम से सामुदायिक सहभागिता घटक के साथ-साथ रु.30.00 लाख का आरआईडीएफ ऋण भी शामिल है. यह घटक केवल इस परियोजना के लिए ही मंजूर किया गया है तथा इसका लक्ष्य पानी के प्रभावशाली उपयोग और उसके संरक्षण के संबंध में लोगों में जागरूकता लाना.
परियोजना का कार्यान्वयन, विशेष रूप में साउथ विंग में समय से पहले ही पूरा हो रहा है. विभाग को आशा है कि वह 30 जून 2002 तक अपनी सभी 61 योजनाओं को पूरा कर लेगा, जबकि मंजूर चरणों की अवधि 31 मार्च 2003 तक की है.
लाभार्थी और पंचायत प्रतिनिधि जल आपूर्ति परियोजना और विभाग द्वारा बिछाए गए वितरण नेटवर्क के कवरेज से काफी संतुष्ट हैं. इस अच्छे कार्य हेतु प्रदान किए गए वित्तपोषण के लिए नाबार्ड और इस कार्य को तेज़ी से पूरा करने के लिए कार्यान्वयनकर्ता विभाग के प्रति लाभार्थी आभारी (कृतज्ञ) हैं.
वे बढ़े हुए किराए को देकर भी 60 से 70 प्रतिशत परिवार पानी का निजी कनेक्शन लेने के लिए तैयार थे.
सार्वजनिक नलों में पानी की बर्बादी को रोकने के लिए पंचायतें यह संकल्प पारित करने हेतु राजी हो गई हैं कि उन सार्वजनिक नलों (स्टैंड पोस्टों) को बंद किए जाने हेतु कार्यान्वयनकर्ता विभाग को प्राधिकृत किया जाए, जिनसे मरम्मत किए जाने के बावजूद भी पानी रिसता रहता है.
तमिलनाडु
परियोजना : तमिलनाडु में वर्षा जल संग्रहण संरचनाएँ
भूमिका
भारत में कुल फसली क्षेत्र में से लगभग 105 मिलियन हेक्टेयर अथवा 70 प्रतिशत का क्षेत्रफल वर्षा सिंचित है और देश के कुल तिलहन और दलहन उत्पादन में से 90 प्रतिशत का उत्पादन इसी क्षेत्र में होता है. वर्षा सिंचित कृषि के विकास को थ्रस्ट एरिया के रूप में मान्यता दी गई है. वर्षा सिंचित क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय वाटरशेड विकास कार्यक्रम (एनडब्ल्यूडीपीआरए) और सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम जैसे केन्द्रीय प्रायोजित कार्यक्रमों पर बल दिया गया है.
तमिलनाडु एक कृषि प्रधान राज्य है जिसकी अधिकांश आबादी अपनी आजीविका के लिए प्राथमिक रूप से कृषि क्षेत्र पर निर्भर रहती है. चूँकि सकल बुआई क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा वर्षा सिंचित है, इस कारण जलवायु में आने वाले उतार-चढ़ावों का यहाँ के कृषि समुदायों पर काफी प्रभाव रहता है. यही नहीं, सुनिश्चित सिंचाई वाले क्षेत्रों पर भी वर्षा का काफी गहरा प्रभाव रहता है, यही कारण है कि राज्य को अक्सर सूखे की स्थिति का सामना करना पड़ता रहता है. राज्य में 979 मिलिमीटर प्रति वर्ष बारिश होती थी जिसमें से लगभग 34 प्रतिशत दक्षिण पश्चिमी मानसून के दौरान, 48 प्रतिशत उत्तर पूर्वी मानसून के दौरान और शेष शीतकालीन/ ग्रीष्मकालीन/ गैर-मौसमी वर्षा होती थी. वर्ष 2001 के दौरान, राज्य में औसत वास्तविक वर्षा 21 प्रतिशत कम हुई और वर्ष 2000 में यह कमी 13 प्रतिशत थी. पिछले तीन वर्षों में लगातार पड़ रहे सूखे ने राज्य में फसलों की खेती के लिए पानी की उपलब्धता पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव डाला है.
सूखे की स्थिति के कारण राज्य के लगभग सभी जिलों में सभी प्रमुख फसलें बुरी तरह प्रभावित हुई हैं. खरीफ (2002-03) के दौरान खेती के अंतर्गत आने वाले कुल क्षेत्र में से 0.912 लाख हेक्टेयर पूरी तरह सूखे की चपेट में था और 1.611 लाख हेक्टेयर में आंशिक रूप से सूखा पड़ा. रबी मौसम के दौरान 2.831 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पूरी तरह और 3.071 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में आंशिक सूखा पड़ा. केवल सूखे के कारण राज्य में पूरी तरह नष्ट हुई फसलों के फलस्वरूप खरीफ के दौरान 13.29 लाख मीट्रिक टन और रबी के दौरान 16.16 लाख मीट्रिक टन की उत्पादन हानि हुई. इनका मूल्य क्रमशः रु.171.18 करोड़ और रु.851.437 करोड़ आंका गया.
कृषि और आजीविका के लिए पानी की महत्ता को महसूस करते हुए, राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक राज्य के विभिन्न प्रांतों में जल संग्रहण संरचनाओं को सहयोग प्रदान करता आ रहा है. ये संरचनाएँ पानी और मिट्टी के संरक्षण के साथ-साथ बागानी फसलों के लिए पानी व मवेशियों के लिए पीने का पानी उपलब्ध कराती हैं, मत्स्य पालन संभव बनातीं हैं और भू-जल को रीचार्ज करती हैं. राष्ट्रीय बैंक अपने केएफडब्ल्यू समर्थित वाटरशेड विकास कार्यक्रम, आरआईडीएफ के माध्यम से राज्य सरकारों को ऋण द्वारा डग आउट तालाबों, चेक डैमों, नाला बंडों, पिक-अप वीयरों आदि जैसी जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण में सरकार के प्रयासों को पूरा करता रहा है. स्थान विशिष्ट संरचनाओं के लिए समन्वयन, संवर्धन, विकास और ऋण सहयोग के माध्यम से राष्ट्रीय बैंक इस संबंध में अति-सक्रिय भूमिका निभा रहा है.
अवधारणा
तमिलनाडु राज्य में 80,421 मानवीय ठिकानों में से केवल 28,623 ठिकानों में ही पूरी तरह ग्रामीण जल आपूर्ति होती है. कई खंडों में भू-जल में अत्यंत कमी के कारण पेय जल का संकट काफी गम्भीर बन गया है. वंचित क्षेत्र में भू-जल के उपयोग को न्यूनतम करने के लिए वाटरशेड दृष्टिकोण पर आधारित जल संसाधनों का संरक्षण और प्रबंधन इस परियोजना का लक्ष्य है.
उद्देश्य
जियोग्राफिकल इंफॉर्मेशन सॉफ्टवेयर (जीआईएस) के उपयोग से उपग्रह/ विमानों से लिए गए चित्रों को भू-स्तरीय प्रकरण मानचित्रों (ग्राउंड लेविल थिमैटिक मैपों) के साथ मिलान करके वैज्ञानिक तरीके से पहचान किए गए रीचार्ज क्षेत्रों में उपयुक्त जल संग्रहण ढांचों के निर्माण के माध्यम से भू-जल रीचार्ज हेतु बारिश के पानी का संग्रहण करना इस परियोजना का उद्देश्य है.
परियोजना के घटक
वर्तमान पेय जल स्रोतों के आस-पास चेक डैमों और नाला बंधों का विनिर्माण.
प्रमुख विशेषताएँ
परियोजना हाल ही में शुरू की गई है तथा यह उम्मीद की जा रही है कि इससे तमिलनाडु के सूखा प्रभावित व पेय जल अभाव से ग्रस्त जिलों के रीचार्ज क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भू-जल का रीचार्ज होगा. चेक डैमों और पक्के नालों का उपयोग जल रीचार्ज संरचनाओं के रूप में किया गया है.
अनोखापन
पहले से उपलब्ध कुओं, ट्यूबवेलों आदि के जल स्तर में वृद्धि द्वारा पेय जल संकट में कमी करना. आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकियों का उपयोग करते हुए अति वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परियोजना की परिकल्पना की गई है. पर्यावरण की बहाली में और सृजित की गई संरचनाओं का रखरखाव करने में जन प्रतिबद्धता और सहभागिता इस कार्यक्रम की अनोखी बात है.
पश्चिम बंगाल
परियोजना : शंकरपुर फिशिंग हार्बर - चरण II (जिला मिद्नापुर)
भूमिका
मत्स्य संबंधी क्रियाकलापों को एक जगह केन्द्रित करने की दृष्टि से फिशिंग हार्बर की स्थापना एक उचित कदम है. दूसरे शब्दों में फैले और बिखरे हुए एक उद्योग को परिवर्तित करके आधुनिक प्रणाली द्वारा कार्य और विपणन करने के लिए फिशिंग हार्बर बनाना सही है. अतः समुद्री मत्स्य पालन के विकास में फिशिंग हार्बर महत्वपूर्ण है क्योंकि मत्स्य इकाइयों के उचित ढंग से कार्य करने के लिए तथा ताजा मछली अथवा उसके प्रसंस्करण के लिए मछली के वितरण की गुणवत्ता और उचित मात्रा में प्राप्त करने के लिए फिशिंग हार्बर काफी महत्वपूर्ण हैं. प्रत्येक वर्ष बढ़ रही नई नावों की बड़ी संख्या को ध्यान में रखते हुए अब तक सृजित किए गए फिशरी हार्बरों की क्षमता अति नगण्य है. एक पूर्ण-विकसित फिशरी हार्बर में फिश लैंडिंग क्वे, बर्थिंग बेसिन, ईंधन पुनः भरने के लिए एक आउट-फिटिंग क्वे, पानी और फिशिंग ट्रिप के लिए अन्य सहायक उपकरण, सभी प्रकार के ज्वार के समय में आवाजाही की सुविधा के लिए उप-मार्ग और मरम्मत के लिए स्लिप-वे अथवा ड्राई-डॉक होता है. समुद्रीय मात्सिकी में इस ढांचे का इतना महत्व होने के बावजूद भी राज्य सरकार द्वारा इस दिशा में की गई प्रगति की गति काफी धीमी रही है.
अवधारणा
जिले में अंतर्देशीय और समुद्रीय मात्स्यिकीय गतिविधि के बढ़ते विकास के कारण बंदरगाह की फिशिंग ढांचागत सुविधाओं की माँग और सप्लाई में आए अंतर को पूरा करना.
उद्देश्य
पर्याप्त लैंडिंग व बर्थिंग सुविधाएँ और संबंधित फिशिंग ढांचा उपलब्ध कराना.
परियोजना के घटक
ईंधन, पानी, मरम्मती लंगरगाह, उप-मार्ग व्यवस्थाओं के साथ-साथ वर्कशॉप, बर्फ संयंत्र, बिजली वितरण प्रणाली, नीलामी घर, जल-मल निकास सुविधाएँ, सड़क सुविधाएँ आदि हार्बर के क्षेत्र के अंदर ही उपलब्ध कराना.
प्रमुख विशेषताएँ
परियोजना से पहले मछलीमार नौकाओं को लैंडिंग, लंगर डालने की जगह और संबंधित सुविधाएँ व मछली पकड़ने का साजो-सामान प्राप्त करने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती थी अब 132 मीटर लंबी फिश लैंडिंग जेटी के निर्माण से यह आसान हो गया है. बेहतर आधारभूत सुविधाओं के कारण इस क्षेत्र में मछली पकड़ने के कार्य को एक नई गति मिली है. परियोजना को शुरू करने के केवल 9 माह के अंदर परियोजना से होने वाली राजस्व आय में उल्लेखनीय वृद्धि (वर्ष 1999-2000 में रु.7.79 लाख से बढ़कर रु. 8.23 लाख) हुई है तथा आने वाले वर्षों में इस आय में कई गुना वृद्धि होने की उम्मीद है.
अनोखापन
परियोजना में मछली पकड़ने की क्षेत्र के परंपरागत अंतर्देशीय तरीकों को समान रूप से महत्व दिए जाने के साथ-साथ समुद्रीय मछली पकड़ने की गतिविधियों में मशीनीकरण पर वांछित जोर दिया जा रहा है. |