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National Bank for Agriculture and Rural Development
 आरआईडीएफ का शुभारंभ  
 आरआईडीएफ एक नजर में  
 मंजूरियाँ और संवतरण  
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 आरआईडीएफ XVI - नीति परिपत्र  
 आरआईडीएफ के तहत मंजूर परियोजनाओं की राज्‍यवार सूची  
वर्षांत समीक्षा  
 चालू परियोजनाओं की राज्‍यवार सूची  
       
   
 

. इन-हाउस अनुप्रवर्तन

राष्‍ट्रीय बैंक आरआईडीएफ के तहत मंजूर परियोजनाओं की सुव्‍यवस्थित और निरंतर अनुप्रवर्तन पर काफी जोर देता है. वर्ष 2009-10 के दौरान, कुल 5,708 परियोजनाओं की क्षेत्रीय कार्यालयों के विभिन्‍न अधिकारियों द्वारा अनुप्रवर्तन किया गया. फील्‍ड मॉनिटरिंग के साथ-साथ डेस्‍क समीक्षाएँ और आवधिक विवरणियों के माध्‍यम से भी अनुप्रवर्तन किया जाता. परियोजनाओं का सुचारू कार्यान्‍वयन सु‍निश्चित करने की दृष्टि से राज्‍य स्‍तर पर प्रधान कार्यालय और क्षेत्रीय कार्यालयों में तैनात अधिकारी और जिला स्‍तर पर जिला विकास प्रबंधक परियोजनाओं की अनुप्रवर्तन करने हेतु उनके नियमित दौरे करते रहते हैं और फील्‍ड स्‍तर के कार्यकर्ताओं के साथ समस्‍याओं पर निरंतर विचार विमर्श करते रहते हैं.

डेस्‍क अनुप्रवर्तन, फील्‍ड अनुप्रवर्तन, निधियों के आहरण की समीक्षा, पर्यवेक्षकीय अनुप्रवर्तन और परियोजना पूरी होने की रिपोर्टों को शामिल करते हुए अनुप्रवर्तन व्‍यवस्‍था को स्‍ट्रीमलाइन और फाइन-ट्यून किया गया था. अपवादों को छोड़ दें तो, आरआईडीएफ परियोजनाओं की अनुप्रवर्तन व्‍यवस्‍था अनुप्रवर्तन के सिद्धांतों पर आधारित होती है जिसमें अनुप्रवर्तन के दौरान विस्‍तृत जानकारी के स्‍थान पर महत्‍वपूर्ण जानकारी प्राप्‍त की जाती है, विभिन्‍न भागिदारों और अंशधारकों का क्षमता निर्माण और सूचना प्रौद्योगिकी का व्‍यापक उपयोग किया जाता है. इसके उद्देश्‍य निम्‍नानुसार हैं :

  • परियोजनाओं को भौतिक रूप से पूरा करने को सुगम बनाना;
  • लागतों की वृद्धि में रोकथाम;
  • अनमोदित डिजाइन और गुणवत्‍ता मापदंडों का अनुपालन सुनिश्चित करना;
  • नाबार्ड के अनुप्रवर्तन की प्रत्‍यक्ष उपस्थिति को सुनिश्चित करना; और  
  • ग्रामीण समृद्धि के प्रतिपूरक और अनुपूरक निवेश के नए अवसरों की पहचान करना.

आरआईडीएफ परियोजनाओं के अनुप्रवर्तन के लिए दिशानिर्देश

1. डेस्‍क अनुप्रवर्तन

1.1 डेस्‍क निगरानी से महत्‍वपूर्ण समस्‍याओं की पहचान करने में सहायता मिलती है जैसे कि उन परियोजनाओं के बारे में पता चलता है‍ जो शुरू नहीं हुई हैं, जो परियोजनाएँ धीमी गति से चल रही हैं, ऐसे क्षेत्र जहाँ परियोजनाओं की अधिकता है और वे क्षेत्र जहाँ अपर्याप्‍त/ कोई परियोजना नहीं चल रही है.

1.2 कार्यान्‍वयनकर्ता विभागों की क्षमता का आकलन : यह एक महत्‍वपूर्ण पहलू है तथा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि परियोजनाओं के कार्यान्‍वयन की गति और गुणवत्‍ता, उनका कार्यान्‍वयन करने वाले विभागों/ प्रभागों की कार्यक्षमता के अंतर्गत हो.

2. फील्‍ड अनुप्रवर्तन
2.1 फिलहाल आरआईडीएफ परियोजनाओं की अनुप्रवर्तन परियोजना आधार पर की जा रही है. तथापि, परियोजनाओं की संख्‍या में वृद्धि के कारण निर्धारित क्षेत्र-आधारित फील्‍ड अनुप्रवर्तन व्‍यवस्‍था अधिक प्रभावशाली हो सकती है. डेस्‍क अनुप्रवर्तन से मुद्दों को एक जगह समेटा जा सकता है और उचित नमूने (नों) का चयन करने में सहायता मिलती है जिसके फलस्‍वरूप, फील्‍ड अनुप्रवर्तन में मदद मिलती है.

2.2 अनुप्रवर्तन और गुणवत्‍ता नियंत्रण में परिमाणात्‍मक आकलन की व्‍यवस्‍था : परियोजनाओं के  अनुप्रवर्तन की जिम्‍मेदारी चूँकि प्राथमिक रूप से राज्‍य सरकार के कार्यान्‍वयनकर्ता विभाग की होती है, अतः यह आवश्‍यक है कि राज्‍य सरकार के परियोजना प्रस्‍ताव में ही कार्यान्‍वयनकर्ता विभाग में उपलब्‍ध अनुप्रवर्तन और गुणवत्‍ता के परिमाणन की व्‍यवस्‍था के बारे में सूचना दी जाए. परिमाणनयोग्‍य ऐसे विवरण मंजूरी पत्र के भाग बन जाएँगे. कार्यान्‍वयनकर्ता विभागों द्वारा अपनाई जा रही आंतरिक अनुप्रवर्तन और गुणवत्‍ता नियंत्रण व्‍यवस्‍था की गुणवत्‍ता और पर्याप्‍तता की फील्‍ड दौरों के दौरान जाँच की जाएगी और इस संबंध में पाई गई चूकों को समुचित मंचों पर राज्‍य सरकार की जानकारी में लाया जाएगा ताकि कार्यान्‍वयनकर्ता विभागों की आंतरिक अनुप्रवर्तन व्‍यवस्‍था को सुदृढ़ किया जा सके.

2.3 क्षेत्र-वार/ अंचल-वार अनुप्रवर्तन : नाबार्ड ने क्षेत्र-वार, अंचल-वार फील्‍ड अनुप्रवर्तन की शुरुआत की है. यह फील्‍ड अनुप्रवर्तन परियाजनाओं की संख्‍या और आकार के आधार पर क्षेत्रीय कार्यालयों के अधिकारियों और जिला विकास प्रबंधकों द्वारा किए जाएँगे.  कार्यान्‍वयनकर्ता विभाग के मुख्‍य अभियंता/ अधीक्षक अभियंता के परिचालनात्‍मक क्षेत्र को एक अंचल माना जाता है तथा नमूने की वस्‍तुपरक समीक्षा के आधार पर किसी चयनित अंचल में किसी एजेंसी अर्थात् सिंचाई, पीडब्‍ल्‍यूडी, प्राथमिक शिक्षा, वन विभाग आदि की चालू परियोजनाओं की समग्र समीक्षा अलग-अलग की जाएगी. विभिन्‍न कार्यान्‍वयनकर्ता एजेंसियों के सभी अंचलों को वर्ष में कम-से-कम एक बार कवर किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं.

2.4 परिवर्तित होने वाले परिव्‍यय की परियोजनाओं की अनुप्रवर्तन : सामान्‍यतः फील्‍ड अनुप्रवर्तन की आवृत्ति परियोजना में शामिल ऋण की राशि के आधार पर तय होती है, अतः, मंजूर की गई ऋण राशि की मात्रा के आधार परियोजनाएँ वर्गीकृत होती हैं. तदनुसार परियोजनाओं को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है, वे हैं (i) रु. 5 करोड़ और रु. 5 करोड़ तक की ऋण राशि वाली परियोजनाएँ (i) रु.5 करोड़ से अधिक किन्‍तु रु.25 करोड़ से कम ऋण राशि वाली परियोजनाएँ और (iii) रु.25 करोड़ और उससे अधिक की ऋण राशि वाली परियोजनाएँ. जहाँ तक उपर्युक्‍त वर्ग (i) के अंतर्गत आने वाली परियोजनाओं की अनुप्रवर्तन की जाने वाली परियोजनाओं की संख्‍या का प्रश्‍न है, कुल परियोजनाओं में से 10 प्रतिशत की संख्‍या की अंचलीय/ क्षेत्रीय अनुप्रवर्तन वार्षिक आधार पर की जाती है. वर्ग (ii) के अंतर्गत आने वाली सभी परियोजनाओं की वार्षिक आधार पर अनुप्रवर्तन की जाती है तथा वर्ग (iii) के अंतर्गत आने वाली प्रत्येक परियोजना की वर्ष में कम-से-कम दो बार अनुप्रवर्तन की जाती है.

2.5 चयन मानदंड : भौतिक प्रगति के साथ-साथ वित्‍तीय प्रगति, आहरण की धीमी प्रगति, दौरा न की गई परियोजनाओं, अलग भौगोलिक/ पारिस्थितिकीय क्षेत्रों की परियोजनाओं, प्रतिकूल जन प्रतिक्रिया वाली परियोजनाओं, प्रकरण अध्‍ययन हेतु दस्‍तावेजीकरण के लिए पात्र सफल परियोजनाओं के आधार पर परियोजनाओं का चयन  किया जाता है.

2.6 निष्‍कर्षों की सूचना : कोर मुद्दों पर क्षेत्र-वार निष्‍कर्षों की सूचना क्षेत्रीय कार्यालय देते हैं ताकि राज्‍य सरकार के समुचित स्‍तर पर आवश्‍यक अनुवर्ती कार्रवाई की जा सके. किन्‍तु वर्ग (ii) और (iii) के तहत आने वाली परियोजनाओं के संबंध में परियोजना विशेष से संबंधित पहचान किए गए मुद्दों/ बाधाओं की सूचना राज्‍य सरकार के समुचित स्‍तर के अधिकारी को दी जाती है ताकि शीघ्र आवश्‍यक अनुवर्ती कार्रवाई की जा सके.

2.7 सामाजिक अनुप्रवर्तन साधन : अनुप्रवर्तन के हमारे प्रयासों के अनुपूरक के रूप में यह वांछित है कि परियोजनाओं, विशेष रूप से जनता की सहभागिता वाली छोटी परियोजनाओं के भौतिक और वित्‍तीय विवरणों को स्‍थानीय भाषा में प्रदर्शित करवाकर 'सामाजिक अनुप्रवर्तन' को प्रोत्‍साहित किया जाए. भौतिक विवरण सामान्‍यतः आम आदमी के समझने लायक स्‍थानीय भाषा में लिखवाए जाने चाहिए. बड़ी संख्‍या में मंजूर की गई, चेक डैमों आदि जैसी छोटी परियोजनाओं में धातु के बने बोर्डों के स्‍थान पर आस-पास की दीवारों पर उपलब्‍ध जगह पर यह विवरण लिखवाया जा सकता है ताकि इस शीर्ष के अंतर्गत व्‍यय को कम रखा जा सके.

3. निधियों का आहरण

यह हमारा अनुभव रहा है कि आरआईडीएफ के अंतर्गत निधियों का आहरण सामान्‍यतया फरवरी और मार्च महीनों में ही अधिक किया जाता है यद्यपि परियोजनाओं की मंजूरी और कार्यान्‍वयन वर्ष भर लगातार चलता रहता है. कुछ अनुप्रवर्तन अध्‍ययनों से यह बात सामने आई है कि राज्‍य सरकारों द्वारा आहरण आवेदन पत्रों की प्रस्‍तुति में अत्‍यधिक देरी की जाती है. राज्‍य सरकारों को वास्‍तविक कार्यान्‍वयन के समक्ष आरआईडीएफ के अंतर्गत निधियों के निरंतर प्रवाह को और अधिक सुगम बनाने की दृष्टि से इसे विकेन्‍द्रीकृत करने का निर्णय लिया गया है जिसके अनुसार वित्‍त विभाग की समुचित अधिसूचना के अंतर्गत कार्यान्‍वयनकर्ता विभाग का मुख्‍य अभियंता नाबार्ड को आहरण आवेदनपत्र प्रस्‍तुत कर सकता है. तथापि, निधियाँ वित्‍त विभाग को ही जारी की जाएँगी. आरआईडीएफ ऋणों के दस्‍तावेज़ीकरण, प्राप्तियों और चुकौती आदि के लिए वित्‍त विभाग ही नोडल विभाग के रूप में कार्य करता रहेगा. इसी प्रकार नाबार्ड मासिक आधार पर आहरण आवेदनपत्र प्राप्‍त करने हेतु भी सहमत है. इससे निधियों को जारी करने के समाय में भी कमी आएगी.

4. पर्यवेक्षकीय अनुप्रवर्तन व्‍यवस्‍था - उच्‍च स्‍तरीय समितियाँ

4.1 उच्‍च स्‍तरीय समितियों (एचपीसी) की अवधारणा काफी प्रभावशाली सिद्ध हुई है. यह भी निर्णय लिया गया है कि, प्रशासनिक सचिवों और कार्यान्‍वयनकर्ता विभागों के अध्‍यक्षों के साथ त्रैमासिक बैठकें आयोजित करने की व्‍यवस्‍था शुरू की जाए. इस व्‍यवस्‍था से क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा समुचित कार्यसूची बनाना जरूरी हो जाएगा. साथ ही स्‍थानीय परिस्थितियों के आधार पर कार्यान्‍वयनकर्ता विभागों के अंचल प्रमुखों को भी इन बैठकों में आमंत्रित करना चाहिए.

4.2 अनुपूरक समीक्षा बैठकें : कुछ क्षेत्रीय कार्यालयों ने कार्यान्‍वयनकर्ता विभागों के स्‍थानीय अधिकारियों और जिला विकास प्रबंधकों का शामिल करते हुए जिला कलक्‍टर की अध्‍यक्षता में जिला स्‍तरीय समीक्षा समिति की प्रणाली का शुभारंभ किया है. विभिन्‍न स्‍थानीय परिचालनात्‍मक समस्‍याओं को सुलझाने में ये समितियाँ काफी कारगर सिद्ध हुई हैं.

5. परियोजना पूरी होने की रिपोर्ट (पीसीआर)

परियोजना पूर्ण रिपोर्ट प्राप्‍त करने का उद्देश्‍य ग्रामीण क्षेत्रों में आय और रोजगार के लिए सृजित संभावनाओं का समग्र आकलन करना है और साथ ही परियोजना को पूरा करने का सुनिश्चित कराना है. इसके अलावा इसका उद्देश्‍य भविष्‍य में इस प्रकार की परियोजनाओं के वित्‍तपोषण के लिए कार्यनीति बनाना है. तथापि, पूरी हो चुकी परियोजनाओं की परियोजना पूरी होने की रिपोर्टें प्राप्‍त होने की स्थिति उतनी अच्‍छी नहीं है. अतः पीसीआर की प्राप्ति और उनके उपयोग में सुधार लाने की दृष्टि से इस संबंध में निम्‍नलिखित परिवर्तन करने का निर्णय लिया गया है -

(क) ट्यूबवेलों, ग्राम सड़कों, प्राथमिक पाठशालाओं, चेक डैमों आदि जैसी छोटी परियोजनाओं के मामले में एस.ई. जैसे अंचल-प्रभारियों की पीसीआर और रु.1 करोड़ से अधिक के आरआईडीएफ ऋण वाली परियोजनाओं के मामलों में विभाग प्रमुखों की पीसीआर को स्‍वीकार किया जाएगा. (ख) क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा खेप पूरी होने की क्षेत्र-वार रिपोर्ट (टीसीआर) तैयार की जाएगी जिन्‍हें समुचित उपयोग हेतु प्रधान कार्यालय द्वारा समेकन किया जाएगा.

6. विविध मध्‍यस्‍थताए

6.1 यद्यपि आरआईडीएफ पोर्टफोलियो में उल्‍लेखनीय प्रगति हो रही है फिर भी सभी हितधारकों का क्षमता निर्माण काफी आवश्‍यक होता है. क्षमता निर्माण के लिए आरआईडीएफ के अंतर्गत फील्‍ड-अनुभवों का सुव्‍यवस्थित दस्‍तावेज़ीकरण भी काफी जरूरी होता है. सभी हितधारकों के क्षमता निर्माण के लिए निम्‍नलिखित उपाय किए गए हैं -
(क) कार्यान्‍वयनकर्ता विभागों के अधिकारी
संबंधित स्‍टाफ को आरआईडीएफ उद्देश्‍यों, परियोजना तैयार करने, परिचालनात्‍मक पहलुओं, नाबार्ड से निधियों के आहरण, अनुप्रवर्तन, गुणवत्‍ता नियंत्रण पहलुओं, परियोजनाओं से सामाजिक और आर्थिक लाभों, परियोजना पूरी होने की रिपोर्ट तैयार करने, संभव निवेश के नए अवसरों की पहचान करने आदि के क्षेत्र में उन्‍मुखीकरण करने के प्रयास किए गए हैं. कार्यान्‍वयनकर्ता विभागों के प्रमुखों के साथ मिलकर अंचल स्‍तर पर कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है.

(ख) क्षेत्रीय कार्यालयों में आरआईडीएफ स्‍टाफ

जिला विकास प्रबंधकों सहित आरआईडीएफ अनुभागों में कार्यरत स्‍टाफ सदस्‍यों को उपयुक्‍त प्रशिक्षण प्रदान करने हेतु उन्‍मुखीकरण कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है.

(ग) नाबार्ड के जिला विकास प्रबंधक

(i) जिला विकास प्रबंधकों को चयनात्‍मक आधार पर पूर्व-मूल्‍यांकन फील्‍ड दौरों के साथ जोड़ा जाता है ताकि उन्‍हें परियोजनाओं से संबंधित हर संभव जानकारी से अवगत कराया जा सके; (ii) जिला विकास प्रबंधकों के लिए मूल्‍यांकन, अनुप्रवर्तन के दौरान और तकनीकी शब्‍दावली आदि से संबंधित जाँच किए जाने वाले मुद्दों / पहलुओं की जानकारी देने हेतु फील्‍ड दौरे रखे जाते हैं ताकि कार्यान्‍वयनकर्ता विभागों के साथ प्रभावशाली संप्रेषण सुगम हो सके.

(घ) आरआईडीएफ परियोजनाओं का उपयोग करने वाले

आरआईडीएफ के सहयोग से सृजित आस्तियों के सफल कार्यान्‍वयन और रखरखाव के लिए उनके उपयोगकर्ताओं की सहभागिता महत्‍वपूर्ण होती है. परियोजना के फायदों से लाभान्वित होने वाले ग्रामवासियों को परियोजना की पहचान किए जाने के समय से ही शामिल किया जाना चाहिए. उन्‍हें जल उपयोगकर्ता संघ (डब्‍ल्‍यूयूए) जैसे संघों का गठन करने हेतु प्रोत्‍साहित किया जाना चाहिए. सफल परियोजनाओं के परिचयात्‍मक दौरों के माध्‍यम से, विशेष रूप से स्‍थानीय समुदायों के सहयोग से जल उपयोगकर्ता संघ के सदस्‍यों जैसे उपयोगकर्ताओं के क्षमता निर्माण को सुगम बनाना. परियोजना लागत की 0.5 प्रतिशत राशि उपयोगकर्ताओं के क्षमता निर्माण हेतु निर्दिष्‍ट किया जा सकता है
.

7. अनुभवों का दस्‍तावेज़ीकरण

अनुभवों के प्रसार और आरआईडीएफ उधारीकरणों से प्राप्‍त सीखों का प्रलेखीकरण किया जाना तथा साथ ही आरआईडीएफ निवेशों के प्रभाव को समुचित रूप में विकसित किया जाना बेहद जरूरी है. सफलताओं (असफलताओं को भी), विकसित उत्‍कृष्‍ट पद्धतियों आदि को अभिलिखित करने के प्रयास किए जाएँ. ऐसे दस्‍तावेज़ों के आधार पर बनाई गई प्रशिक्षण सामग्री विभिन्‍न स्‍तरों पर क्षमता निर्माण करने के लिए बहुमूल्‍य होगी.

8. मूल्‍यांकन अध्‍ययन

पिछले कुछ वर्षों में चूँकि बड़ी संख्‍या में परियोजनाएँ पूरी की गई हैं, अतः यह अपेक्षित है कि अब तक उनके फायदे नजर आने लगे होंगे. अतः नाबार्ड ने आरआईडीएफ परियोजनाओं से हुए फायदों का अध्‍ययन करने हेतु विभिन्‍न मूल्‍यांकन अध्‍ययनों का शुभारंभ किया है. परियोजनाओं के कार्यान्‍वयन की अनुप्रवर्तन करने के लिए परामर्शदाताओं की सेवाएँ भी ली गई हैं. समस्‍यामूलक परियोजनाओं के रूप में पहचान की गई परियोजनाओं की अधिक गहनता से अनुप्रवर्तन की जाती है. अनुप्रवर्तन दौरों के निष्‍कर्षों के संबंध में राज्‍य सरकार के उपयुक्‍त प्राधिकारियों को आवश्‍यक अनुवर्ती कार्रवाई हेतु तत्‍परता से अवगत कराया गया है.  प्रत्‍येक राज्‍य में इस प्रयोजन हेतु राज्‍य मुख्‍य सचिव/ वित्‍त सचिव की अध्‍यक्षता में गठित उच्‍च स्‍तरीय समिति (एचपीसी) की तिमाही बैठकों में परियोजनाओं के कार्यान्‍वयन की प्रगति की समीक्षा का कार्य जारी है. उच्‍च-स्‍तरीय समितियों के अनुपूरक के रूप में अन्‍य अनुप्रवर्तन व्‍यवस्‍था भी शुरू की गई है जिसके अंतर्गत राज्‍य सरकारों के कार्यान्‍वयनकर्ता विभागों के प्रशासनिक सचिवा और विभागाध्‍यक्षों की संरचनात्‍मक बैठकें आयोजित करके परियोजनाओं के कार्यान्‍वयन की समीक्षा की जाती है. राज्‍य सरकारों द्वारा आरआईडीएफ परियोजनाओं के समग्र प्रबंधन से संबंधित पहचान किए गए मुद्दों पर भी नाबार्ड के अध्‍यक्ष/ प्रबंध निदेशक, राज्‍यों के मुख्‍य मंत्रियों से समय-समय पर की गई मुलाकातों में विचार-विमर्श करते हैं.  

अ.1 आरआईडीएफ परियोजनाओं की क्षेत्रीय (सेक्‍टोरल) अनुप्रवर्तन

विभिन्‍न क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा क्षेत्र विशिष्‍ट अध्‍ययनों के माध्‍यम से क्षेत्रीय मुद्दों पर ध्‍यान देने के माध्‍यम से अनुप्रवर्तन की कार्यनीति को परिमार्जित (चाक-चौबंद) किया गया है. विभिन्‍न क्षेत्रीय कार्यालयों ने क्षेत्रीय अध्‍ययन किए हैं और उक्‍त दृष्टिकोण का प्रभाव काफी उत्‍साहवर्धक है. इस नए दृष्टिकोण ने राज्‍य सरकारों को भी अपनी आंतरिक अनुप्रवर्तन व्‍यवस्‍था सुदृढ़ करने हेतु प्रोत्‍साहित किया है. इसके मुख्‍य निष्‍कर्ष नीचे दिए गए हैं:

सिंचाई (कर्नाटक)

अध्‍ययन से यह सामने आया है कि अधिकांशतः वर्षासिंचित परिस्थितियों में खेती कर रहे अध्‍ययनाधीन उस क्षेत्र में लघु सिंचाई परियोजनाओं ने कृषि के लिए अति महत्‍वपूर्ण निविष्टि अर्थात् जल उपलब्‍ध कराया है. कपास, गन्‍ना, धान, साग-सब्जियों आदि जैसी नकदी फसलें उगाने के साथ-साथ क्षेत्र में आम खेती की उपज में वृद्धि सूचित की गई है. एकल फसलीय क्षेत्रों में दो फसल लिए जाने की संभावना बढ़ जाने से फसल तीव्रता में भी सुधार आया है. कुओं और बोरवेलों के जल-स्‍तर में वृद्धि एक और उपलब्धि थी जिसके परिणास्‍वरूप जल-विसर्जन में वृद्धि हुई है. परियोजनाओं कार्यान्‍वयन में कुछ विसंगतियाँ दृष्‍टव्‍य थे :

(i) जल प्रभार लगातार कम रहे जिसके परिणास्‍वरूप इसके अंतर्गत वसूली भी इतनी कम रही कि उससे अधिकांश परियोजनाओं के संगठन और प्रबंधन व्‍ययों को पूरा कर पाना भी कठिन था.

(ii) अनुप्रवर्तन प्रक्रिया से यह बात सामने आई कि कृषि, मृदा संरक्षण, वाटरशेड विकास, वन, मत्‍स्‍य, उत्‍खनन और भूविज्ञान जैसे अनुषंगी विभागों के बीच समन्‍वयन काफी कमज़ोर है.

ग्रामीण सड़कें (पाच राज्‍यों नामतः पंजाब, कर्नाटक, केरल, आन्‍ध्र प्रदेश और उत्‍तर प्रदेश में छह अध्‍ययन)

ग्रामीण सड़कों पर किए गए निवेशों की ग्रामीण जनता ने व्‍यापक रूप में मुक्‍त कंठ से सराहना की है. ऐसा बताया गया है कि बाज़ारों और शहरी क्षेत्रों तक पहुँचना आसान हो जाने से जीवन की गुणवत्‍ता ही बदल गई है. ट्रैफिक में उल्‍लेखनीय वृद्धि हुई है और वाहन चलाने के खर्च और उनकी टूट-फूट, घिसाई इत्‍यादि में भी काफी कमी आई है. रिपोर्टों से यह भी जाहिर होता है कि जहाँ कहीं भी भूमि अधिग्रहण की समस्‍याएँ सामने आईं वहाँ ग्राम वासियों और किसानों को समझा-बुझाकर समस्‍याओं को दूर कर लिया गया और सड़क परियोजनाएँ बिना अधिक देरी के पूरी की जा सकीं. बहरहाल यह सूचित किया गया है कि ग्रामीण सड़कों का रखरखाव अभी-भी समस्‍याग्रस्‍त क्षेत्र बना हुआ है.

पेयजल आपूर्ति (पंजाब और हिमाचल प्रदेश में दो अध्‍ययन किए गए)

क्षेत्रीय अनुप्रवर्तन अध्‍ययन से पेय जल आपूर्ति परियोजनाओं की कुछ सकारात्‍मक विशेषताएँ सामने आई हैं. इन विशेषताओं में, पंप, पाइप आदि की केन्‍द्रीकृत खरीद शामिल है जिससे सामग्री का स्‍तर/ गुणवत्‍ता सुनिश्चित करना, संतोषजनक टेंडरिंग प्रक्रिया और व्‍यक्तियों द्वारा निजी कनेक्‍शनों के लिए अच्‍छी माँग शामिल है. इसके समस्याग्रस्‍त क्षेत्र निम्‍नानुसार हैं -

(i)  व्‍यक्तिगत/ सार्वजनिक नलों से प्राधिकारियों द्वारा विनिर्दिष्‍ट जल दरें वसूल नहीं की जा रही थीं, और

(ii) ग्राम स्‍तरीय समिति/ जल उपयोगकर्ता संघ का गठन नहीं किया गया था

संयुक्‍त वन प्रबंधन (आन्‍ध्र प्रदेश)

परियोजनाओं के अंतर्गत कार्यों का निष्‍पादन सामान्‍यतः संतोषजनक रहा तथा विभाग ने सभी परियोजनाओं में वीएसएस सदस्‍यों की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित की है. भू-जल आकलन के अनुसार परियोजना क्षेत्र में, घाटियों की ढलानों में वर्षा में 30 प्रतिशत की कमी के बावजूद जल-तालिका स्‍तरों में लगभग एक मीटर की वृद्धि हुई है. सिविल कार्यों के लिए स्‍थानीय रूप से उपलब्‍ध सामग्री का प्रयोग किया गया है.


वाटरशेड विकास (आन्‍ध्र प्रदेश)

इन परियोजनाओं को स्‍थानीय आबादी द्वारा काफी सराहा गया है क्‍योंकि इनके द्वारा ऊसर भूमि को खेती के अंतर्गत लाने और भूमि की उत्‍पादकता में सुधार लाने हेतु मृदा व जल को संरक्षित करने की परिकल्‍पना की गई थी. अध्‍ययन दल ने यह पाया कि कार्यों का निष्‍पादन सामान्‍य रूप से संतोषजनक है तथा विभाग वाटरशेड समितियों का गठन भी सुनिश्चित कर रहा है. उसके अनुसार, एक ओर जहाँ कार्यों की वैज्ञानिक ढंग से योजना बनाई जानी चाहिए वहीं दूसरी ओर संरचनाओं के रखरखाव को भी बनाए रखा जाना चाहिए.

ए-2 प्रधान कार्यालय द्वारा किए गए त्‍वरित अनुप्रवर्तन अध्‍ययन

वर्ष के दौरान प्रधान कार्यालय ने नवोन्‍मेषी और विशेष प्रकार की परियोजनाओं की अनुप्रवर्तन अध्‍ययनों को प्रारंभ किया है. प्रधान कार्यालय द्वारा किए गए अनुप्रवर्तन अध्‍ययनों के प्रमुख प्रेक्षण संक्षेप में नीचे दिए जा रहे हैं :

अरुणाचल प्रदेश में ग्रामीण सड़क/ पुल परियोजनाए

चालू योजनाओं के तकनीकी मानदंडों/ विनिर्देशनों का पालन और बीआईएस मानकों का अनुसरण किया जा रहा था. कार्यों के गुणवत्‍ता नियंत्रण के लिए किए गए उपाय पर्याप्‍त और संतोषजनक थे. निर्माण (सिविल) कार्यों की समग्र प्रगति संतोषजनक पाई गई. तथापि, कच्‍चे माल/ मशीनों की उपलब्‍धता बाधा बनी हुई थी जिसके चलते परियोजनाओं के कार्यान्‍वयन की गति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था.

अरुणाचल प्रदेश में ऊर्जा क्षेत्र में प्रणाली सुधार

राज्‍य के छह जिलों में ऊर्जा क्षेत्र में प्रणाली सुधार परियोजना का कार्यान्‍वयन किया जा रहा था. सिविल और विद्युत संबंधी कार्यों की गुणवत्‍ता सुनिश्चित करने हेतु कार्यान्‍वयनकर्ता एजेंसी आवश्‍यक जाँच-पड़ताल कर रही थी. इसमें प्रमुख कमी यह थी कि ट्रान्‍स्‍फॉमरों की क्षमता को अंतिम रूप देने से पहले भविष्‍य की माँग/ पड़ने वाले लोड पर विचार नहीं किया गया था.

आन्‍ध्र प्रदेश में मृदा नमी संरक्षण (एसएमसी) संरचनाए

पाई गई सकारात्‍मक विशेषताएँ इस प्रकार हैं (i) निर्माण की गुणवत्‍ता अच्‍छी थी. (ii) लागत में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं हुई. (iii) परियोजना के कार्यान्‍वयन में सहभागितामूलक दृष्टिकोण अपनाया गया और (iv) परियोजना के फलस्‍वरूप परियोजना क्षेत्र में भू-जल के रीचार्ज और वनस्‍पतीय क्षेत्र में वृद्धि हुई है. इसकी प्रमुख कमी यह रही कि परकोलशन टैं‍कों की तुलना में पत्‍थरों से निर्मित बाँधों का निर्माण अधिक किया गया.

पंजाब में बाढ़ से सुरक्षा परियोजना

अध्‍ययन के दौरान बाढ़ से सुरक्षा (एफपी) की परिकल्‍पना करते हुए निर्मित 77 बाढ़ से सुरक्षा (एफपी) कार्यों की भौतिक रूप से जाँच की गई. इन कार्यों से यह अपेक्षित था कि ये सतलज और ब्‍यास नदी के विभिन्‍न किनारों को सुरक्षा उपलब्‍ध कराएँगे. अध्‍ययन दल के अनुसार 55 बाढ़ सुरक्षा संबंधी कार्य साबुत पाए गए और आगामी कुछ वर्षों तक बाढ़ के प्रकोप को रोकने की स्थिति में कुछ सक्षम लग रहे थे. तथापि, कई मामलों में बाढ़ सुरक्षा संबंधी संरचनाओं का चयन टिकाऊ बनाने के दृष्टिकोण पर आधारित नहीं लग रहा था.

मेघालय में मृदा और वाटरशेड प्रबंधन

अध्‍ययन से यह बात सामने आई है कि परियोजना क्षेत्र में खेती के अंतर्गत भूमि के विस्‍तार में वृद्धि हुई है और घरेलू उपयोगों के लिए भी पानी का इस्‍तेमाल किया जा रहा था. दो परियोजनाओं (उमियाप और उमशेत) की उपलब्धियाँ संतोषजनक पाई गईं. कार्यान्‍वयनकर्ता एजेंसी ने इकाई लागतों का कड़ाई से पालन किया. परियोजनाओं के कार्यान्‍वयन में सहभागितामूलक दृष्टिकोण अपनाया गया. यह देखा गया कि मृदा संरक्षण विभागों के मार्गदर्शन में लाभार्थियों द्वारा किए गए सिविल कार्यों की गुणवत्‍ता वांछित परिमाण के अनुरूप थी तथा उनमें इस्‍तेमाल की गई सामग्री (पत्‍थर, सीमेंट आदि.) की गुणवत्‍ता भी अच्‍छी थी. विभिन्‍न एजेंसियों/ विभागों के प्रयासों में समन्‍वय का अभाव एक प्रमुख कमी के रूप में सामने आया. इसके अलावा, बैंक ऋण सहित पुरोगामी और पश्‍चगामी लिंकेजों (बैकवर्ड और फारवर्ड लिंकेजों) का भी अभाव दिखाई दिया.

 
 
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
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