|
विभिन्न राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास पर आरआईडीएफ के तहत ग्रामीण संपर्क परियोजनाओं का प्रभाव
मध्य प्रदेश की पुल परियोजनाएँ
तिरोड़ी खवासा रोड़ पर खरापाडि़या नाले पर बनाया गया खरापाडि़या पुल एक ऊँचाई वाला पुल है. तिरोड़ी खवासा रोड 45 किलोमीटर लंबी सड़क है और यह बालाघाट जिले के कटंगी खंड की एक ओडीआर भी है. परियोजना जिला मुख्यालय से 67 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. पुल की लंबाई 80.108 मीटर है. तिरोड़ी सड़क शिवनी और बालाघाट दो जिलों को एक दूसरे से जोड़ती है. साथ ही यह सड़क मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र दो राज्यों को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-7 से भी सीधे जुड़ती है.
नाबार्ड ने मध्य प्रदेश सरकार को उसके रु.74.43 लाख के परिव्यय के समक्ष आरआईडीएफ - VI के तहत रु.67.50 लाख का ऋण मंजूर किया. 5 जनवरी 2001 को निर्माण कार्य शुरू हुआ और 15 जुलाई 2002 को निर्धारित समय से काफी पहले पूरा भी हो चुका है.
पुल के दोनों ओर बसे तिरोड़ी और खवासा गाँवों के बीच की दूरी पुल के बनने से लगभग 25 किलोमीटर कम हो गई. पुल के निर्माण से पहले वहाँ एक क्षतिग्रस्त रपटा हुआ करता था. बरसात के मौसम में इस रपटे का प्रयोग काफी कम होता था क्योंकि वह बरसाती पानी में डूब जाता था. इससे यातायात में अवरोध उत्पन्न होता था तथा उस सड़क पर वाहन चल ही नहीं सकते थे. अतः वाहनों को तिरोड़ी गाँव से खवासा जाने के लिए काफी घूमकर जाना पड़ता था जो लगभग 70 किलोमीटर लंबा पड़ता था. पुल पूरा हो जाने से, यह दूरी कम होकर 45 किलोमीटर रह गई है. इसके परिणामस्वरूप ईंधन और रखरखाव लागत के साथ-साथ समय की भी बचत होने लगी है. पुल के निर्माण के साथ ही यातायात की बाधा अब पुरानी बात हो गई है. अब इस सड़क पर बिना किसी रुकावट के साल के बारहों महीने यातायात निर्विघ्न चलता रहता है
.
परियोजना से स्थानीय जनसंख्या को काफी लाभ हुआ है. अब वे बाज़ारों, अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक आसानी से पहुँच पा रहे हैं. परियोजना के पूरा होने से उसके आस-पास स्थित 64 गाँवों के बीच संपर्क सरल हो गया है. आस-पास के इलाकों में रहने वाले किसान अब आस-पास स्थित 8 विपणन केन्द्रों में से किसी में भी अपने कृषि उत्पादों को बेच सकते हैं. इससे उन किसानों को अपनी उपज अच्छे दामों में बेचने में सहायता मिली है. पुल पूरा बन जाने से अब ग्रामवासियों के पास अपने मनपसंद शिक्षण संस्थानों में अपने बच्चों को पढ़ने भेजने का विकल्प मिल गया है चूँकि उस क्षेत्र के आस-पास लगभग 70 शिक्षण संस्थान स्थित हैं. पुल का निर्माण पूरा हो जाने के बाद स्कूल ड्रॉप आउट दर में भी कमी आई है क्योंकि उस पुल से उस क्षेत्र में आपसी संपर्क बेहतर हुआ है. अब ग्राम वासी अपनी बेटियों को भी विद्यालय भेजने के प्रति उदासीन नहीं दिखाई देते हैं.
पुल के निर्माण के पश्चात् ग्रामवासियों की 5 अस्पतालों/ औषधालयों तक पहुँच काफी आसान हो गई है. पुल ने 4 रेलवे/ बस स्टेशनों तक का आसान आवागमन उपलब्ध करा दिया है. अब तिरोड़ी खवासा सड़क के माध्यम से निकटवर्ती छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र राज्यों तक कृषि उत्पादों का पहुँचना आसान हो गया है. कार्यान्वयन चरण के दौरान पुल परियोजना ने 22.5 श्रमदिवसों तक का गैर-आवर्ती रोजगार उपलब्ध कराया है. स्थानीय जनसंख्या इस पुल परियोजना से हर प्रकार से खुश है.
असम में ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास पर आरआईडीएफ के तहत ग्रामीण संपर्क परियोजनाओं का प्रभाव
असम में पुल परियोजनाएँ
असम का वर्ममान सड़क नेटवर्क स्थायी पुलों के अभाव से काफी विषम स्थिति में है. वहाँ लकड़ी के अर्ध-स्थायी पुलों का बोलबाला है. लकड़ी के ऐसे पुलों की कुल लंबाई लगभग 1.48 लाख मीटर है. ये पुल प्रकृति की मार सहने में सक्षम नहीं होते हैं और इस कारण अक्सर, विशेष रूप से मानसून के दौरान बाहरी दुनिया से संपर्क अवरुद्ध हो जाता है. एक ओर जहाँ लकड़ी के अर्ध-स्थायी (एसपीटी) पुलों के वार्षिक रखरखाव और उनकी मरम्मत पर काफी अपरिहार्य खर्च आता है वहीं दूसरी ओर पुलों की समय पर मरम्मत करने और उनके जीर्णोद्धार के लिए वांछित विनिर्देशनों की लकड़ी की उपलब्धता में कमी आ रही है. असम सरकार ने सही दिशा में कदम उठाते हुए प्राथमिकता के आधार पर लकड़ी के इन अर्ध-स्थायी पुलों को आरसीसी पुलों में परिवर्तित करने पर ध्यान केन्द्रित करने हेतु नाबार्ड के आरआईडीएफ के तहत ऋण सहायता की माँग की है. आरआईडीएफ-IX तक असम सरकार के लिए 294 ग्रामीण पुलों की मंजूरी दी गई है.
अब तक आरआईडीएफ की विभिन्न खेपों के तहत 95 पुलों के निर्माण का कार्य पूरा हो चुका है. शेष पुल निर्माण कार्य पूरा होने के विभिन्न चरणों में हैं. पुलों के निर्माण से ग्रामीण कनेक्टिविटी में सुधार और वाहनों की परिचालन लागत में कमी के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों और यहाँ रहने वाले लोगों के आर्थिक विकास में धीरे-धीरे प्रगति हो रही है. इससे कृषि और गैर-कृषि उत्पादों का बेहतर विपणन सुगम हुआ है और विभिन्न निविष्टियों की समय पर आपूर्ति, विपणनयोग्य आधिक्य के अपव्यय में कमी आदि भी सुगम हुई है
.
आरआईडीएफ-III, IV और V के तहत अब तक पूरे हुए 95 पुलों ने 1380 गाँवों और 519 बाज़ार केन्द्रों को जोड़ने के साथ-साथ 102.90 लाख श्रमदिवसों का गैर-आवर्ती रोज़गार सृजित किया है.
(1) आरआईडीएफ - II के तहत मोरिगाँव जिलें में राजमयाँग काजोलिचौकी रोड पर निर्मित पुल सं.14/1
उपर्युक्त पुल के उपयोगकर्ताओं ने पुल का निर्माण कार्य पूरा हो जाने पर गहरी संतुष्टि व्यक्त की है. इस पुल ने मनाहा, कुँवरगाँव, झारगाँव और भूरागाँव के लोगों की आर्थिक खुशहाली के लिए काफी योगदान किया है. बेहतर संपर्क, सुधरी हुई चिकित्सा सुविधाएँ, बैंकों, शिक्षण सुविधाओं तक आसान पहुँच आदि कुछ सीधे फायदे हैं, जो इस क्षेत्र के लोगों को हासिल हुए हैं. बेरोज़गार युवाओं और स्थानीय श्रमिकों को भी निर्माण के दौरान काफी फायदा हुआ है.
(2) आरआईडीएफ-IV के तहत नलबारी जिले में सांधा में पुरानी एनटी रोड पर पगलाडिया नदी पर निर्मित पुल सं.1068/1
उपर्युक्त पुल के कुछ उपयोगकर्ताओं (श्री नगेन मजुमदार, गोधाधर बरुआ, पुलेन हालोई आदि) का यह मत था कि 1984 से पुराना पुल उपयोग करने लायक नहीं था जिससे नलबारी बाज़ार तक और वहाँ से कृषि उत्पादों और अन्य सामग्री का लाना-ले जाना काफी बुरी तरह प्रभावित हुआ था. उक्त पुल के स्थान पर आरसीसी पुल के बन जाने से निर्विघ्न संपर्क की स्थापना सुनिश्चित हो गई है तथा सांधा, कैरारा, पायकरकुची, पोराकुची, बालीकुची, जजियाबारी, सोनामोती और बरखानाजन गाँवों के लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को ऊँचा उठाने में मदद मिली है.
यह एक बड़ी संतुष्टि का विषय है कि असम में आरआईडीएफ के तहत ग्रामीण पुल परियोजनाओं के कार्यान्वयन के परिणामस्वरूप सरल और त्वरित पहुँच और कार्यकलाप स्तर में सुधार आदि के कारण ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों/ शहरी केन्द्रों के बीच बेहतर सामाजिक-सांस्कृतिक संपर्क स्थापित हुए हैं. कृषि निविष्टियों की बढ़ी हुई और सहज उपलब्धता तथा उपज के विपणन के लिए बढ़े हुए अवसरों के परिणामस्वरूप विकास के नए केन्द्र बने हैं जिसके चलते ग्रामीण निर्धनों के लिए रोजगार के अधिक से अधिक अवसर सृजित हुए हैं. इसके अलावा, इन पुलों ने अनुपूरक निवेश और अप्रत्यक्ष (परोक्ष) रोजगार सृजन, स्वास्थ्य रक्षा सुविधाओं, शिक्षण संस्थानों, प्रशासनिक प्रतिष्ठानों, आदि तक बेहतर पहुँच के अवसरों का सृजन किया है जिससे जीवन स्तर में सुधार आया है.
खरास्रोता पर आरआईडीएफ के तहत सहायता प्राप्त पुल - उड़ीसा के जाजपुर जिले के लोगों के लिए वरदान
जाजपुर जिला उड़ीसा के बारुआँ और उसके आस-पास के गाँवों के निवासियों के लिए 1999 में आया सुपर सायक्लोन किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था. इस घोर आपदा के दौरान, इस क्षेत्र के 200 लोग और 5000 मवेशी तेज जल प्रवाह में बह गए क्योंकि पुल के अभाव में वे सुरक्षित स्थानों के लिए जल प्रवाह को पार नहीं कर पाए. गाँव बरुआँ के वासियों का कहना था कि ''यदि यह पुल पहले ही बन गया होता, तो कई जानों को बचाया जा सकता था.'' साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि दूसरे समयों पर भी बड़ी-बड़ी बाढ़ों के दौरान भी वे कई जानों को गंवाते रहे हैं. इन ग्रामवासियों के जीवनों के लिए अति-महत्वपूर्ण यह वह उच्च-ऊँचाई वाला पुल है जिसे जाजपुर जिले की जाजपुर-बरुआँ रोड पर खारास्रोता के ऊपर नाबार्ड के आरआईडीएफ-II के तहत निर्मित किया गया है.
उपर्युक्त पुल उड़ीसा के जाजपुर जिले के मुख्यालय जाजपुर कस्बे से दक्षिण की ओर 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. राष्ट्रीय राजमार्ग-5 के साथ जाजपुर कस्बे को जोड़ने वाली प्रमुख जिला सड़क-14 पर खुआखिया में यह पुल स्थित है. खरास्रोता नदी (स्थनीय लोग इसे खर्सुआन कहते हैं) ब्राह्मणी नदी की एक सहायक-नदी है. उडि़या में खरास्रोता का अर्थ है 'तेज़ बहाव वाली नदी'.
काफी पहले जुलाई 1989 में शुरू हुआ इस पुल का निर्माण निधियों की कमी और लागत में वृद्धि के कारण बीच में ही बंद हो गया. निर्माण कार्य एक दशक तक रुका रहा. वर्ष 1997 में आरआईडीएफ की मध्यस्थाता के साथ इस परियोजना में जीवन का संचार हुआ. पुल का निर्माण कार्य दिसंबर 1999 में पुनः शुरू हो गया और वर्ष 2002 में इसे पूरा कर लिया गया.
यात्रा अवधि में कमी
बरुआँ और उसके आस-पास के गाँवों से जाजपुर और उसके आस-पास के स्थानों तक पहुँचने के लिए अब लगभग 25-45 मिनट का समय लगता है जबकि पहले यह दूरी 4-8 घंटों में काफी जद्दोजहत और असुविधाओं का सामना करते हुए तय की जाती थी. पहले लोगों को सुबह तड़के घरों से निकल जाना पड़ता था तथा नदी के किनारे नाव के लिए घंटों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी. नाव नदी पार कराने में 40-60 मिनट का समय लेती थी. नाव सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक ही उपलब्ध होती थी, वह भी मौसम अच्छा हो तो. लोग पतवारों की सहायता से चलने वाली मानव-चलित नावों से नदी पार करते थे. अक्सर नावों में उनकी वहन क्षमता से अधिक सवारियाँ चढ़ा ली जाती थीं. चूँकि नावों की फेरी काफी कम अर्थात् एक घंटे में एक नाव की फरी थी अतः यात्रियों को काफी लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी. एक फेरे में अधिक-से-अधिक धनराशि कमाने के चक्कर में नाविक क्षमता से अधिक की सवारियाँ लेने का जोखिम उठाते थे. जाजपुर से बरुआँ तक का दूसरा मार्ग सड़क थी जो कुआखिया, पानीकोइली, साथीपुर और जाजपुर कस्बे के रास्ते जाता था, जो लगभग 40 किलोमीटर की दूरी के साथ काफी लंबा पड़ता था.
क्षेत्र में पुल ने कृषि का कायापलट कर दिया है
पुल ने बारी, बरुआँ, बलियापाल, कुआखिया, कबीरपुर, माधापुर आदि में स्थित ग्रामीण हाटों के लिए संपर्क का साधन खोल दिया है तथा जाजपुर कस्बा, कटक, भुवनेश्वर, अंगुल आदि में स्थित बाज़ारों के साथ सीधे परिवहन संपर्क को सरल बना दिया है. इसके परिणामस्वरूप किसान अब सब्जियों जैसी नकदी फसलों को अधिक-से-अधिक उगाने की ओर लालायित हो रहे हैं. अब उन्हें अपनी साग-सब्जियों के बेहतर दाम मिलने लगे हैं और हताशा में बिक्री अब नहीं की जा रही है. कई बार तो साग-सब्जियों के विक्रेता किसानों के खेतों तक आ जाते हैं और बड़ी मात्रा में सब्जियाँ उनसे खरीद लेते हैं. पुल ने किसानों और उपभोक्ताओं, दोनो को कृतार्थ कर दिया है क्योंकि किसानों को अपनी उपज का बेहतर दाम मिल जाता है और उपभोक्ताओं को कम कीमत पर ताज़ा सब्जियाँ मिल जाती हैं.
खुदरा व्यापारियों और सब्जी बेचने वालों का अब परिवहन और हमाली पर खर्च कम हो गया है तथा इस प्रकार यह लाभ उत्पादकों, उपभोक्ताओं और खुदरा व्यापारियों के बीच वितरित हो जाता है.
फायदे
महत्वपूर्ण स्थानों के बीच की दूरी में कमी -- 15 से 40 किलोमीटर
प्रतिवर्ष ईंधन की बचत पर -- रु. 226 लाख
प्रतिवर्ष कृषि आय में वृद्धि -- रु. 52.50 लाख
फसलों के दामों में वृद्धि - धान -- रु. 60 प्रति क्विंटल
मूँगफली -- रु.150 प्रति क्विंटल
सृजित गैर-आवर्ती रोजगार -- 2.41 लाख मैनडेज़
सृजित आवर्ती रोजगार -- 3264 जॉब प्रतिवर्ष
भूमिहीन मजदूरों के लिए एक वरदान
यह बताया गया है कि पुल उन भूमिहीन कृषि श्रमिकों और मजदूरों के लिए अपने-अपने कार्य स्थलों तक जाने और लीन सीज़न में रोजगार के अवसर तलाश करने हेतु सुरक्षित रूप से नदी पार करने में काफी फायदेमंद रहा है.
स्थानीय व्यापार में उछाल
पुल के निर्माण से उसके आस-पास के इलाकों में कारोबारी गतिविधियों में तेजी आ गई है और निर्माण, परिवहन, औद्योगिकीकरण और सेवा क्षेत्रों में काम-काज में उछाल आया है जिससे अधिक आवर्ती श्रम शक्ति की माँग बढ़ गई है.
चिकित्सा सुविधाओं तक सरलता से पहुँच
पुल के आस-पास के लगभग 200 गाँवों के निवासियों के लिए चिकित्सा रक्षा सुविधाएँ काफी अपर्याप्त थीं. ऐसी भी कई घटनाएँ हुईं जिनमें रोगी को नदी पार करने के लिए नाव का इंतजार करते-करते राह में ही अपने प्राण छोड़ने पड़ गए. खरास्रोता पर पुल बन जाने से अब साल के बारह महीने दिन-रात संपर्क उपलब्ध हो गया और जाजपुर स्थित जिला अस्पताल तक बरुआँ से वाहन द्वारा 20 मिनट में पहुँचा जा सकता है.
विद्यार्थियों को भी काफी फायदा हुआ
खरास्रोता नदी के दाएँ किनारे स्थित 200 से अधिक गाँवों से विद्यार्थी अब जाजपुर स्थित जिला महाविद्यालय, महिला महाविद्यालय, इंजीनियरिंग महाविद्यालय और विधि महाविद्यालय आदि जैसे विभिन्न संस्थानों में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए जा पा रहे हैं. बेहतर संपर्क साधनों के चलते अब उच्च शिक्षा में लड़कियों की भर्ती भी बढ़ने लगी है.
लोग उपयोग प्रभार देने के लिए तैयार हैं - एक स्वागतयोग्य विशेषता
पुल का उपयोग करने के लिए इस क्षेत्र के अधिकांश लोगों ने उपयोग प्रभारों का भुगतान करने हेतु अपनी सहमति व्यक्त की है. आस-पास के गाँवों के लोगों की गरीबी के मद्देनजर यह बात विशेष रूप से स्वागतयोग्य है.
खरास्रोता पुल ने बरुआँ और उसके आस-पास के गाँवों के ग्रामीणों के चेहरों पर मुसकान बिखेर दी है. इसने कई प्रकार से इन लोगों जीवन को बदल दिया है. आपदा ग्रस्त इस क्षेत्र के लोग अब सुरक्षा और बेहतर आर्थिक समृद्धि की ओर चल पड़े हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में खुशहाली और समृद्धि लाने के नाबार्ड के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए इससे बेहतर कोई अन्य मार्ग हो सकता है क्या!
आन्ध्र प्रदेश के महबूबनगर जिले में लिफ्ट सिंचाई परियोजना
अमरचिंता, आन्ध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में महबूबनगर जिले के आत्मकूर मंडल स्थित एक साधारण सा गाँव है. परियोजना से पहले अमरचिंता गाँव के किसान जवारी, एरंड, मक्का और दलहन जैसी फसलों की खेती करते थे. चूँकि यह क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र है तथा यहाँ वर्षा बेतरतीब होती है अतः यहाँ अच्छी फसल का होना निश्चित नहीं होता है. किसान काफी गरीब थे तथा बोरवेलों हेतु अपनी स्वयं की लागत पर स्वतंत्र रूप से निवेश करने में असमर्थ थे. सूखें की कठिन परिस्थितियों में लोग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने लगे.
नाबार्ड ने महबूबनगर जिले में प्रियदर्शनी जुराला नाम की एक बड़ी सिंचाई परियोजना को आरआईडीएफ II के तहत रु.16.15 करोड़ के ऋण सहित मंजूरी प्रदान की. इस परियोजना की बाईं मुख्य नहर अमरचिंता गाँव से होकर बहती थी. इसके परिणामस्वरूप इस बाईं नहर का उपयोग करते हुए एक लिफ्ट सिंचाई परियोजना की रूप-कल्पना करने हेतु आन्ध्र प्रदेश राज्य सिंचाई विकास निगम (एपीएसआईडीसी) के पास किसानों और जन प्रतिनिधियों का एक प्रस्ताव आया. तदनुसार, एपीएसआईडीसी ने महबूबनगर जिले के आत्मकूर मंडल स्थित प्रियदर्शिनी जुराला परियोजना की बाईं मुख्य नहर पर लिफ्ट सिंचाई परियोजना की परिकल्पना की और तत्संबंधी प्रस्ताव नाबार्ड को प्रस्तुत किया.
आरआईडीएफ III के तहत रु. 490 लाख की परियोजना लागत और रु. 441 लाख की ऋण सहायता के साथ इस परियोजना को मंजूरी दे दी गई. आत्मकूर मंडल स्थित इस परियोजना में 8 गाँव शामिल हैं तथा इसके अंतर्गत 4800 एकड़ का आयकट आता है जिसमें से 90 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसानों की भूमि है. इस लिफ्ट सिंचाई परियोजना को पूरा करने के निर्धारित समय से काफी पहले, 16 माह के अंदर रिकॉर्ड समय में सभी प्रकार से पूरा कर लिया गया है.
परियोजना का प्रभाव
i. किसानों की आर्थिक परिस्थिति
किसानों की वित्तीय स्थिति में सुधार आया है. पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के निकटवर्ती शहरी क्षेत्रों में श्रमिकों का स्थानांतरण काफी हद तक कम हुआ है. लोगों की मानसिंकता में सकारात्मक बदलाव आया है. किसानों ने कृषि की आधुनिक तकनीकों में रुचि दिखाई है. इसके अलावा, बढ़ी हुई सिंचाई सुविधाओं की उपलब्धता के चलते किसानों ने प्रशिक्षण और प्रगामी फार्मों/ प्रदर्शन केन्द्रों के दौरों पर जाने में गहरी रुचि दिखाई है ताकि वे अपने क्षेत्रों में भी खेती की अच्छी पद्धतियों को दोहरा सकें.
ii. परियोजना का पर्यावरणीय प्रभाव
लिफ्ट सिंचाई परियोजना के कार्यान्वयन ने उसके अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में भू-जल के स्रोतों को रीचार्ज कर दिया है. आस-पास के स्थानीय तालाबों को पर्याप्त पानी मिला और ऐसा भी पता चला है कि पानी के खारेपन की समस्या का भी समाधान हो गया है. क्षेत्र में अब प्रचुर मात्रा में हरा चारा उपलब्ध है. इसके चलते दुग्ध उत्पादन को स्थानीय किसानों के अतिरिक्त व्यवसाय के रूप में विकसित किया गया है. परियोजना में और उसके आस-पास हरे वृक्ष और हरियाली उगाई जा रही है.
iii. लोगों की सहभागिता
लोगों की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए परियोजना के तहत एक जल उपयोगकर्ता संघ (डब्ल्यूयूए) का गठन किया गया है. परियोजना का सफलता पूर्वक कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए जल उपयोगकर्ता संघ निम्नानुसार अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहा है -
किसानों को परियोजना के फायदे समझाते हुए जल प्रभारों की बकाया राशि की वसूली के लिए पारस्परिक दबाव का इस्तेमाल
.
परियोजना के अंतर्गत आयकटदारों के बीच उत्पन्न समस्याओं के समाधन के लिए जन प्रतिनिधियों की सेवाएँ प्राप्त करवाना.
मशीनों की आवश्यक मरम्मत करना/ करवाना और फील्ड चैनलों में से समय पर गाद हटाना ताकि पानी की निर्विघ्न आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके.
सिंचाई के लिए पानी के विवेकपूर्ण इस्तेमाल तथा कम पानी से उगने वाली फसलों को अपनाने के संबंध में किसानों को जानकारी प्रदान करना.
iv. अखबारों में कवरेज
स्थानीय भाषा के अखबार 'आन्ध्र ज्योति' ने छापा है कि परियोजना क्षेत्र के किसान काफी प्रोत्साहित हुए हैं. उन्होंने यह संकल्प लिया है कि वे लिफ्ट सिंचाई की इस परियोजना के सफलतापूर्वक कार्यान्वयन में अपना भरपूर योगदान देंगे. आयकट क्षेत्र के किसानों के जीवन पर लिफ्ट सिंचाई परियोजना के प्रभाव को प्रेस ने सविस्तार छापा है. यह भी छापा है कि आयकटदारों की समिति नियमित रूप से मशीनों की मरम्मत करते हैं और साथ ही फील्ड नहरों में से गाद भी निकालते हैं. आयकटदारों ने अपने खेतों की सीमाओं पर वृक्ष लगाए हैं जिससे पूरा क्षेत्र हरा भरा लगता है जो यह प्रमाणित करता है कि जल प्रयोगकर्ताओं/ आयकटदारों की समिति काफी दक्षता से कार्य कर रही है.
इस प्रकार, आरआईडीएफ के तहत सहायता प्राप्त लिफ्ट सिंचाई परियोजना ने अमरचिंता के किसानों को आर्थिक स्वतंत्रता उपलब्ध कराकर उनका जीवन बदल दिया है और उनके चेहरों पर मुसकान बिखेर दी है.
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में छापी सिंचाई परियोजना
छापी सिंचाई परियोजना छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर जिले के कोटा खंड में स्थित है. यहाँ प्रमुख रूप से जनजातीय आबादी निवास करती है. परियोजना का कार्य वर्ष 1979 में शुरू हुआ था. चूँकि परियोजना में 256.745 हेक्टेयर की सीमा तक वनीय भूमि का अधिग्रहण शामिल था और इसके लिए वन और पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति लेनी होती है अतः, परियोजना का कार्य जारी नहीं रह सका था. वर्ष 2001 में वन और पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार ने इस परियोजना के लिए अनुमति प्रदान कर दी है तथा जल संसाधन विभाग, छत्तीसगढ़ सरकार ने परियोजना को संशोधित करके वर्ष 2002 में आरआईडीएफ-VIII के तहत नाबार्ड प्रस्तुत किया
.
नाबार्ड ने रु. 1123.27 लाख की ऋण राशि शामिल करते हुए 25 मार्च 2003 को इस परियोजना को मंजूरी प्रदान कर दी है. परियोजना के अंतर्गत प्रस्तावित सकल सिंचित क्षेत्र 2260 हेक्टेयर (खरीफ के लिए 1855 हेक्टेयर और रबी के लिए 405 हेक्टेयर) था. परियोजना से लगभग 3015 किसानों का लाभान्वित होना प्रस्तावित था. परियोजना की मंजूरी के तुरंत बाद जल संसाधन विभाग ने तकनीकी मंजूरियों, निविदा प्रक्रिया को अंतिम रूप दे दिया और एजेंसियों का निर्धारित कर दिया.
नेमी अनुप्रवर्तन के एक भाग के रूप में छत्तीसगढ़ क्षेत्रीय कार्यालय के अधिकारियों ने दिनांक 17 सितंबर 2003 को परियोजना का दौरा किया गया. दौरे के समय टैंक पानी से भरा हुआ था और वेस्ट वियर चालू था. अधिकारी परियोजना के कार्यान्वयन की प्रगति से काफी प्रभावित थे क्योंकि बंड के फ्लैंक, वेस्ट वीयर, स्पिल चैनल, एप्रोच चैनल और नाला क्लोज़र जैसे प्रमुख ढांचे पूरी तरह बन चुके थे. 15.75 किलोमीटर की कुल प्रस्तावित लंबाई में से 6 किलोमीटर तक की प्रमुख नहर बन चुकी थी. किए गए कार्य की गुणवत्ता अच्छी पाई गई. बंड की पिचिंग, स्पिल चैनल में गिरती ढलानों और लगभग 8.75 किलोमीटर की प्रमुख नहर और माइनरों का निर्माण अभी भी किया जाना शेष है. कार्य की तीव्र गति से प्रगति को ध्यान में रखते हुए, अध्ययन दल ने यह सूचित किया है कि परियोजना का कार्यान्वयन जून 2005 तक पूरा हो जाने की संभावना है.
दौरे पर गए दल ने यह महसूस किया कि परियोजना का योजना किए गए समय से पहले सफलतापूर्वक पूर्ण होना और 1200 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई उपलब्ध कराना एक मिसाल है. जल संसाधन विकास विभाग के सब डिवीजनल ऑपिफसर (एसडीओ) ने कहा है कि विभाग द्वारा की समुचियत आयोजना और उसके समन्वित प्रयासों तथा परियोजना के साथ नाबार्ड के शामिल होना इसकी तेज़ी से प्रगति के प्रमुख कारण हैं. परियोजना ने ग्रामवासियों के लिए 175 जॉब और 1.12 लाख श्रमदिवसों का आवर्ती रोजगार सृजित किया है.
कर्नाटक के उड़पि जिला, उडुपि तालुका के नीलावरा गाँव में
सीता नदी पर लवणीय जल निकासी (साल्ट वाटर एक्स्क्लूजन) बांध
उडुपि तालुका के नीलावरा गाँव में लवणीय जल निकासी (साल्ट वाटर एक्स्क्लूजन) बांध को आरआईडीएफ VI के तहत मंजूरी दी गई थी. परियोजना की अनुमानित लागत रु. 249.00 लाख थी और परियोजना पूरी हो जाने पर इसकी कुल लागत रु. 333.98 हो गई. 11 नवंबर 1999 को इसका कार्य प्रारंभ हुआ था और 29 मई 2002 को इसका कार्य पूरा हो गया.
नदी के मीठे पानी में खारे पानी का प्रवेश रोकने तथा लगभग 860 एकड़ भूमि को लाभान्वित करने के लिए सीता नदी पर इस साल्ट वाटर एक्स्क्लूजन डैम का निर्माण किया गया.
परियोजना पूरी हो जाने के पश्चात, आयकट के किसान पंप सेटों के माध्यम से नदी के किनारे स्थित विभिन्न स्थानों पर पानी लेने लगे हैं. इस प्रकार कुल 840 एकड़ आयकट लाभान्वित हुआ है. किसान प्रमुख रूप से गन्ना, नारियल, वेनिला, अनाज और अन्य फसलें उगाते हैं. उपर्युक्त फायदों के अलावा क्षेत्र में भू-जल स्तर में भी काफी हद तक सुधार हुआ है. इस प्रकार पीने के पानी की समस्याओं से भी छुटकारा मिल गया है. भूमि में खारे पानी का प्रवेश रुक जाने से भूमि की उर्वरता में भी वृद्धि हुई है.
बांध के उद्गम की ओर 5000 मीटर से अधिक के नदी के बहाव में रोमांचक खेलों की सुविधा विकसित करने की काफी गुंजाइश मौजूद है. इस क्षेत्र में पानी के खेलों का संवर्धन करने हेतु जिला प्रशासन काफी प्रोत्साहित कर रहा है
.
केरल के मल्लापुरम् जिले में चेलियार नदी पर कवनकलु रेगुलेटर सह पुल (आरसीबी)
कोजिकोड शहर के लिए चेलियार नदी पानी का प्रमुख स्रोत है. निकटवर्ती कई पंचायतों (कोजिकोड और मल्लापुरम जिलों दोनों के) में रहने वाले लोग सिंचाई और पीने के पानी के लिए भी इसी नदी पर ही निर्भर रहते हैं. यद्यपि नदी में बहुत पानी रहता है, किन्तु गर्मियों में जल स्तर काफी कम हो जाता है और पानी की भारी किल्लत होने लगती है. इसके अलावा नदी में खारा पानी भी प्रवेश कर जाता था जिससे समस्या और भी गंभीर हो जाती थी. यद्यपि, खारे पानी के नदी में प्रवेश रोकने के लिए अस्थायी बंड के निर्माण की पुरानी पद्धति चली आ रही थी, किन्तु उसमें प्रतिवर्ष काफी आवर्ती खर्च होता था.
इस परिप्रेक्ष्य में, केरल सरकार ने कवनकलु चेलियार पर एक पुल सह रेगुलेटर निर्मित करने का निर्णय लिया. यह बहु-उद्देश्यीय परियोजना का निर्माण दिसंबर 1992 में शुरू हो गया किन्तु निधियों की कमी के कारण राज्य सरकार इस परियोजना को पूरा नहीं कर पाई.
तब केरल सरकार ने आरआईडीएफ के तहत सहायता हेतु राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक को प्रस्ताव प्रस्तुत किया. नाबार्ड द्वारा 1995-96 (आरआईडीएफ-I) के दौरान रु. 730 लाख की ऋण राशि की मंजूरी दी गई. परियोजना दिनांक 21 नवंबर 2000 को राष्ट्र के नाम समर्पित कर दी गई.
जलाशय में लगभग 12 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी जमा रहता है और यह कोजिकोड़ और मल्लापुरम् व आस-पास के क्षेत्रों के लोगों के लिए एक वरदान बन गया है. इस जलाशय से पीने के पानी और सिंचाई की उनकी जरूरते पूरी हो जाती हैं. अब लगभग 2000 हेक्टेयर की भूमि में लगी नकदी फसलों को सीधे सिंचित किया जा सकता है. इस जलाशय से कोजिकोड निगम क्षेत्र को पर्याप्त पीने का पानी सप्लाई करना संभव हो गया है
.
इसके अलावा रेगुलेटर के उद्गम स्थान के ओर की कृषि भूमि में खारे पानी के प्रवेश को सफलतापूर्वक रोका जा सका है.
सिंचाई और पीने के पानी के उपर्युक्त फायदों के साथ ही साथ रेगुलेटर सह पुल के निर्माण से लोगों को अपनी यातायात संबंधी कठिनाइयों को कम करने में भी सहायता मिली है. पुल के निर्माण से पहले नदी पार करने के लिए लोगों को फेरी सेवाओं (देसी नावों के माध्यम से परिचालित) पर निर्भर रहना पड़ता था. बरसात के मौसम में जब नदी का जल स्तर काफी बढ़ा रहता था तो उस समय नदी पार करना काफी जोखिम भरा होता था. स्कूल/कॉलेज जाने वाले बच्चों, अस्पताल, बाजार जाने वाले लोगों आदि के लिए यातायात काफी कठिन हो जाता था.
नदी पर पुल के निर्माण और उसके परिणामस्वरूप सड़क संपर्क से लोगों के जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन लाने में सहायता मिली है. नीलंबूर, मंजरी आदि स्थानों से मव्वूर, कोजिकोड शहर तक सड़क की दूरी में उल्लेखनीय कमी आई है.
दोनों जिलों के लोगों को चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करने में कोजिकोड़ स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता है. मल्लापुरम् जिले के नीलांबर और मंजरी जैसे स्थानों से मेडिकल कॉलेज पहुँचने के लिए लोगों को अब क्रमशः 16 किलोमीटर और 10 किलोमीटर की कम दूरी तय करनी पड़ती है. इसी प्रकार वजक्काड़, वजयूर और पूलिक्कल जैसी कई पंचायतों के लोगों को भी फायदा हुआ है. संक्षेप में, इस परियोजना से मल्लापुरम् और कोजिकोड़ जिलों के लोगों की कृषि, जलापूर्ति और परिवहन संबंधी जरूरतों में काफी सुधार आया है.
मध्य प्रदेश जिले के गुना जिलें में राजीव सागर लघु सिंचाई योजना
पार्वती नदी की उप-नदी दूधीनाला नहर (भादेर नदी) पर निर्मित राजीव सागर बाँध लघु सिंचाई की एक योजना है. यह बांध गुना जिले के राघोगढ़ खंड स्थित मक्सूदनगढ़ गाँ के पास स्थित है. जिला मुख्यालय से इसकी दूरी 87 किलोमीटर है. परियोजना का जलग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) 65.65 किलोमीटर का है.
राजीव सागर परियोजना की कुल लागत रु. 1356.96 लाख की थी जिसमें से रु.1277.94 लाख का ऋण आरआईडीएफ-II के तहत नाबार्ड द्वारा मंजूर किया गया था. लागत में वृद्धि के कारण रु. 703.45 लाख का अतिरिक्त ऋण भी मंजूर किया गया इस प्रकार इस परियोजना में नाबार्ड ने कुल रु. 1981.39 लाख की राशि उपलब्ध कराई.
ऋण की मंजूरी के बाद निर्माण का कार्य तुरंत शुरू हो गया किन्तु उसे पूरा जून 2003 तक ही किया जा सका. तथापि, परियोजना के पूरा होने से क्षेत्र का समग्र विकास हुआ जो इस बात से प्रमाणित होता है कि क्षेत्र में विविध लाभकारी आर्थिक कामकाज शुरू हो गए.
सिंचित क्षेत्र के परिमाण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और सूखी भूमि के विशाल क्षेत्र को सिंचाई के अंतर्गत शामिल कर लिया गया. बांध के निर्माण से 8 किलोमीटर की लंबाई वाली दायीं नहर के अंतर्गत आने वाली 1242 हेक्टेयर भूमि और 6 किलोमीटर की लंबाई वाली बायीं नहर के अंतर्गत आने वाली 600 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई में मदद मदद मिली है. बांध का निर्माण पूरा हो जाने से फसल क्रम में बदलाव आया है. गेहूँ (साधारण) और गेहूँ (संकर) जैसी फसलों की अब क्रमशः 101 और 1619 हेक्टेयर में खेती की जाने लगी है. 122 हेक्टेयर में गन्ने की खेती भी की जानी प्रस्तावित है. सुनिश्चित सिंचाई के कारण उत्पादकता में वृद्धि हुई है और रु. 137.36 लाख प्रतिवर्ष की मात्रा तक अतिरिक्त आय होने की उम्मीद है.
क्षेत्र में नए उद्योग/ कारोबारी प्रतिष्ठानों की स्थापना होने से रोजगार के नए अवसर सृजित हो रहे हैं. परियोजना क्षेत्र में तेज़ी से गिरते जा रहे जलस्तर को जलस्तर में उल्लेखनीय वृद्धि करके फिर से भर दिया है. मवेशियों को अब गर्मियों में भी पर्याप्त मात्रा में पानी और चारा उपलब्ध हो रहा है
.
17 गाँवों में ऐसे किसानों की संख्या 1137 है जिन्हें इस बांध से फायदा पहुँचा है. लाभान्वित इन 1137 किसानों में से, 50 किसान अनुसूचित जाति के हैं और 67 किसान अनुसूचित जनजाति के हैं. सिंचाई प्राप्त 1842 हेक्टेयर भूमि में से 81 हेक्टेयर भूमि अनुसूचित जाति के किसानों की है और 141 हेक्टेयर भूमि अनुसूचित जनजाति के किसानों की है और शेष 1620 हेक्टयर भूमि अन्य किसानों की है. इस प्रकार, यह परियोजना किसानों के सभी वर्गों के लिए लाभकारी रही जिससे सामाजिक समता सुदृढ हुई.
पंजाब के नवाँशहर जिलेञ) में बाढ़ से बचाव कार्य
पंजाब के नवाँ शहर जिले को प्रकृति ने अति उर्वरा कछारी मिट्टी दी है किन्तु इसके साथ ही इस उपजाऊ भूमि के सतलज नदी से सटे एक बड़े हिस्सा पर हमेशा मौसमी बाढ़ और निम्नलिखित कारणों से भूमि की कटाई का खतरा मंडराता रहता है -
सपाट जमीन होने के कारण प्राकृतिक सतही जल निकास प्रणाली खत्म होती जा रही है. खेती करने वाली भूमि भी अत्यधिक वर्षा और मृदा क्षरण समस्याओं के दबाव में है. गतिशील तरल परिस्थितियों में नदियाँ सक्रिय प्राकृतिक शक्ति का परिचय देती हैं. अतः कृषि भूमि और भीतरी प्रदेशों की आबादियों का बचाव करने की बेहद जरूरत है.
हिमाचल प्रदेश में नदी और उसकी उपनदियों जिनकी जल धाराएँ उद्गम की ओर बहती हैं, उनमें आने वाली बाढ़ों से काफी मात्रा में पानी आबादी वाले क्षेत्रों में चला जाता है.
जिले को मौसमी बाढ़ और विस्तृत भू-क्षरण से बचाने के लिए, पंजाब सरकार के सिंचाई विभाग के जल निकास प्रभाग ने नवाँशहर जिले में सतलज नदी पर बाढ़ से बचाव करने के कार्यों का प्रस्ताव प्रस्तुत किया है. तदनुसार, नाबार्ड ने आरआईडीएफ - V के तहत 29 बाढ़ से बचाव कार्यों के लिए रु. 3.33 करोड़ और आरआईडीएफ - VII के तहत 13 बाढ़ से बचाव कार्यों के लिए रु. 2.51 करोड़ की आरआईडीएफ सहायता मंजूर की. बाढ़ से बचाव करने के इन विभिन्न कार्यों में स्टडों, स्प्यूरों और रिवेटमेंटों का निर्माण शामिल है जिन्हें स्थानीय बोली में धुस्सी बंद कहा जाता है. मिट्टी से बने ये तटबंध बड़े-बड़े निचले इलाकों और उर्वरक भूमियों को जलमग्न होने से बचाते हैं. स्टड, स्प्यूर और रिवेटमेंट ज़ंग राधी वायर की सहायता से निर्मित मिट्टी की खांचेदार संरचनाएँ होती हैं. स्टड्स जहाँ किनारों अथवा कृषि भूमि को कटने से बचाते हैं, वहीं स्प्यूर नदी के प्रवाह को धीमा करने का कार्य करते हैं. यह बताया गया है कि पंजाब के रोपड़ जिले से फिरोज़पुर जिले के हरिके तक सतलज नदी को चैनलाइज़ करके लगभग एक लाख एकड़ भूमि को बचाया/ भूमि-पुनरुद्धार किया गया है. नदी के इस बंधीकरण के कारण नदी की ओर से भी काफी प्राकृतिक प्रतिरोध उत्पन्न हुआ. किन्तु इस कार्य से होने वाले आर्थिक लाभों की तुलना में खर्च की गई लागत छोटी लगने लगी.
बाढ़ से सुरक्षा के इन कार्यों से उपचित लाभों के कारण ग्राम वासियों ने असीम हर्ष व्यक्त किया है. इसके कुछ फायदे नीचे दिए जा रहे हैं :
मूलभूत स्थानों में कार्यों ने नदी की जलधारा को मोड़ दिया है और ग्रामवासियों ने इस क्षेत्र सहित गाद निकालने से पुनरुद्धार हुई भूमि पर कृषि कार्य करना शुरू कर दिया है.
आरआईडीएफ की सहायता से बाढ़ से बचाव के कार्यों के फलस्वरूप ग्रामवासी बाढ़ की चिंता से मुक्त हो गए हैं और अब वे अपने कृषि परिचालनों में विविधता ला रहे हैं, मकानों के निर्माण में निवेश कर रहे हैं और पशुशालाओं का निर्माण कर रहे हैं.
चूँकि भूमि काफी निचले स्तर पर फैली हुई है और जब अत्यधिक जल प्रवाह के कारण किनारा टूटता है तो उसके परिणाम काफी गंभीर होते हैं क्योंकि बाढ़ का पानी भीतरी भूमि में कई किलोमीटरों तक प्रवेश कर जाता है. बाढ़ सुरक्षा के किए गए कार्यों और समय-समय पर की गई उनकी मरम्मत से ऐसी घटनाओं के फिर से घटित नहीं होने के संबंध में ग्रामवासियों को निश्चिंत करने में सफलता मिली है.
आरआईडीएफ के तहत निर्मित सड़क का वाटरशेड विकास पहलों पर प्रभाव - तमिलनाडु का कडवकुरिचि संरक्षित वन (केआरएफ)
तमिलनाडु के दिंडिगल जिले के नीलकोट्टै तालुका के मुख्यालय नीलकोट्टै कस्बे के दक्षिण पश्चिम में चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित कडवकुरिचि संरक्षित वन के आस-पास स्थित गाँवों से शहर जाने के लिए अच्छी सड़क नहीं थी. वर्ष 2000-01 के दौरान, ग्रामीण समुदाय ने नीलकोट्टै से उनके गाँवों तक सड़क बनवाने हेतु नाबार्ड से संपर्क किया. उन्हें यह कहा गया कि नाबार्ड केवल पहले से बनी हुई सड़कों के सुधार के लिए वित्तपोषण प्रदान करता है और नई सड़क के निर्माण के लिए पैसा नहीं दिया जा सकता है. ग्रामवासियों ने अपने बलबूते ही अपने खेतों की भूमि देकर तथा अपनी मेहनत से ही नई सड़क का विकास करने का निर्णय लिया. इस प्रकार उन्होंने 5 किलोमीटर की कच्ची सड़क बिछा दी. तीन माह बाद ग्रामवासी नाबार्ड के क्षेत्रीय कार्यालय में पुनः आए और कहा कि उनके द्वारा विकसित की गई सड़क का सुधार किया जाए.
क्षेत्रीय कार्यालय (चेन्नै) उनकी निष्ठा और परिश्रम से काफी प्रभावित हुआ, तथा राजमार्गों के मुख्य इंजीनियर से अनुरोध किया कि वे इस सड़क को रु.46 लाख के परिव्यय के साथ आरआईडीएफ के तहत शामिल कर लें. कुछ माह में सड़क के सुधार का कार्य पूरा हो गया और ग्रामवासी नाबार्ड के प्रति आभारी थे. ग्रामवासी विभिन्न विकासात्मक गतिविधियों के माध्यम से अपने गाँवों में सुधार लाने हेतु पहले से ही एक गैर-सरकारी संगठन की स्थापना कर चुके थे. क्षेत्रीय कार्यालय गाँव में विद्यमान कार्य करने के सामूहिक जोश से आश्वस्त था, अतः उसने उन्हें वाटरशेड विकास अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया चूँकि वाटरशेड विकास निधि (डब्ल्यूडीएफ) के तहत इस जिले (दिंडीगल) की इस उद्देश्य के लिए पहचान की गई थी. कडवकुरिचि संरक्षित वन के आस-पास के गाँवों के लिए यह सड़क विकास का एक अग्रदूत बन गई.
आरआईडीएफ के तहत इस सड़क के सफलतापूर्वक निर्माण के पश्चात् द सेंटर फॉर इम्प्रूव्ड् रूरल हेल्थ एण्ड एन्वायर्मेंटल प्रोटेक्शन (सीआईआरएचईपी) नाम के एक स्थानीय गैर-सरकारी संगठन ने वाटरशेड विकास निधि के तहत इन गाँवों को विकसित करने का बीड़ा उठाया. एनजीओ ने क्षमता निर्माण चरण (सीबीपी) के तहत चार परियोजनाओं की पहचान की है तथा नाबार्ड द्वारा एक और परियोजना पर विचार किया जा रहा है. इन परियोजनाओं के अंतर्गत 5000 हेक्टेयर का कुल क्षेत्रफल कवर किया जाएगा जिससे 25000 से भी अधिक लोग प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से लाभान्वित होंगे. एक सड़क किस प्रकार किसी क्षेत्र में अन्य विकासात्मक गतिविधियों का मार्ग प्रशस्त करती है, सफलता की यह कहानी उसकी बानगी है.
टिहरी गढ़वाल जिले के अति-दूरस्थ गाँव गेवाली में गैर-सरकारी संगठन द्वारा संवर्धित लघु पनबिजली परियोजना की सफलता की एक कहानी
गवाली गाँव पहुँचने के लिए आपको काफी ताकत और हिम्मत की जरूरत पड़ती है क्योंकि वहाँ पहुँचने के लिए आपको 15 किलोमीटर की पैदल चलकर तय करनी पड़ती है. रास्ता काफी ऊबड़-खाबड़ और सख्त पहाडियों भरा है. अति-दुर्गम यह गाँव हिमालय पर्वतमाला में 7000 फुट की ऊँचाई पर स्थित है. यह गाँव टिहरी गढ़वाल जिले के भीलगंगा खंड के अंतर्गत आता है. इस गाँव तक पहुँचनें की कठिनाइयों के कारण वहाँ अगले दस से बीस वर्ष में भी बिजली पहुँचने की संभावना कतई नहीं थी. बहरहाल, गाँव के एक गैर-सरकारी संगठन, ग्राम विकास पंचायत समिति, सरकार द्वारा गाँव में बिजली पहुँचाने हेतु इतने लंबे समय तक इंतजार करने के लिए तैयार नहीं था. एनजीओ के युवा अध्यक्ष बचन सिंह रावत और विभिन्न गाँवों में कई कल्याणकारी कार्यक्रमों को अंजाम देने वाले उनके अति उत्साही दल ने इस गाँव के विद्युतीकरण के लिए गंभीरता से विचार करना शुरू कर दिया. वर्ष 1996 में इनकी मुलाकात एक जर्मन एजेंसी फोर्राड से हुई, जिसने उन्हें गाँव में एक लघु पनबिजली परियोजना की स्थापना करने का सुझाव दिया. फोर्राड के एक विशेषज्ञ ने इस परियोजना की साध्यता पर एनजीओ और ग्राम-वासियों से विचार-विमर्श किया. ग्राम-वासियों और एनजीओ की लगन से प्रभावित होकर फोर्राड ने परियोजना के लिए अनुदान सहायता प्रदान करने की अपनी सहमति व्यक्त की तथा प्रारंभिक खर्चों को पूरा करने के लिए रु. 20,000 भी मंजूर कर दिए. एनजीओ के समक्ष अगली चुनौती थी जल-धारा का उपयोग करने हेतु अनुमति लेना और बिजली उत्पादन के लिए भूमि की व्यवस्था करना. जिला प्रशासन से इसके लिए अनुमति प्राप्त करने में एक वर्ष का समय लग गया. अंततः फोर्राड ने सिंतबर 1999 में एनजीओ को वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध करा दी जिसमें मशीनों की आपूर्ति (रु. 3.28 लाख मूल्य की), एनजीओ के कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण और रु. 1.70 लाख की नकद सहायता शामिल थी. रु.4.00 लाख की खर्च की शेष राशि ग्रामवासियों (रु. 1.64 लाख) और ग्राम विकास पंचायत समिति (रु. 2.36 लाख) द्वारा लगाई गई. 25 किलोवाट की स्थापन क्षमता वाली इस परियोजना को मात्र रु. 9.00 लाख की कुल लागत पर पूरा कर लिया गया.
गैर-सरकारी संगठन के समक्ष सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य
एनजीओ और ग्रामवासियों के समक्ष समस्या तब आई जब उन्हें गाँव से संबसे निकटवर्ती सड़क मार्ग बिनायखल से गेवाली तक भारी मशीनों को ले जाना पड़ा. अर्थात् उन्हें उन भारी मशीनों को उठाकर खड़ी ढलानों और घने जंगल के संकरे रास्तों से होते हुए 15 किलोमीटर की दूरी तय करना था. धुन के पक्के और अपने गाँव को विद्युतीकृत करने के लिए किसी भी चुनौती का सामना करने हेतु कठिबद्ध ग्रामवासियों को इन भारी मशीनों को गंतव्य तक पहुँचाने की जिम्मेदारी सौंपी गई. इस सामग्री में इस्पात के 39 नर्म पाइप, एक टर्बाइन और प्रत्येक मकान के लिए एक आल्टर्नेटर शामिल थे. ग्राम-वासियों ने राशि इकट्ठा करके मशीनों को लादने के इस कार्य का ठेका नेपाली श्रमिकों को दिया. कुछ सामग्री पहुँचाने के बाद, अन्य गाँवों के कुछ असंतुष्ट तत्वों के बहकावे में आकर नेपाली श्रमिक इस कार्य को बीच में ही छोड़कर चले गए. ग्रामवासियों ने शेष पाइपों और मशीनों को स्वयं ही मंजिल तक पहुँचाने का निश्चय किया. उन्होंने इस कार्य के लिए पास के गाँव, जखाना के निवासियों का भी सहयोग लिया. पर्याप्त शक्ति और एकता के लिए इस अति-कठिन अभियान पर निकलने से पहले ग्रामवासियों ने 'ग्रामदेवता' की पूजा भी की. आल्टर्नेटर मशीन इतनी भारी थी कि उसे उठाने के लिए कम-से-कम 30 लोग एक साथ लगे.
फोर्राड द्वारा प्रशिक्षण
एनजीओ के दो लोगों को फोर्राड ने दिल्ली में 18 दिनों के लिए परियोजना के तकनीकी और रखरखाव से संबंधित पहलुओं पर प्रशिक्षण प्रदान किया.
परियोना के बारे में
गेवाली लघु पनबिजली परियोजना की स्थापना क्षमता से 25 किलावाट की बिजली का उत्पादन किया जा सकता है. गाँव के लगभग 70 मकानों को विद्युतीकृत किया जा चुका है और प्रत्येक मकान को मात्र रु. 26.00 के मासिक शुल्क पर बिजली का कनेक्शन दिया गया है. परियोजना के रखरखाव का कार्य फोर्राड से प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्तियों द्वारा रु. 500 के प्रति व्यक्ति मासिक वेतन पर किया जा रहा है. एनजीओ का प्रस्ताव है कि परियोजना की निगरानी और रखरखाव के पर्यवेक्षण, शुल्क की वसूली और उपभोक्ताओं द्वारा बिजली के दुरुपयोग की रोकथाम के कार्य में गाँव के स्वयं सहायता समूहों को शामिल किया जाय.
एनजीओ निकट के जखाना नाम के गाँव के साथ अतिरिक्त उत्पादित बिजली को बांटने की बात सोच रहा है. दीर्घकालिक संभाव्यता के रूप में एनजीओ का यह भी मत है कि बिजली के घरेलू उपयोग के अलावा, यह भी संभव हो सकता है कि भविष्य में गाँव के परिवार बिजली चालित गैर-कृषि क्षेत्र के उद्यम भी प्रारंभ कर पाएँ. गैर-सरकारी संगठन ऊन आधारित उत्पादों पर कार्य प्रारंभ करने की योजना बना रहा है. क्योंकि फिलहाल ग्रामवासी उस क्षेत्र में प्रतिवर्ष उत्पादित हो रहे 10,000 किलोग्राम ऊन का सदुपयोग करने की समस्या से जूझ रहे हैं.
सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव
- पर्यावरण को बिना कोई छोटे-से-छोटी हानि पहुँचाए इस लघु-पनबिजली परियोजना की स्थापना की गई है.
- चूँकि इसमें व्यापक वितरण/ प्रसारण प्रणाली शामिल नहीं थी, अतः गाँव के आस-पास फैले घने जंगल को किसी भी प्रकार की हानि नहीं हुई है.
- निम्नलिखित कारणों की वजह से गाँव को लंबे 30 वर्ष बीत जाने पर भी कभी बिजली प्राप्त नहीं होती
15 किलोमीटर लंबी समुचित सड़क की अनुपस्थिति में संबंधित सामग्री का परिवहन एक बड़ी समस्या होती. उस क्षेत्र में सड़क बनाना सरकार के लिए भी आगामी कई वर्षों में संभव नहीं था. क्षेत्र घने जंगलों से घिरा होने के कारण ग्रामवासियों और बिजली विभाग को वन विभाग से अनुमति प्राप्त करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती
.
उपलब्ध संभावनाएँ
एनजीओ और गेवाली गाँव के ग्रामवासियों द्वारा किए गए अनोखे कारनामे से समूचे जिले में बैंकों से ऋण सहायता के माध्यम से लघु-पनबिजली परियोजनाओं की स्थापना हेतु व्यापक संभावनाएँ खुल गई हैं. लोगों की प्रतिक्रिया और गैर-सरकारी संगठन के निष्ठापूर्वक प्रयासों से प्रोत्साहित होकर फोर्राड ने एनजीओ के साथ मिलकर उस क्षेत्र में ऐसी कुछ अन्य परियोजनाओं की पहचान की है.
लघु-पनबिजली परियोजना के फायदे
लघु-पनबिजली परियोजना को 2 वर्ष की अवधि में एक भी परिवार को प्रभावित किए बिना स्थापित किया जा सकता है. इस पर अतिरिक्त खर्च मामूली होता है और रखरखाव लागत तो होती ही नहीं है. लोग प्रति माह मात्र रु. 26 का भुगतान करके पूरे माह निर्विघ्न बिजली की आपूर्ति का लाभ उठा रहे हैं. चूँकि वितरण व्यवस्था बड़ी नहीं है, अतः बिजली के प्रसारण में वहानि भी अति नगण्य होती है.
परियोजना का शुभारंभ
परियोजना का शुभारंभ दिनांक 12 नवंबर 2001 को किया गया और इसका प्रबंधन उपभोक्ताओं में से ही चुनी हुई 'ऊर्जा पंचायत' द्वारा किया जाता है. इस पंचायत में 4 पुरुष और 2 महिलाएँ होती हैं.
पी एन सरंगल
समप्र-जिला विकास अधिकारी, टिहरी, गढ़वाल
टिहरी गढ़वाल जिले के अति-दूरस्थ गाँव गेवाली में गैर-सरकारी संगठन द्वारा संवर्धित लघु पनबिजली परियोजना की सफलता की एक कहानी
परियोजना की प्रमुख विशेषताएँ
परियोजना कहाँ स्थित है
गाँव गेवाली, भीलांगना खंड, जिला टिहरी गढ़वाल
लघु-पनबिजली परियोजना की स्थापित क्षमता
25 किलोवाट
परियोजना की कुल लागत
9.00 लाख
निधियों के स्रोत
क) फोर्राड द्वारा रु. 5.00 लाख का अंशदान (मशीनरी की लागत के रूप में रु. 3.30 लाख और नकद सहायता के रूप में रु.1.70 लाख)
ख) गैर-सरकारी संगठन (ग्राम विकास पंचायत समिति) द्वारा रु. 2.36 लाख का अंशदान
ग) ग्रामवासियों द्वारा रु. 1.64 लाख का अंशदान.
लाभान्वित गाँवों की संख्या
2 (फिलहाल गेवाली और निकट भविष्य में जखाना)
लाभान्वित परिवारों की संख्या
120 (फिलहाल 70 और निकट भविष्य में 50)
प्रति परिवार निवेश लागत
फिलहाल रु. 12,858 प्रति परिवार और निकट भविष्य में रु.7500 प्रति परिवार.
उपभोक्ताओं की स्थिति
सभी परिवार गरीबी की रेखा से नीचे के हैं
उपभोक्ताओं को लागत
रु. 26 प्रति परिवार, प्रति माह.
रखरखाव की लागत
रु. 1000 प्रति माह के वेतन के साथ 2 प्रशिक्षित व्यक्ति, प्रति व्यक्ति रु. 500 की दर से.
सृजित आय
फिलहाल रु. 1820 तथा रु. 3120 होने की संभावना है
रखरखाव पर आवर्ती व्यय
शून्य
परियोजना के परिचालन का माध्यम
एनजीओ और ग्राम पंचायत द्वारा गठित ऊर्जा पंचायत के माध्यम से. |