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मीडिया कक्ष

नाबार्ड अगले दो सालों में 5000 कृषक उत्पादक संगठनों (एफ़पीओ) का संवर्धन करेगा
मुंबई | July 2018
2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के केंद्र के आह्वान को ध्यान में रखते हुए नाबार्ड द्वारा कृषक उत्पादक संगठनों (एफ़पीओ) के संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने उम्मीद जताई कि यह शीर्ष विकास बैंक अगले दो सालों में 5000 एफ़पीओ का संवर्धन करने की उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल कर लेगा.
 
नाबार्ड के 37वें स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर “सामूहिकीकरण और बाजार संयोजन के संदर्भ में कृषक उत्पादक संगठन” विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बोलते हुए श्री जेटली ने कहा कि भारतीय कृषि से संबन्धित नाबार्ड का कामकाज और भारतीय कृषि पर उसका प्रभाव उल्लेखनीय रहा है. 
 
वीडियो कॉन्फरेंसिंग के माध्यम से संगोष्ठी को संबोधित करते हुए श्री जेटली ने कृषि उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि करने के सरकार के हालिया निर्णय पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर कृषि उत्पादों के प्रभावी विपणन के लिए एक संघीय ढांचा बनाने की दिशा में काम करने की जरूरत है. 
 
वित्त मंत्री ने कहा कि जब छोटे और सीमांत किसान समूहों में संगठित होते हैं तो उन्हें बड़े पैमाने पर काम करने से होने वाली किफायत का फायदा पहुंचता है. 
 
उन्होंने कहा, “देश में अधिकांश भूजोतें छोटे और सीमांत किसानों की हैं. असंगठित होने के कारण उन्हें अपनी उपज की सही कीमत नहीं मिलती. अगर उन्हें एफ़पीओ के रूप में एक साथ लाया जाए तो उन्हें अपनी निवेश वस्तुएं खरीदने, अपने उत्पादों के प्रसंस्करण और उनकी बिक्री करने में बड़े पैमाने पर काम करने से होने वाली किफायत का फायदा मिलेगा.”  
हाल के केंद्रीय बजट में रु. 100 करोड़ तक के टर्नओवर वाले एफ़पीओ को कर से छूट की अनुमति देने की घोषणा की चर्चा करते हुए मंत्री महोदय ने एफ़पीओ के संवर्धन, उन्हें बड़े पैमाने पर अपनाने और उनके विकास के प्रति सरकार के सहयोग की प्रतिबद्धता को दोहराया.  
 
नाबार्ड ने वित्तीय वर्ष 2018 के अंत तक लगभग 4000 एफ़पीओ को सहायता दी है जिनमें से 2000 एफ़पीओ पंजीकृत हैं और कृषि से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय रूप से कारोबार कर रहे हैं.  507 एफ़पीओ निवेश वस्तुओं की थोक में खरीद और वितरण का काम कर रहे हैं जबकि 223 एफ़पीओ फलों और सब्जियों के समेकन और विपणन के कार्य से जुड़े हैं. कृषक उत्पादक संगठन कृषि-प्रसंस्करण, सरकारी खरीद योजना, डेयरी, जैव कृषि, बीज उत्पादन और विपणन, मछली पालन और अन्य अनुषंगी कार्य भी कर रहे हैं. 
 
इसके पहले संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री श्री शिव प्रताप शुक्ल ने घोषणा की कि नाबार्ड अगले दो वर्षों में 5000 और एफ़पीओ का संवर्धन करेगा. उन्होंने कहा कि सरकार 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लिए कृतसंकल्प है और एफ़पीओ के संवर्धन के लिए किए जा रहे विविध प्रयास इस लक्ष्य को पूरा करने में सहायक होंगे. 
नाबार्ड के अध्यक्ष डॉ. हर्ष कुमार भनवाला ने नाबार्ड द्वारा कृषि की उत्पादकता और खेती से होने वाली आय को बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए बताया कि इस शीर्ष विकास बैंक ने किसान क्लबों, ग्राम वाटरशेड समितियों, स्वयं सहायता समूहों और संयुक्त देयता समूहों के रूप में किसानों को संगठित करने में अग्रणी भूमिका निभाई. उन्होंने  कहा कि विद्यमान किसान समूहों को संधारणीय कृषक उत्पादक संगठनों में रूपांतरित कर इन प्रयासों को और मजबूत बनाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं. उद्देश्य यह है कि कृषक उत्पादक संगठनों के संवर्धन का काम मिशन की तरह किया जाए और एफ़पीओ को एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन बना दिया जाए. 
 
संगोष्ठी में कृषक उत्पादक संगठनों के लिए अनुकूल वातावरण बनाने की जरूरत पर बल दिया गया जिसके तहत कुशल मानव संसाधन, उद्यम पूंजी, समेकन और भंडारण के लिए बुनियादी संरचनाओं और कम लागत पर ऋण और बाजार से जुड़ने की व्यवस्था जैसी जरूरतों को पूरा करना प्राथमिकता है. संगोष्ठी में सामूहिकीकरण को बल देने के लिए लचीली राज्य-विशिष्ट नीतियां बनाने की वकालत की गई. चर्चा में भाग लेने वाले विशेषज्ञों ने संगठनों को बाजार तक सीधी पहुंच उपलब्ध कराने के लिए एपीएमसी अधिनियम में संशोधन का सुझाव भी दिया. संगठनों को ग्रामीण कृषि बाजार (ग्राम) के बराबर हैसियत देने की अवधारणा पर भी चर्चा की गई. 
 
कृषक उत्पादक संगठनों को संधारणीय बनाने और उनके प्रबंधन में व्यावसायिकता लाने की दृष्टि से कई और सुझाव भी सामने आए. संगठनों के पास मूलभूत जरूरत वाली बुनियादी संरचनाएं हों जो उनके स्वामित्व की हों और जिनका प्रबंधन वे स्वयं करें; न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना के अंतर्गत कृषि उत्पादों की खरीद इन संगठनों के माध्यम से की जाए; आरंभिक पांच वर्षों तक संगठनों को सांविधिक अनुपालन से छूट दी जाए और निजी निवेशकों के द्वारा इन संगठनों में सीमित इक्विटी सहभागिता का प्रावधान किया जाए. 
 
नाबार्ड के पास विशेष रूप से कृषक उत्पादक संगठनों के संवर्धन के उद्देश्य से गठित उत्पादक संगठन विकास निधि (पीओडीएफ़) और प्रोड्यूस निधि हैं. नाबार्ड की सहायक संस्था नैबकिसान फ़ाइनेंस लिमिटेड के माध्यम से कृषक उत्पादक संगठनों के वित्तपोषण, संगठनों से संबन्धित आंकड़ों के डिजिटाइजेशन, कार्य निष्पादन को मापने के लिए साधन विकसित करने आदि से भी संवर्धन के प्रयासों को बल मिला है. इनके अलावा, नाबार्ड जागरूकता अभियान भी चला रहा है जिसमें जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता विकसित करने, उत्पादकता बढ़ाने और कृषि मूल्य शृंखला में इष्टतम क्षमता प्राप्त करने में एफ़पीओ की भूमिका के बारे में जानकारी दी जाती है. 
 
श्री एस के पट्टनायक, सचिव, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने लाभ को अधिकतम करने के लिए आपूर्ति शृंखला तक किसानों की सीधी पहुंच की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. उन्होंने कहा कि भारत फिलहाल कृषि उपज की बहुतायत की समस्या का सामना कर रहा है जिसे उपयुक्त विपणन तंत्र, मूल्यवर्धन और प्रसंस्करण से दूर किया जा सकता है और इसमें एफ़पीओ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. 
 
भारतीय रिज़र्व बैंक की कार्यपालक निदेशक श्रीमती सुरेखा मराण्डी ने बताया कि केंद्रीय बैंक एफ़पीओ के लिए उनकी आवश्यकता के अनुरूप ऋण उत्पाद डिज़ाइन करने में सहयोग देने के लिए तैयार है जैसा कि स्वयं सहायता समूहों को बैंकों से जोड़ने के मामले में पहले किया गया था. 
 
प्रोफेसर अशोक गुलाटी, निदेशक, आईसीआरआईईआर ने संगोष्ठी के समापन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि कृषि उत्पादों की बेहतर कीमत के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 और एपीएमसी अधिनियम में संशोधन की आवश्यकता है. उन्होंने यह भी कहा कि इन्डोनेशिया में अपनाए गए अग्रणी किसान मॉडल को भारत में अपनाने की जरूरत है. उन्होंने यह विश्वास भी व्यक्त किया कि यदि आवश्यक विधायी संशोधन किए जाते हैं तो भारत में भी एफ़पीओ की अवधारणा से उसी प्रकार के परिणाम हासिल किए जा सकते हैं. 
 
नाबार्ड के उप प्रबंध निदेशक श्री एच आर दवे और श्री आर अमलोरपवनाथन के अलावा सेबी, एनसीडेक्स और बैंकिंग उद्योग के शीर्ष अधिकारियों ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए.