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ज़िला स्तरीय तकनीकी समिति और राज्य स्तरीय तकनीकी समिति द्वारा वित्तमानों का निर्धारण
पिछले कुछ दशकों से भारत, कृषि के लिए वाजिब दरों पर सुविधाजनक ऋण प्रदान करने के मार्ग पर अग्रसर है. एक ओर कृषि गतिविधियों की व्यवहार्यता सुनिश्चित करने इस क्षेत्र को समय पर ऋण उपलब्धता और दूसरी ओर देश की खाद्य सुरक्षा की आवश्यकता का महत्त्व कम नहीं है.  वर्ष 1998-99 में शुरू की गई पारदर्शी ऋण सुविधा किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) से कृषि ऋण की सुलभ उपलब्धता महत्त्वपूर्ण है.  साथ ही, प्रत्येक किसान को केसीसी की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि सभी किसानों को समय पर ऋण उपलब्ध किया जा सके. ज़िला स्तर पर तय किए जाने वाले वित्तमान प्रत्येक फसल के लिए पात्र ऋण और किसान की पहचान का एक आधार बन जाता है.   वित्तमान, खेती की जाने वाली फसल और क्षेत्र के आधार पर केसीसी की सीमा तय की जाती है. ज़िले में सहकारी बैंक की अगुवाई में फसल के लिए वित्तमान तय करने की प्रथा कई दशकों से चली आ रही है. 
 
2. वर्तमान में ज़िला मध्यवर्ती सहकारी बैक (डीसीसीबी), ज़िला स्तरीय तकनीकी समिति की बैठक का आयोजन करता है और इस बैठक की अध्यक्षता प्राय: ज़िला मध्यवर्ती सहकारी बैंक (डीसीसीबी) के मुख्य कार्यपालक अधिकारी/ उपलब्ध वरिष्ठतम अधिकारी करते हैं.  कृषि क्षेत्र की चुनौतियों का विश्लेषण करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा गठित आंतरिक कार्य ने वित्तमान की निर्धारण में समानता और पारदर्शिता लाने की आवश्यकता पर बल दिया है.  इन सुझावों की भारतीय रिज़र्व बैंक और नाबार्ड ने समीक्षा की और वर्तमान दिशानिर्देशों में निम्नानुसार संशोधन करने का निर्णय किया गया है ।
 
3. यह निर्णय किया गया कि वित्तमान तय करने में ज़िला स्तरीय तकनीकी समिति प्रमुख भूमिका निभाती रहेगी और अपने सदस्यों / सभी प्रमुख हितधारकों से प्रस्ताव प्राप्त करेगी तथा हितधारकों से प्राप्त सुझावों के आधार पर कार्यसूची तैयार करेगी.  अनुमोदन के बाद ये प्रस्ताव राज्य स्तरीय तकनीकी समिति (एसएलटीसी) को भेजे जाएंगे. राज्य स्तरीय तकनीकी समिति ज़िले की स्थितियों/ ज़िले की विशेषताओं/ कृषि-जलवायु क्षेत्र आदि के आधार पर प्रस्तावों की समीक्षा करेगी और उनका अनुमोदन करेंगी. इस प्रकार अनुमोदित वित्तमान, अपनाए जाने के लिए सभी हितधारकों में परिचालित किया जाएगा.  इसके व्यापक प्रसार के लिए राज्य स्तरीय बैंकर समिति, राज्य सहकारी बैंक, ज़िला मध्यवर्ती सहकारी बैंक, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की वेबसाइट पर प्रमुखता से रखा जा सकता है.  वित्तमान को तय करने के लिए प्रोद्योगिकी का अधिकतम प्रयोग त्वरित और पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए सभी संबंधितों को  प्रयास करना होगा.  इस संबंधित विस्तृत प्रक्रिया यहाँ दी जा रही है।
 
4. ज़िला स्तरीय तकनीकी समिति (डीएलटीसी)
क. गठन
ज़िला प्रशासन, ज़िला स्तरीय तकनीकी समिति (डीएलटीसी) का गठन करता है जिसमे ज़िला मध्यवर्ती सहकारी बैंक इसका संयोजक होता है और यह ज़िला सलाहकार समिति (डीसीसी) के साथ मिल कर कार्य करता है. ज़िलाधीश/ ज़िला न्यायाधीश(मेजिस्ट्रेट) इस समिति के अध्यक्ष नियुक्त किए जाते हैं.  इनकी अनुपस्थिति में ज़िले के कृषि विभाग प्रमुख समिति की अध्यक्षता कर सकते हैं.  समिति में अग्रणी ज़िला प्रबन्धक/ नाबार्ड के ज़िला विकास प्रबन्धक/ज़िला विकास अधिकारी, कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन विभाग के प्रतिनिधि, प्रमुख वाणिज्य बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, प्रमुख ग़ैर-सरकारी संगठन और संबंधित ज़िले के प्रगतिशील किसान इसके सदस्य हो सकते हैं.  कृषि विज्ञान केंद्र/ कृषि विश्वविद्यालय/ पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय/ मत्स्य पालन महाविद्यालय या विश्वविद्यालय/ भारतीय कृषि और अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र/ कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंध संस्थान आदि के प्रतिनिधि  नियमित सदस्यों के रूप में बैठक में आमनित्रित किए जाएँ. 
ख. प्रक्रिया 
 
हितधारकों से प्राप्त प्रस्ताव अथवा तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तावित सुझावों को समिति के विचारार्थ प्रस्तुत किया जाएगा. फसलों से संबंधित प्रस्तावों की समीक्षा कृषि विभाग करेगा जबकि पशुपालन और मत्स्य पालन विभाग कार्यशील पूंजी के लिए अपने-अपने क्षेत्रों से संबंधित प्रस्तावों की समीक्षा कर इन्हें समिति के समक्ष रखेंगे.  निवेश-वस्तुओं की मौजूदा लागत, उत्पादकता और उत्पाद का बाज़ार मूल्य और कृषि विज्ञान केंद्र/ कृषि विश्वविद्यालय/ पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय/ मत्स्यपालन महाविद्यालय/ विश्वविद्यालय/ भारतीय कृषि और अनुसंधान परिषद के अनुसंधान केंद्र, कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन संस्था आदि से प्राप्त तकनीकी जानकारी को ध्यान में रख कर प्रस्तावों की समीक्षा की जानी चाहिए.
ग. वित्तमान निर्धारण 
 
ज़िले में की जाने वाली ग्रीष्मकालीन फसलों सहित, यदि कोई हो, विभिन्न मौसमी फसलों के लिए विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्र, फसल प्रथाओं आदि विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखते हुए प्रति एकड़ आधार पर वित्तमान का निर्धारण किया जाना चाहिए.  सिंचित असिंचित फसलों, खेती के पारंपरिक और आधुनिक पद्धतियों और कृषि प्रथाओं में स्थानीय परिवर्तनों, यदि कोई हो, के लिए  अलग-अलग वित्तमान निर्धारित किए जाएँ.  जिन जिलों में जैव खेती/ प्राकृतिक खेती की जाती है उनके लिए अलग-अलग वित्तमानों का निर्धारण किया जाए. पशुपालन गतिविधियों के मामले में प्रचलित प्रथाओं और उत्पादन गतिविधियों को चलाने के लिए सभी आवर्ती खर्च का ध्यान रखते हुए ज़िले में की जाने वाली सभी प्रकार के पक्षियों/ प्रति पशु के लिए वित्तमान का निर्धारण किया जाए. इसी प्रकार मत्स्यव्यवसाय के लिए निवेश के औसत इकाई आकार के आधार पर वित्तमान का निर्धारण किया जाए. वित्तमान के निर्धारण के समय निम्नलिखित अतिरिक्त उपाय किए जा सकते हैं: 
 
i. हालांकि वित्तमान का निर्धारण ज़िले के लिए किया जाता है तथापि, ज़िले के भीतर यदि कृषि जलवायु में भिन्नता पाए जाने की स्थिति में अलग-अलग वित्तमानों का निर्धारण करना चाहिए.  
ii. वास्तविक वित्तमान के निर्धारण की प्रक्रिया के लिए ज़िला स्तरीय तकनीकी समिति एक डाटा बेस तैयार करना होगा और विस्तृत वर्कशीट्स रखने चाहिए. 
iii. अपनाई जाने वाली प्रथाओं के पैकेज के आधार पर वित्तमानों का निर्धारण किया जाना चाहिए और बैंकों के पास संसाधनों की कमी के संबंध में उल्लेख नहीं किया जाना चाहिए. 
iv. बागान/बागबानी, ऊतक संवर्धन आधारित पौधों आदि के उत्पादनों हेतु बीज उत्पादकों द्वारा बीजों के वाणिज्यिक उत्पादन के लिए अलग/ उच्चतर वित्तमन के निर्धारण की आवश्यकता है. 
v. सभी बागबानी फसलों सहित पशुपालन गतिविधियों और मत्स्यपालन गतिविधियों के लिए वित्तमानों का निर्धारण किया जाए. 
vi. ज़िले में कृषि जलवायु स्थितियों के अनुसार सुगंधित पौधों, मसलों आदि जैसी “कम वजन और उच्च मूल्य” वाले पौधों की खेती ई जाती हो तो अलग-अलग वित्तमानों का निर्धारण किया जाए. 
घ.  राज्य स्तरीय तकनीकी समिति को संस्तुति 
ज़िला स्तरीय तकनीकी समिति प्रमुख फसलों और कृषि सम्बद्ध गतिविधियों को कार्यशील पूंजी के लिए राज्य स्तरीय तकनीकी समिति  द्वारा निर्धारण और अपनाने के लिए वित्तमान प्रस्तुत करेगी. 
5. राज्य स्तरीय तकनीकी समिति 
क. गठन 
कृषि उत्पादन आयुक्त(एपीसी)/ कृषि सचिव, राज्य स्तरीय तकनीकी समिति का गठन करे. राज्य सहकारी बैंक समिति का संयोजक होगा और यह राज्य स्तरीय बैंकर समिति (एसएलबीसी) के साथ मिल कर कार्य करेगा.  कृषि उत्पादन आयुक्त समिति के अध्यक्ष होंगे और उनकी अनुपस्थिति में कृषि निदेशक बैठक की अध्यक्षता कर सकते हैं.  राज्य कृषि विभाग, पशुपालन और मत्स्यव्यवसाय विभाग, राज्य सहकारी विभाग, भारतीय रिज़र्व बैंक, नाबार्ड, राज्य स्तरीय बैंकर समिति के संयोजक, राज्य के प्रमुख वाणिज्य बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक आदि इसके सदस्य होंगे.  राज्य कृषि विश्वविद्यालय, पशुचिकित्सा विश्वविद्यालय, मत्स्यव्यवसाय विश्वविद्यालय और  भारतीय  कृषि अनुसंधान परिषद, राज्य के शोध संस्थाओं  जैसी संस्थाओं के प्रतिनिधियों को नियमित सदस्यों के रूप में आमंत्रित किया जाए. 
ख. प्रक्रिया 
डीएलटीसी द्वारा अग्रेषित प्रस्तावों को समिति के विचारार्थ रखा जाता है. राज्य कृषि विभाग कृषि फसलों के प्रस्तावों की समीक्षा करेगा जबकि पशुपालन और मत्स्यपालन विभाग अपने संबंधित क्षेत्रों के तहत कार्यशील पूंजी सीमा के प्रस्तावों की समीक्षा करेंगे और उन्हें समिति के समक्ष प्रस्तुत करेंगे. यदि आवश्यक हो, तो विभागों द्वारा राज्य कृषि विश्वविद्यालय जैसे तकनीकी संस्थानों से तकनीकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है.
ग. वित्तमान का निर्धारण 
समिति राज्य पर समग्रत: विचार करते हुए विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों, सिंचित / असिंचित क्षेत्रों, कृषि पद्धतियों तथा जिलों में विद्यमान फसल प्रथाओं में स्थानीय भिन्नताओं और बारीकियों को ध्यान में रखते हुए यथार्थपरक वित्तमान निर्धारित कर सकती है. चूंकि पारंपरिक कृषि पद्धतियों से खेती करने वाले किसान और आधुनिक कृषि पद्धतियों से खेती करने वाले प्रगतिशील किसान के लिए खेती की लागत अलग-अलग होती है, इसलिए यह वांछनीय है कि वित्तमान इस प्रकार निर्धारित किया जाए कि स्वीकार्य वित्तमान एक निश्चित राशि न होकर एक सीमा के रूप में हो. संबद्ध गतिविधियों हेतु कार्यशील पूंजी ऋण के लिए वित्तमान राज्य के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित पद्धतियों तथा इकाई के आकार, जैसे - प्रति पशु / प्रति पक्षी या निवेश के औसत आकार के आधार पर तय किया जाए .
घ. अधिसूचना 
एसएलटीसी फसल ऋणों के साथ-साथ पशुपालन और मत्स्य पालन क्षेत्रों के कार्यशील पूंजी ऋणों के वित्तमान अधिसूचित करे. वित्तमान की अधिसूचना में जिले, कृषि-जलवायु क्षेत्र, फसल के प्रकार, मौसम, उत्पादन की स्थितियों आदि का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाए. अधिसूचना का प्रोफ़ार्मा अनुबंध – I में दिया गया है. जमीनी स्तर पर सूचना का प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करने के सभी परिचालक बैंकों और स्टेकहोल्डरों को इसकी सूचना दी जाए और इसे पैरा 3 में उल्लिखित वेबसाइटों पर अपलोड भी किया जाए.  
6. समयसीमा 
एक वर्ष के लिए वित्तमान को अंतिम रूप देने के लिए डीएलटीसी और एसएलटीसी बैठक का आयोजन किया जाए. तथापि, अवश्यक होने पर एक वर्ष में अधिक बैठकों का आयोजन किया जा सकता है. इस प्रक्रिया को पूरा करने की समयसीमा नीचे दी जा रही है. इसका कड़ाई से पालन किया जाए ताकि फसल के मौसम की शुरुआत से पहले नए वित्तमान तैयार किए जा सकें.