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उपलब्धियां

नाबार्ड के मुख्यतः तीन कार्यक्षेत्र हैं - वित्तीय, विकासात्मक और पर्यवेक्षी - जिनके माध्यम से वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लगभग हर पहलू में योगदान कर रहा है. इनके अंतर्गत उसके विभिन्न दायित्व हैं : पुनर्वित्त सहायता उपलब्ध कराना, ग्रामीण आधारभूत संरचनाओं का निर्माण, जिला स्तरीय ऋण योजनाएँ तैयार करना, बैंकिंग उद्योग को ऋण वितरण के लक्ष्य प्राप्त करने में मदद करना, सहकारी बैंकों तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का पर्यवेक्षण करना और श्रेष्ठ बैंकिंग पद्धतियाँ विकसित करने में उनकी मदद करना तथा उन्हें सीबीएस प्रणाली में शामिल होने में सहायता देना, ग्रामीण विकास के लिए नई योजनाएँ तैयार करना, भारत सरकार की विकास योजनाएँ कार्यान्वित करना, हस्तशिल्प कारीगरों को प्रशिक्षण प्रदान करना और उन्हें अपने उत्पादों की बिक्री के अवसर/ मंच उपलब्ध कराना.
 
अ)   वित्तीय कार्य
 
पुनर्वित्त – अल्पावधि ऋण
 
वित्तीय संस्थानों द्वारा फसल उत्पादन के लिए किसानों को फसल ऋण दिया जाता है, जिससे देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलती है. वर्ष 2018-19 के दौरान, नाबार्ड ने वित्तीय संस्थानों को मौसमी कृषि परिचालनों के लिए ₹90088 करोड़ की राशि संवितरित की.
 
दीर्घावधि ऋण
 
नाबार्ड की दीर्घावधि पुनर्वित्त व्यवस्था के तहत वित्तीय संस्थानों को कृषि और कृषीतर क्षेत्रों की विभिन्न गतिविधियों के लिए ऋण उपलब्ध कराया जाता है जिसकी अवधि 18 माह से पाँच से अधिक वर्ष तक होती है. वर्ष 2018-19 के दौरान, नाबार्ड ने वित्तीय संस्थानों को ₹490254 करोड़ की राशि संवितरित की.
 
ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास निधि (आरआईडीएफ़)
 
भारतीय रिज़र्व बैंक ने ग्रामीण आधारभूत संरचना निर्माण की परियोजनाओं में सहायता के लिए वर्ष 1995- 96 में नाबार्ड में ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास निधि की स्थापना की थी जिसका स्रोत था अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को ऋण वितरण हेतु निर्धारित लक्ष्य में कमी की राशि. इसके तहत नाबार्ड ने 2018-19 के दौरान ₹ 22623 करोड़ की राशि संवितरित की. आज देश में ग्रामीण आधारभूत संरचना हेतु वित्तपोषण में आरआईडीएफ बहुत बड़ा योगदान है.
 
दीर्घावधि सिंचाई निधि
 
दीर्घावधि सिंचाई निधि (एलटीआईएफ़) की घोषणा 2016-17 के केंद्रीय बजट में की गई थी. इसका प्रयोजन था दिसंबर 2019 तक 18 राज्यों की 99 चयनित मध्यम और बड़ी सिंचाई परियोजनाओं को एक अभियान चलाकर तेजी से पूरा करना. इन परियोजनाओं के समन्वय और इन्हें पूरा करने में सहायता उपलब्ध कराने के लिए नोडल मंत्रालय है जल संसाधन, नदी विकास तथा गंगा पुनरुज्जीवन मंत्रालय. इसके बाद भारत सरकार ने एलटीआईएफ के तहत चार अन्य परियोजनाओं के वित्तपोषण का अनुमोदन किया है, नामत: - पोलावरम परियोजना (आंध्र प्रदेश), उत्तर कोयल परियोजना (बिहार और झारखंड), सरहिंद और राजस्थान फीडर रीलाइनिंग परियोजना (पंजाब), शाहपुर कंडी बांध परियोजना (पंजाब). 31 मार्च 2019 की स्थिति में एलटीआईएफ़ के तहत संचयी मंजूरियों की राशि ₹ 75769.90 करोड़ तथा संचयी संवितरणों की राशि ₹ 34248.73  करोड़ थी.
 
प्रधानमंत्री आवास योजना - ग्रामीण (पीएमएवाई- जी)
 
2018-19 के दौरान नाबार्ड ने राष्ट्रीय ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास एजेंसी (एनआरआईडीए) को ₹14,645.57 करोड़ की राशि मंजूर की तथा ₹10,678.80 करोड़ की राशि संवितरित की. 31 मार्च 2019 की स्थिति में एनआरआईडीए को मंजूर संचयी राशि ₹21,975 करोड़ थी जिसमें से ₹18,008.23 करोड़ की राशि संवितरित की जा चुकी है. यह वित्तीय सहायता पीएमएवाई-जी के तहत प्रदान की गई है जिसका उद्देश्य है वर्ष 2022 तक कच्चे और जीर्ण-शीर्ण मकानों में रहने वाले लोगों सहित सभी बेघर परिवारों को बुनियादी सुविधाओं से युक्त पक्के मकान उपलब्ध करवाना.
 
नाबार्ड आधारभूत संरचना विकास सहायता (नीडा)
 
नीडा के तहत आठ ऋण प्रस्तावों के माध्यम से ₹7,362.76 करोड़ के सावधि ऋण को मंजूरी दी गई जिसका 90% हिस्सा (₹6,655.00 करोड़) सिंचाई परियोजनाओं के लिए तथा शेष हिस्सा (₹707.76 करोड़) नवीकरणीय ऊर्जा, सड़क तथा विद्युत्  संचार परियोजनाओं के लिए था. नाबार्ड ने महाराष्ट्र सरकार के साथ एक करार किया जिसके अंतर्गत वर्ष के दौरान बलीराजा जल संजीवनी योजना के तहत राज्य के 14 सूखा-प्रवण जिलों में 1,82,750 हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता सृजित करने के लिए 68 अपूर्ण मध्यम/ लघु सिंचाई परियोजनाओं को पूरा किया जाना था. इसके लिए  नीडा के तहत ₹6,650 करोड़ करोड़ का सावधि ऋण मंजूर किया गया था.
 
संचयी रूप से, 80 परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है जिनके तहत सावधि ऋण की राशि ₹30,574.30 करोड़ है जिसमें से ₹11,566.95 करोड़ का संवितरण किया जा चुका है.
 
भंडारागार आधारभूत संरचना निधि
 
भारत सरकार ने देश में कृषि वस्तुओं के लिए वैज्ञानिक भंडारागार की आधारभूत संरचना आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऋण सहायता उपलब्ध कराने के प्रयोजन से वर्ष 2013- 14 में ₹ 5,000 करोड़ की समूह निधि के साथ भंडारागार आधारभूत संरचना निधि का सृजन किया. 31 मार्च 2019 की स्थिति में इसके तहत संचयी संवितरणों की राशि ₹ 5,896 करोड़ थी.
 
खाद्य प्रसंस्करण निधि 
 
क्लस्टर आधार पर संगठित क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारत सरकार ने ₹2,000 करोड़ की समूह निधि के साथ 2014-15 में नाबार्ड में  खाद्य प्रसंस्करण निधि  (एफ़पीएफ़) सृजित की. नाबार्ड ने 2018-19 के दौरान एक परियोजना के लिए ₹61.8 करोड़ के ऋण की मंजूरी दी. संचयी रूप से, इस निधि के तहत 31 मार्च 2019 तक 11 मेगा फूड पार्क (एमएफपी) परियोजनाओं और तीन खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के लिए ₹531.35 करोड़ के ऋण की मंजूरी दी जा चुकी है. वर्ष के दौरान, ₹57.07 करोड़ का संवितरण किया गया जिससे स्वीकृत परियोजनाओं के लिए संचयी संवितरण की राशि ₹312.85 करोड़ हो गई. 
 
मध्यवर्ती सहकारी बैंकों को प्रत्यक्ष ऋण 
 
एकल उधारकर्ताओं तथा संबद्ध पैक्स की कार्यशील पूँजी और कृषि आस्तियों के रख-रखाव से जुड़ी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मध्यवर्ती सहकारी बैंकों को सीधे ऋण वितरण हेतु अल्पावधि का एक बहुउद्देशीय ऋण उत्पाद विकसित किया गया था जिसे 2011-12 से शुरू किया गया. इस ऋण सीमा के तहत 31 मार्च 2018 तक कुल बकाया राशि ₹2,949.51 करोड़ थी जो 31 मार्च 2019 तक बढ़कर ₹4,449.50 करोड़ हो गई. 
 
विपणन महासंघों को ऋण सुविधा (सीएफएफ)
 
विपणन महासंघों/ सहकारिताओं को सुदृढ़ बनाने के लिए हमने महासंघों को ऋण सुविधा (सीएफएफ) नामक एक अलग ऋण सीमा स्थापित की है जिसके तहत कृषि उत्पादों तथा अन्य कृषि गतिविधियों का संवर्धन किया जाता है. 2018-19 के दौरान इसके तहत ₹ 29860 करोड़ राशि का संवितरण किया गया. पीएफएफ की शुरुआत से लेकर 31 मार्च 2019 तक इसके तहत संचयी संवितरण की राशि ₹ 33251 करोड़ थी. 
 
आ)   पर्यवेक्षी कार्य
 
2018-19 के दौरान नाबार्ड ने 316 निरीक्षण किए.
 
इ)   विकास कार्य
 
किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड योजना
 
किसानों को फसल ऋण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से नाबार्ड द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक के सहयोग से अगस्त 1998 में किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना शुरू की गई थी. टेक्नोलॉजी क्रांति में अग्रणी भूमिका निभाते हुए नाबार्ड ने ग्रामीण वित्तीय संस्थाओं को सहायता उपलब्ध कराई है ताकि वे अपने सभी किसान ग्राहकों को रुपे किसान कार्ड उपलब्ध करा सकें.
 
सभी किसान कार्ड खातों के लिए मिशन मोड में किसानों को रुपे किसान कार्ड उपलब्ध कराने के लिए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों तथा ग्रामीण सहकारी बैंकों को सहायता प्रदान की गई ताकि वे यूरोपे, मास्टरकार्ड और वीजा चिप (ईएमवी) आधारित रुपे किसान कार्ड जारी कर सकें. स्कूलों, कॉलेजों, दुग्ध समितियों तथा अन्य समितियों में माइक्रो एटीएम के लिए सहायता उपलब्ध कराई गई ताकि किसानों को उनके रुपे किसान कार्ड का प्रयोग करने के लिए अधिक सुविधाएँ उपलब्ध हों. 31 मार्च 2019 तक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा 1.18 करोड़ तथा सहकारी बैंकों द्वारा 2.00 करोड़ रुपे किसान कार्ड जारी किए जा चुके हैं.
 
वाटरशेड विकास
 
31 मार्च 2019 तक हमने 27 राज्यों में 457 वाटरशेड परियोजनाएँ, 123 केएफडब्ल्यू-क्लाइमेट प्रूफिंग परियोजनाएँ, 147 डब्लूडीएफ-क्लाइमेट प्रूफिंग परियोजनाएँ, 451 संधारणीय विकास योजना (एसडीपी) कार्यक्रम तथा 45 स्प्रिंगशेड आधारित वाटरशेड विकास कार्यक्रम मंजूर किए हैं जिनके तहत 20.68 लाख हेक्टेयर का क्षेत्र शामिल है.
 
आदिवासी विकास
 
2003-04 से ₹ 50 करोड़ की समूह निधि के साथ नाबार्ड का आदिवासी विकास कार्यक्रम कार्यान्वित किया जा रहा है. इसके तहत, 748 परियोजनाएँ मंजूर की गई हैं जिनमें 5.35 परिवारों को शामिल किया गया है. इन परियोजनाओं के लिए वित्तीय प्रतिबद्धता ₹ 2198 करोड़ है जिसमें से 31 मार्च 2019 तक ₹ 1563 करोड़ की राशि जारी की जा चुकी है.
 
जलवायु-अनुकूल कृषि 
 
अडाप्टेशन फंड के तहत, छह परियोजनाओं के लिए संचयी रूप से 9.85 मिलियन अमेरिकी डॉलर (₹ 5,911 करोड़) की राशि मंजूर की गई है. राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन अनुकूलन निधि के तहत भी वित्तीय वर्ष 2018-19 के अंत तक हमने संचयी रूप से ₹ 846.81 करोड़ की राशि की 30 परियोजनाएँ मंजूर की हैं. 
 
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर अम्ब्रेला कार्यक्रम
 
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर अम्ब्रेला कार्यक्रम के तहत संचयी रूप से देश के 10 प्रमुख प्राकृतिक संसाधन प्रबंध क्षेत्रों के लिए 334 परियोजनाएँ मंजूर की गई हैं जिनके लिए ₹44 करोड़ की अनुदान सहायता सहित ₹782 करोड़ की वित्तीय सहायता मंजूर की गई है. 31 मार्च 2019 तक ₹ 29 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ संचयी संवितरण की राशि ₹573 करोड़ थी. 
 
वित्तीय समावेशन
 
31 मार्च 2019 तक, वित्तीय समावेशन निधि के तहत संचयी संवितरण की राशि रुपए करोड़ थी. इसके तहत नाबार्ड के डिजिटल वित्तीय साक्षरता जागरुकता कार्यक्रम के अलावा भी बैंकों को सहायता उपलब्ध कराई जाती है ताकि वे ग्रामीण इलाकों में स्थित अपने वित्तीय साक्षरता केंद्रों और बैंक शाखाओं के माध्यम से लक्षित वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम (वित्तीय प्रणाली के नए उपयोगकर्ताओं, वयस्कों, विशिष्ट समूहों के लिए) आयोजित कर सकें, विशेष रूप से भारत सरकार द्वारा चयनित 115 आकांक्षी जिलों के लिए. 
 
सूक्ष्म वित्त क्षेत्र 
 
नाबार्ड ने 1992 में स्वयं सहायता समूह-बैंक सहबद्धता कार्यक्रम (एसएचजी-बीएलपी) शुरू किया था. 31 मार्च 2019 की स्थिति के अनुसार इसमें लगभग 100.14 लाख समूह और देश के लगभग 12.5 करोड़ निर्धन परिवार शामिल हैं. लगभग 27 लाख समूहों ने 2018-19 के दौरान विभिन्न बैंकों से ₹58,318 करोड़ की ऋण सहायता प्राप्त की जिससे प्रति समूह औसत ऋण ₹2.16 लाख हो गया है. 
 
ई-शक्ति
 
स्वयं सहायता समूहों को डिजिटाइज़ करने के लिए 15 मार्च 2015 को ई-शक्ति परियोजना शुरू की गई. 31 मार्च 2019 की स्थिति के अनुसार पूरे देश में कुल 4.34 लाख समूहों को डिजिटाइज़ किया जा चुका है जिसमें 47.91 लाख सदस्य शामिल हैं. चालू वर्ष के दौरान देश के 22 राज्यों और एक संघ राज्य क्षेत्र में ई-शक्ति के कार्यान्वयन वाले 100 जिलों में 5 लाख समूहों को डिजिटाइज़ कर दिए जाने की संभावना है जिसमें लगभग 60 लाख सदस्य शामिल होंगे. 
 
कौशल विकास 
 
पिछले तीन दशकों से अधिक समय से ग्रामीण युवाओं में उद्यमिता की संस्कृति को बढ़ावा देना और उन्हें ग्रामीण कृषीतर क्षेत्र में उद्यम शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करना हमारी रणनीति रही है. नाबार्ड द्वारा शुरू किए गए उद्यमिता विकास कार्यक्रमों में हमने अपनी साझेदार एजेंसियों के साथ मिलकर ₹135.45 की अनुदान सहायता से 33,812 कौशल एवं उद्यमिता विकास कार्यक्रम संचालित किए हैं. इन उपायों से संचयी रूप से 31 मार्च 2019 कि स्थिति में 8.71 लाख से अधिक ग्रामीण बेरोजगार युवा लाभान्वित हुए हैं.   
 
विपणन पहलें 
 
ग्रामीण कारीगरों और उत्पादकों को विपणन के अवसर उपलब्ध कराने के लिए पूरे देश में आयोजित होने वाले प्रदर्शनियों में उनकी सहभागिता में सहयोग देना नाबार्ड की परंपरा रही है. 2018-19 में हमने ₹ 5.28 करोड़ की वित्तीय सहायता से कारीगरों को 360 मेलों और प्रदर्शनियों में भाग लेने में सहयोग दिया.  
 
उद्भवन केंद्र 
 
देश में नवोन्मेषों को व्यवसाय में रूपांतरित करने और कृषि-उद्यमिता को रूपाकार देने के उद्देश्य से हमने चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार और तमिल नाडु एग्रिकल्चरल यूनिवर्सिटी, मदुरै को कृषि उद्भवन केन्द्रों की स्थापना के लिए कुल रु.23.99 करोड़ की वित्तीय प्रतिबद्धता के साथ सहायता दी है.