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उपलब्धियां

नाबार्ड के मुख्यतः तीन कार्यक्षेत्र हैं - वित्तीय, विकासात्मक और पर्यवेक्षी - जिनके माध्यम से वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लगभग हर पहलू में योगदान कर रहा है. इनके अंतर्गत उसके विभिन्न दायित्व हैं - पुनर्वित्त सहायता उपलब्ध कराना, ग्रामीण आधारभूत संरचनाओं का निर्माण करना, जिला स्तरीय ऋण योजनाएँ तैयार करना, बैंकिंग उद्योग को ऋण वितरण के लक्ष्य प्राप्त करने में मदद करना, सहकारी बैंकों तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का पर्यवेक्षण करना और श्रेष्ठ बैंकिंग पद्धतियाँ विकसित करने में उनकी मदद करना तथा उन्हें सीबीएस प्रणाली में शामिल होने में सहायता देना, ग्रामीण विकास के लिए नई योजनाएँ तैयार करना, भारत सरकार की विकास योजनाएँ कार्यान्वित करना, हस्तशिल्प कारीगरों को प्रशिक्षण प्रदान करना और उन्हें अपने उत्पादों की बिक्री के अवसर/ मंच उपलब्ध कराना.
 
अ)   वित्तीय कार्य
 
पुनर्वित्त – अल्पावधि ऋण
 
वित्तीय संस्थानों द्वारा फसल उत्पादन के लिए किसानों को फसल ऋण दिया जाता है, जिससे देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलती है. वर्ष 2019-20 के दौरान, नाबार्ड ने सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को मौसमी कृषि परिचालनों के लिए ₹92411 करोड़ और मौसमी कृषि परिचलनों से इतर ₹7971 करोड़ की राशि संवितरित की.
 
दीर्घावधि ऋण
 
नाबार्ड की दीर्घावधि पुनर्वित्त व्यवस्था के तहत वित्तीय संस्थानों को कृषि और कृषीतर क्षेत्रों की विभिन्न गतिविधियों के लिए ऋण उपलब्ध कराया जाता है जिसकी अवधि 18 माह से पाँच से अधिक वर्ष तक होती है. वर्ष 2019-20 के दौरान, नाबार्ड ने वित्तीय संस्थानों को ₹78180 करोड़ की राशि संवितरित की.
 
ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास निधि (आरआईडीएफ़)
 
भारतीय रिज़र्व बैंक ने ग्रामीण आधारभूत संरचना निर्माण की परियोजनाओं में सहायता के लिए वर्ष 1995- 96 में नाबार्ड में ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास निधि की स्थापना की थी जिसका स्रोत था अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को ऋण वितरण हेतु निर्धारित लक्ष्य में कमी की राशि. इसके तहत नाबार्ड ने 2019-20 के दौरान ₹26,266 करोड़ की राशि संवितरित की. आज देश में ग्रामीण आधारभूत संरचना हेतु वित्तपोषण में आरआईडीएफ बहुत बड़ा योगदान है.
 
दीर्घावधि सिंचाई निधि
 
दीर्घावधि सिंचाई निधि (एलटीआईएफ़) की घोषणा 2016-17 के केंद्रीय बजट में की गई थी. इसका प्रयोजन था दिसंबर 2019 तक 18 राज्यों की 99 चयनित मध्यम और बड़ी सिंचाई परियोजनाओं को एक अभियान चलाकर तेजी से पूरा करना. इसके बाद भारत सरकार ने 31 मार्च 2021 तक अथवा जब तब योजना को जारी रखने हेतु अनुमोदन प्रदान किया गया है इसमें से जो भी पहले हो तक एलटीआईएफ़ के अंतर्गत निधि व्यवस्था को अनुमोदन प्रदान किया है.  इन परियोजनाओं के समन्वय और इन्हें पूरा करने में सहायता उपलब्ध कराने के लिए नोडल मंत्रालय है जल संसाधन, नदी विकास तथा गंगा पुनरुज्जीवन मंत्रालय. इसके बाद भारत सरकार ने एलटीआईएफ के तहत चार अन्य परियोजनाओं के वित्तपोषण का अनुमोदन किया है, नामत: - आंध्र प्रदेश में पोलावरम परियोजना, बिहार और झारखंड में उत्तर कोयल परियोजना, पंजाब की सरहिंद और राजस्थान फीडर रीलाइनिंग परियोजना, पंजाब में शाहपुर कंडी बांध परियोजना. 31 मार्च 2020 की स्थिति में एलटीआईएफ़ के तहत संचयी मंजूरियों की राशि ₹81865 करोड़ तथा संचयी संवितरणों की राशि ₹44719 करोड़ थी.
 
प्रधानमंत्री आवास योजना - ग्रामीण (पीएमएवाई- जी)
 
2019-20 के दौरान नाबार्ड ने राष्ट्रीय ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास एजेंसी (एनआरआईडीए) को ₹20,000 करोड़ की राशि मंजूर की तथा ₹10,811 करोड़ की राशि संवितरित की. 31 मार्च 2020 की स्थिति में एनआरआईडीए को मंजूर संचयी राशि ₹41,975 करोड़ थी जिसमें से ₹28,819 करोड़ की राशि संवितरित की जा चुकी है. यह वित्तीय सहायता पीएमएवाई-जी के तहत प्रदान की गई है जिसका उद्देश्य है वर्ष 2022 तक कच्चे और जीर्ण-शीर्ण मकानों में रहने वाले लोगों सहित सभी बेघर परिवारों को बुनियादी सुविधाओं से युक्त पक्के मकान उपलब्ध करवाना.
 
स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (एसबीएम-जी)
 
नाबार्ड ने 2019-20 के दौरान राष्ट्रीय पेयजल, स्वच्छता और गुणवत्ता केंद्र (एनसीडीडबल्यूएस और क्यू) को ₹3,600  करोड़ की राशि संवितरित की. 31 मार्च 2020 तक एनसीडीडबल्यूएस और क्यू  को ₹15,000  करोड़ की संचयी राशि मंजूर की गई थी जिसमें से ₹12,298 करोड़ की राशि संवितरित की गई. एसबीएम-जी के माध्यम से वित्तीय सहायता प्रदान की गई जिसका उद्देश्य 2 अक्तूबर 2019 तक ग्रामीण इलाकों में सर्वव्यापी स्वच्छता का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके. 
 
सूक्ष्म सिंचाई निधि (एमआईएफ़)
 
2019-20 से नाबार्ड में ₹5000 करोड़ के कॉर्पस के साथ सूक्ष्म सिंचाई निधि परिचालित की गई. इस निधि का उद्देश्य राज्य सरकारों को सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत अधिकाधिक परियोजनाओं को शामिल करने के लिए अतिरिक्त संसाधनों के संग्रहण में सहायता करना और पीएमकेएसवाई-पीडीएमसी के प्रावधानों के दायरे से बाहर किए गए काम को प्रोत्साहित करना है. इस कार्य के लिए कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय (एमओए और एफ़डबल्यू), भारत सरकार नोडल मंत्रालय है. नाबार्ड ने 2019-20 के दौरान इस निधि के अंतर्गत चार राज्यों (आंध्र प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु और हरियाणा) को ₹2842 करोड़ की राशि मंजूर की है.  
 
नाबार्ड आधारभूत संरचना विकास सहायता (नीडा)
 
नाबार्ड आधारभूत संरचना सहायता (इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट असिस्टेंस - नीडा) के तहत ग्रामीण आधारभूत संरचना के वित्तपोषण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की सुप्रबंधित संस्थाओं को लचीला दीर्घकालिक ऋण प्रदान किया जाता है. कृषि आधारभूत संरचना, ग्रामीण संपर्क, नवीकरणीय ऊर्जा, विद्युत संचार, पेयजल और स्वच्छता, और अन्य सामाजिक और वाणिज्यिक आधारभूत संरचना परियोजनाओं को नीडा के तहत वित्तपोषित किया जाता है. कॉरपोरेट्स / कंपनियों, सहकारी संस्थाओं जैसी पंजीकृत संस्थाओं द्वारा कार्यान्वित की जाने वाली सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) परियोजनाओं और गैर-पीपीपी परियोजनाओं को शामिल करने से नीडा के तहत वित्तपोषण का दायरा और व्यापक हो गया है. नीडा के तहत वित्तपोषण में राज्य सरकारों के पास ऑफ-बजट और ऑन-बजट ऋण लेने की गुंजाइश रहती है जिससे राज्य सरकारों की बजट संबंधी बाधाएँ कम होती हैं.
 
वर्ष 2019-20 के दौरान नीडा के तहत 11 ऋण प्रस्तावों के माध्यम से ₹4382 करोड़ के सावधि ऋण को मंजूरी दी गई जिसका 78% हिस्सा (₹3431 करोड़) सिंचाई परियोजनाओं के लिए तथा शेष हिस्सा विद्युत संचार (₹910 करोड़) तथा वाटरशेड परियोजनाओं (₹41 करोड़) के लिए था. 
 
संचयी रूप से, 92 परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है जिनके तहत सावधि ऋण की राशि ₹34,957 करोड़ है. नीडा के तहत विभिन्न क्षेत्रों की परियोजनाएँ मंजूर की गई हैं जो ग्रामीण आधारभूत संरचना के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी हैं. (31.03.2020 की स्थिति में) 
 
नीडा परियोजनाओं का प्रभाव
 
नीडा के तहत विभिन्न परियोजनाओं के प्रभाव निम्नानुसार हैं: 
 

क्षेत्र

प्रभाव

सिंचाई

5,93,000 हेक्टे.

सूक्ष्म सिंचाई

1,39,000 हेक्टे.

नवीकरणीय ऊर्जा

113 मेगावाट

विद्युत संचार

15 राज्यों में 49 परियोजनाएँ

ग्रामीण संपर्क

5,942 किमी लंबी सड़कें तथा 4.69 किमी लंबे पुल

पेयजल की आपूर्ति

24,534 बस्तियाँ

  • अल्पावधि बहु-उद्देशीय ऋण हेतु जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों को प्रत्यक्ष पुनर्वित्त सहायता (डीआरए) 
जहां नाबार्ड विभिन्न प्रयोजनों के लिए जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों द्वारा ऋण वितरण के लिए राज्य सहकारी बैंकों को पुनर्वित्त सहायता प्रदान करता रहा है, वहीं 'जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों को प्रत्यक्ष पुनर्वित्त सहायता' की संकल्पना एक अतिरिक्त ऋण सीमा के रूप में की गई थी ताकि वे ऋण वितरण में विविधीकरण कर सकें और लाभ अर्जक पोर्टफोलियो के माध्यम से अपनी आय बढ़ा सकें जिससे उन्हें प्रभावी चल-निधि प्रबंधन में सुविधा हो. यह ऋण सीमा बैंक द्वारा गिरवी रखी गई भार मुक्त सावधि जमा रसीदों या मीयादी मुद्रा उधारियों के समक्ष, या इन दोनों के माध्यमों (मिले-जुले रूप में) से, उपलब्ध कराई जाती है. यह ऋण सीमा सुशासित और वित्तीय रूप से सुदृढ़ जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों को मंजूर की जाती है जिन्हें नाबार्ड के हाल के निरीक्षण में 'ए' या 'बी' श्रेणी प्राप्त हो. ऋण के पात्र प्रयोजनों में कार्यशील पूंजी, कृषि उपकरणों तथा अन्य उत्पादक आस्तियों की मरम्मत, उत्पाद का भंडारण/ ग्रेडिंग/ पैकेजिंग, विपणन गतिविधियां, कृषीतर गतिविधियां आदि शामिल हैं. यह सीमा नकद ऋण की प्रकृति की होती है जो मंजूरी की तिथि से 1 वर्ष की अवधि के लिए परिचालन में रहती है. यह सीमा बैंकों की विशिष्ट अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए 3 माह की अवधि के लिए भी उपलब्ध रहती है. 
 
वर्ष 2019-20 के दौरान, डीआरए के तहत सहकारी बैंकों को ₹8932 करोड़ की राशि मंजूर की गई और ₹9200 करोड़ की राशि का संवितरण किया गया. वर्ष के दौरान, 71 बैंकों ने इस सुविधा का लाभ उठाया, जिनमें से 23 नई इकाइयाँ थीं. पिछले छह वर्ष के दौरान संवितरण की चक्रीय वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) 13.46% थी.
 
विपणन महासंघों को ऋण सुविधा (सीएफएफ)
 
महासंघों को ऋण सुविधा के तहत कृषि जिंसों के विपणन, निविष्टियों की आपूर्ति तथा मूल्य और आपूर्ति श्रृंखला के प्रबंधन हेतु केंद्र या राज्य सरकार की इकाइयों, जैसे - विपणन महासंघ या निगम, डेरी सहकारिताओं या महासंघों, कृषि विपणन सहकारिताओं या महासंघों तथा पंजीकृत कंपनियों को अल्पावधि ऋण सहायता प्रदान की जाती है. इस सुविधा के तहत विपणन महासंघों तथा नागरिक आपूर्ति निगमों को खाद्यान्न, दलहन और तिलहन के साथ-साथ अन्य कृषि जिंसों की अधिप्राप्ति के लिए; (उर्वरक) महासंघों को उर्वरकों के विपणन के लिए तथा दूध संघों/ महासंघों को दूध की अधिप्राप्ति और प्रसंस्करण के लिए ऋण सहायता उपलब्ध कराई जाती है. यह सुविधा 12 माह के लिए अल्पावधि ऋण के रूप में या एजेंसियों की विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु 3 माह के लिए उपलब्ध कराई जाती है. 
 
वर्ष के दौरान 8 सरकारी निगमों/ महासंघों, दो दूध सहकारिताओं तथा एक विपणन सहकारिता को धान, गेहूं, दलहन, तिलहन और दूध की अधिप्राप्ति के लिए सीएफ़एफ़ के तहत ₹25,071 करोड़ की राशि मंजूर की गई. ₹37,207 करोड़ के संवितरण के साथ 11 इकाइयों ने सुविधा का लाभ उठाया. इस प्रकार, पिछले वर्ष की तुलना में संवितरण में 25.35% की वृद्धि हुई. पिछले छह वर्ष के दौरान मंजूरी और संवितरण की चक्रीय वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) क्रमश: 31.96% और 48.48% थी.
 
डेरी प्रसंस्करण और आधारभूत संरचना निधि (डीआईडीएफ़)
 
केंद्रीय बजट 2017-18 में की गई घोषणा के अनुरूप, भारत सरकार ने नाबार्ड में एक डेयरी प्रसंस्करण और आधारभूत संरचना विकास निधि (डीआईडीएफ़) का सृजन किया, जिसकी समूह निधि ₹8,004 करोड़ है. इस राशि का उपयोग पांच वर्ष में किया जाएगा. योजना के उद्देश्य हैं दूध प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन के लिए आधुनिकीकरण करना, आधारभूत संरचना में वृद्धि करना तथा मूल्य वर्धन करना ताकि प्राथमिक उत्पादकों को इष्टतम मूल्य की प्राप्ति सुनिश्चित की जा सके.
 
डीआईडीएफ़ के तहत राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी)/ राष्ट्रीय सहकारिता विकास निगम (एनसीडीसी) पात्र उधारकर्ताओं, जैसे - सहकारी दुग्ध संघों, राज्य सहकारी डेयरी महासंघों, बहु-राज्य दुग्ध सहकारी समितियों, दूध उत्पादक कंपनियों और एनडीडीबी की सहायक कंपनियों को ऋण वितरण के लिए नाबार्ड से ऋण ले सकते हैं. वर्ष 2019-20 के दौरान 11 दूध संघों के प्रस्तावों के लिए ₹565 करोड़ की ऋण सहायता स्वीकृत की गई थी. 
 
संचयी रूप से, एनडीडीबी को 31 मार्च 2020 तक डेयरी प्रसंस्करण क्षेत्र में निवेश के लिए दस राज्यों में 33 परियोजनाओं के लिए ₹4059 करोड़ मंजूरी दी गई है. इन परियोजनाओं के लिए ऋण राशि ₹2,722 करोड़ है. वर्ष के दौरान एनडीडीबी को ₹670 करोड़ की राशि संवितरित की गई. अनुमान है कि इन मंजूर परियोजनाओं से कार्यान्वयनकर्ता राज्यों में प्रति दिन 119.70 लाख लीटर (एलएलपीडी) की दूध प्रसंस्करण क्षमता सृजित होगी, 8.35 एलएलपीडी के मौजूदा संयंत्रों का आधुनिकीकरण किया जा सकेगा, 2447.52 एमटीपीडी / टीएलपीडी की मूल्य वर्धन क्षमता सृजित होगी और प्रति दिन 135 मीट्रिक टन दूध शुष्कन क्षमता (एमटीपीडी) सृजित होगी.
 
मत्स्यपालन तथा जलचरपालन आधारभूत संरचना विकास निधि आधारभूत संरचना विकास निधि (एफ़आईडीएफ़)
 
केंद्रीय बजट 2017-18 में की गई घोषणा के अनुरूप, भारत सरकार ने नाबार्ड में एक मत्स्यपालन तथा जलचरपालन आधारभूत संरचना विकास निधि आधारभूत संरचना विकास निधि (एफ़आईडीएफ़) का सृजन किया है जिसकी समूह निधि ₹7,522.48 करोड़ है. इस राशि का उपयोग पांच वर्ष (2018-19 से 2022-23) में किया जाएगा. पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग, भारत सरकार द्वारा फरवरी 2019 में एफ़आईडीएफ़ के दिशा निर्देश जारी किए गए थे. नाबार्ड इस निधि के लिए नोडल ऋण इकाई है और वह राज्य सरकारों के माध्यम से विभिन्न निवेश गतिविधियों हेतु सार्वजनिक आधारभूत संरचना घटकों के लिए ₹2600 करोड़ की राशि का निधिपोषण करेगा. ये गतिविधियां हैं - 18 फिशिंग हार्बर, 15 आधुनिक राज्य मत्स्य बीज फार्म, 716 मछली बाजार, 72 रोग डायग्नोस्टिक लैब और 5 जलीय संगरोध केंद्र.
 
वर्ष 2019-20 के दौरान फिशिंग हार्बर के लिए तमिलनाडु सरकार के तीन प्रस्ताव मंजूर किए गए जिनका कुल वित्तीय परिव्यय ₹420 करोड़ है और ऋण घटक ₹348 करोड़ है. इनके फलस्वरूप 12115 समुद्री मछुआरों तथा तट आधारित प्रतिष्ठानों के साथ-साथ संवितरण और विपणन गतिविधियों में संलग्न 6000 लोगों के लिए अतिरिक्त रोजगार का सृजन किया जा सकेगा.
 
भंडारागार आधारभूत संरचना निधि
 
भारत सरकार ने देश में कृषि वस्तुओं के लिए वैज्ञानिक भंडारागार की आधारभूत संरचना आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऋण सहायता उपलब्ध कराने के प्रयोजन से वर्ष 2013- 14 में ₹5,000 करोड़ की समूह निधि के साथ भंडारागार आधारभूत संरचना निधि का सृजन किया. 31 मार्च 2020 की स्थिति में इसके तहत संचयी संवितरणों की राशि ₹6,712 करोड़ थी. 
 
खाद्य प्रसंस्करण निधि 
 
क्लस्टर आधार पर संगठित क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारत सरकार ने ₹2,000 करोड़ की समूह निधि के साथ 2014-15 में नाबार्ड में खाद्य प्रसंस्करण निधि  (एफ़पीएफ़) सृजित की. नाबार्ड ने 2019-20 के दौरान 2 मेगा फूड पार्क, 4 कृषि प्रसंस्करण क्लस्टरों और तीन एकल खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के लिए ₹149 करोड़ के ऋण की मंजूरी दी. संचयी रूप से, इस निधि के तहत 31 मार्च 2020 तक 12 मेगा फूड पार्क (एमएफपी), 4 कृषि प्रसंस्करण क्लस्टरों और छह खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के लिए ₹604 करोड़ के ऋण की मंजूरी दी जा चुकी है. वर्ष के दौरान, ₹43 करोड़ का संवितरण किया गया जिससे स्वीकृत परियोजनाओं के लिए संचयी संवितरण की राशि ₹356 करोड़ हो गई. 
 
आ)   पर्यवेक्षी कार्य
 
वित्त वर्ष 2019-20 के लिए 31 मार्च, 2019 की स्थिति में बैंकों/ अन्य संस्थानों की वित्तीय स्थिति के संदर्भ में 332 सांविधिक निरीक्षण और 10 स्वैच्छिक निरीक्षण निर्धारित किए गए थे जिनका विवरण निम्नानुसार हैं: - 
 

 

विवरण

   सांविधिक निरीक्षण

स्वैच्छिक निरीक्षण

कुल

राज्य सहकारी (रास) बैंक

जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक

क्षेत्रीय ग्रामीण (क्षेग्रा) बैंक

राज्य सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास (रासकृग्रावि) बैंक

निर्धारित निरीक्षण की संख्या

34

253@

45

10

342

संचालित निरीक्षण की संख्या

32

253

45

08

338#

@ इसमें तमिलनाडु औद्योगिक सहकारी बैंक शामिल है 
# नागालैंड रास बैंक, उत्तर प्रदेश रासकृग्रावि बैंक, त्रिपुरा रासकृग्रावि बैंक तथा दमन और दीव रासकृग्रावि बैंक का निरीक्षण नहीं किया जा सका
 
इ)   विकास कार्य
 
वाटरशेड विकास
 
31 मार्च 2020 तक 3295 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई जिनके तहत 23.05 लाख हेक्टेयर का क्षेत्र कवर किया गया. 1701 वाटरशेड परियोजनाएँ सफलतापूर्वक पूरी कर ली गई हैं. इन सभी कार्यक्रमों के लिए ₹2,148 करोड़ की प्रतिबद्धता थी जिसमें से ₹1805 करोड़ का संवितण किया जा चुका है.
 
आदिवासी विकास
 
नाबार्ड द्वारा 2003-04 में अपने लाभ में से ₹50 करोड़ की समूह निधि के साथ का आदिवासी विकास कार्यक्रम कार्यान्वित किया जा रहा है. 31 मार्च 2020 तक इसके तहत 791 परियोजनाएँ मंजूर की गई हैं जिनमें 4.54 लाख हेक्टेयर क्षेत्र मैं फैले 5.53 लाख परिवारों को शामिल किया गया है. इन परियोजनाओं के संचयी मंजूरियोन और संवितरण की राशि क्रमश: ₹2302 करोड़ और ₹1805 करोड़ है.
 
जलवायु-अनुकूल कृषि परियोजनाएँ  
 
अडाप्टेशन फंड के तहत, छह परियोजनाओं के लिए संचयी रूप से 9.85 मिलियन अमेरिकी डॉलर (₹5,911 करोड़) की राशि मंजूर की गई है. राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन अनुकूलन निधि के तहत भी वित्तीय वर्ष 2018-19 के अंत तक हमने संचयी रूप से ₹846.81 करोड़ की राशि की 30 परियोजनाएँ मंजूर की हैं. 
 
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर अम्ब्रेला कार्यक्रम
 
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर अम्ब्रेला कार्यक्रम के तहत संचयी रूप से देश के 10 प्रमुख प्राकृतिक संसाधन प्रबंध क्षेत्रों के लिए 334 परियोजनाएँ मंजूर की गई हैं जिनके लिए ₹44 करोड़ की अनुदान सहायता सहित ₹782 करोड़ की वित्तीय सहायता मंजूर की गई है. 31 मार्च 2020 तक ₹31 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ संचयी संवितरण की राशि ₹576 करोड़ थी. 
 
वित्तीय समावेशन
 
बैंकिंग सेवाओं के लिए मांग उत्पन्न करने तथा आधार पर पर भुगतान/ स्वीकरण की आधारभूत संरचनाओं की स्थापना के फलस्वरूप 31 मार्च 2020 तक वित्तीय समावेशन निधि के तहत कार्यान्वित विभिन्न योजनाओं के लिए संचयी मंजूरियों की राशि ₹4,252 करोड़ तथा संवितरण की राशि ₹2,276 करोड़ थी. वित्तीय समावेशन के अंतर्गत मांग और पूर्ति में अंतर को पूरा करने के उद्देश्य से क्षेत्रीय भिन्नताओं को दूर करने तथा पूरे देश में समुचित और समावेशी वित्तीय समावेशन हासिल करने के लिए एक विभेदीकृत रणनीति अपनाई गई. इसके तहत 314 विशेष फोकस वाले जिलों में 90% की दर से अनुदान सहायता उपलब्ध कराई गई. इन विशेष फोकस जिलों में आकांक्षी जिले, वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिले तथा पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में स्थित जिले शामिल हैं.
 
सूक्ष्म वित्त क्षेत्र 
 
नाबार्ड ने 1992 में स्वयं सहायता समूह-बैंक सहबद्धता कार्यक्रम (एसएचजी-बीएलपी) शुरू किया था. 31 मार्च 2020 की स्थिति के अनुसार इसमें लगभग 102.43 लाख समूह और देश के लगभग 12.4 करोड़ निर्धन परिवार शामिल हैं. लगभग 31.50 लाख समूहों ने 2019-20 के दौरान विभिन्न बैंकों से ₹77,659 करोड़ की ऋण सहायता प्राप्त की जिससे प्रति समूह औसत ऋण ₹2.47 लाख हो गया है. 2018-19 के दौरान बैंकों द्वारा 41.80 लाख संयुक्त देयता समूहों का संवर्धन और वित्तपोषण किया गया.
 
ई-शक्ति 
 
ई-शक्ति परियोजना स्वयं सहायता समूहों को डिजिटाइज़ करने के उद्देश्य से 15 मार्च 2015 को दो जिलों में प्रायोगिक रूप से शुरू की गई. वर्तमान में देश भर के 254 जिलों में परियोजना का कार्यान्वयन किया जा रहा है. 31 मार्च 2020 की स्थिति के अनुसार पूरे देश में कुल 6.54 लाख समूहों को डिजिटाइज़ किया जा चुका है जिसमें 98,000 गाँवों के 72 लाख सदस्य शामिल हैं. 19,604 बैंक शाखाएं ऋण के संबंध में सूचनाओं के आधार पर उचित निर्णय लेने के लिए ई-शक्ति पोर्टल का उपयोग कर रही हैं. 31 मार्च 2020 तक ई-शक्ति के तहत बैंकों के साथ ऋण सहबद्धता 2.17 लाख (33%) से बढ़कर 3.21 लाख (50%) हो गई है, जिससे परियोजना की सफलता सिद्ध होती है. जनवरी 2020 से मार्च 2020 तक ई-शक्ति के तहत बैंकों के साथ समन्वय में सुधार लाने और ऋण सहबद्धता को बढ़ाने के उद्देश्य से एक विशेष अभियान शुरू किया गया था जिसके परिणामस्वरूप, ₹249 करोड़ की राशि के ऋण मंजूर किए गए. इस 03 माह की अवधि में इसमें से 13,126 समूहों को का ऋण संवितरित किया गया. 
 
कौशल विकास 
 
भारत सरकार के लक्ष्य के अनुरूप, नाबार्ड ने मांग और परिणाम आधारित कार्यक्रमों के जरिए विभिन्न स्टेकहोल्डर के माध्यम से ग्रामीण भारत में कौशल की कमी को पूरा करने के लिए एक संरचित दृष्टिकोण विकसित किया है ताकि इन क्षेत्रों में रोजगार/ स्वरोजगार के अवसर सृजित किए जा सकें.
 
नाबार्ड ने अब तक ₹154 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 34,878 कार्यक्रमों के जरिए 2.0 4 लाख ग्रामीण युवाओं के प्रशिक्षण हेतु सहायता उपलब्ध कराई है जिससे उन्हें रोजगार/ स्वरोजगार उपलब्ध कराया जा सके. वर्ष 2019 के दौरान नाबार्ड ने ₹19 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 1066 कौशल विकास कार्यक्रमों के जरिए 33,216 लाख ग्रामीण युवाओं का कौशल विकास किया.
 
वर्ष 2019 के दौरान राज्य/ क्षेत्र विशिष्ट कौशल विकास कार्यक्रम संचालित करने के लिए नए चैनल भागीदारों को अनुदान सहायता दी गई जिससे सूक्ष्म उद्यम की स्थापना की जा सकेगी और रोजगार का सृजन होगा. कौशल विकास कार्यक्रम के अंतर्गत लिंग भेद के प्रति संवेदनशीलता बरती गई है और इस कार्यक्रम के तहत सहायता प्राप्त उम्मीदवारों में 60% संख्या महिलाओं की है.
 
    कृषीतर उत्पादक संगठन (ओएफ़पीओ)
 
दस्तकार/ बुनकर/ कृषीतर गतिविधि क्लस्टरों को अद्यतन करने और उन्हें एक औपचारिक रजिस्टर्ड इकाई का रूप देने के साथ-साथ क्षमता निर्माण, व्यवसाय आयोजना, बाजार लिंकेज, डिजाइन विकास आदि के जरिए उत्पादकों को सामूहिक व्यवसाय शुरू करने में सहायता प्रदान करने के उद्देश्य के साथ वर्ष 2016-17 में कृषीतर उत्पादक संगठन (ओएफ़पीओ) के गठन और संवर्धन की योजना शुरू की गई थी. इस योजना के तहत, पात्र इकाई को उत्पादक संगठन संवर्धन संस्था के रूप में कार्य करने के लिए सहायता प्रदान की जाती है जिससे कृषीतर क्षेत्र के उत्पादक सामूहिक रूप से व्यवसायिक गतिविधियां शुरू कर सकें ताकि उन्हें संख्या बल का लाभ मिले, उनकी मोल-भाव की शक्ति बढ़े तथा उन्हें व्यवसाय के लिए सुविधाएं और अवसर प्राप्त हों.
31 मार्च 2020 की स्थिति के अनुसार 19 राज्यों में 33 ओएफ़पीओ को ₹13 करोड़ की अनुदान सहायता उपलब्ध कराई गई जिससे 11,678 लाभार्थी लाभान्वित हुए. इनमें से 18 ओएफपीओ कंपनी/ सोसाइटी अधिनियम के तहत पंजीकृत हैं तथा समूहन, विपणन और निविष्टियों के संवितरण के माध्यम से व्यावसायिक गतिविधियों में संलग्न हैं. 8 ओएफपीओ महिलाओं के संगठन है और आशा है कि इनसे सीधे तौर पर 3325 महिला दस्तकारों/ बुनकरों का सशक्तीकरण किया जा सकेगा.
 
विपणन पहलें 
 
कृषि और कृषीतर क्षेत्र के ग्रामीण उत्पादकों को अपने उत्पादों के प्रभावी विपणन हेतु सहायता उपलब्ध कराने के लिए नाबार्ड राष्ट्रीय/ क्षेत्रीय स्तर पर ग्रामीण हाट/ मंडियों की स्थापना तथा दस्तकारों द्वारा प्रदर्शनियों और मेलों में भागीदारी के लिए सहयोग देता रहा है. 
 
ग्रामीण हाट
 
ग्रामीण हाटों का ग्रामीण समुदायों के जीवन में अहम स्थान रहा है और उन्हें अपने कृषि और कृषीतर उत्पाद  खरीदने और बेचने के लिए सुलभ बाजार प्रदान करते हैं. ग्रामीण हाट उत्पादक संगठनों, ग्राम वाटरशेड और आदिवासी विकास समितियों के लिए एक प्रभावी विपणन कड़ी के रूप में उभरे हैं. ग्रामीण हाटों को नाबार्ड सहायता आधारभूत संरचनाओं, जैसे - प्लेटफार्म, छत, पेयजल सुविधा, स्वच्छता संरचना आदि के निर्माण के लिए दी जाती है. वर्ष 2019-20 के दौरान, कुल 62 ग्रामीण हाटों को ₹6 करोड़ की अनुदान सहायता मंजूर की गई. 31 मार्च 2020 तक, 578 ग्रामीण हाटों को ₹35 करोड़ की अनुदान सहायता दी गई है.
 
ग्रामीण मंडी  
 
ग्रामीण मार्ट उत्पादक संगठनों के बीच उद्यमशीलता को बढ़ावा देने और ग्रामीण समुदाय, विशेषकर महिलाओं और कमजोर वर्गों, द्वारा निर्मित घरेलू उत्पादों के लिए बाजार लिंक प्रदान करने में मदद करते हैं. इससे जमीनी स्तर पर आय और रोजगार सृजन में मदद मिलती है. वर्ष 2019-20 के दौरान, 92 ग्रामीण मार्ट को ₹3 करोड़ की अनुदान सहायता मंजूर की गई. 31 मार्च 2020 तक, 930 ग्रामीण मार्ट को ₹16 करोड़ की अनुदान सहायता दी जा चुकी है.
 
प्रदर्शनी/ मेले
 
प्रदर्शनियां और मेले कारीगरों को एक सीधा विपणन मंच प्रदान करते हैं जिसके साथ उन्हें बाजार की सूचनाओं और ग्राहकों की पसंद जी जानकारी मिलती है और थोक खरीद के आदेश प्राप्त होते हैं. इन मेलों में भाग लेने से कारीगरों का सशक्तीकरण होता है जिससे वे व्यवसाय में आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकते हैं.
 
वर्ष 2019-20 के दौरान, ग्रामीण भारत के 1765 उत्पादकों / कारीगरों के समूहों को प्रदर्शनियों के माध्यम से प्रमुख शहरी केंद्रों में अपने उत्पादों को प्रदर्शित करने और बेचने के लिए सहायता दी गई, जिससे ₹10 करोड़ की प्रत्यक्ष और थोक बिक्री हुई. ये प्रदर्शनियाँ नाबार्ड से सहायता प्राप्त अधिकांश ओएफ़पीओ के लिए एक प्रभावी बाज़ार साबित हुई हैं जिनके जरिये वे थोक खरीदारों तक पहुँच सके और अपने उत्पादों को बेहतर बनाने के लिए जानकारी प्राप्त कर सके.
 
प्रदर्शनियों के दौरान उत्पादकों के सशक्तीकरण के लिए विभिन्न पहलें की जाती हैं, जैसे क्रेता-विक्रेता बैठक का आयोजन, ब्रांडिंग, विपणन, पैकेजिंग, प्रभावी संचार और उद्यमिता विकास पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों और कार्यशालाओं का आयोजन, प्रभावी संचार और उद्यमिता विकास, वित्तीय समावेशन और डिजिटल भुगतान प्रणालियों का संवर्धन. 
 
कृषि व्यवसाय उद्भवन केंद्र (एबीआईसी)   
 
कृषि उद्यमियों के लिए एक सहायक वातावरण विकसित करने के लिए नाबार्ड ने 2017-18 में कृषि व्यवसाय उद्भवन केंद्र की स्थापना हेतु सहायता देना शुरू किया था. इस नीति में एबीआईसी की स्थापना करने और और पांच वर्ष की अवधि हेतु उनके पात्र परिचालन व्यय को पूरा करने के लिए कृषि विश्वविद्यालय/ इसी तरह के अन्य संस्थान (मेजबान संस्थान) जैसे पात्र संस्थानों को सहायता प्रदान करने की परिकल्पना की गई है. यह अधिक कृषि स्टार्टअप, कृषि / ग्रामीण उद्यमियों और उद्यमों को बढ़ावा देने की दिशा में एक कदम है. स्वतंत्र कृषि व्यवसाय उद्भवन केंद्र स्थापित करने के लिए अब तक जिन संस्थानों को सहायता दी गई है उनका विवरण नीचे दिया जा रहा है:
 

क्रम सं.

मेजबान संस्थान का नाम

1

तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, मदुरै, तमिलनाडु.

2

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा.

3

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर, पश्चिम बंगाल

4

ए-आईडीईए, राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी, हैदराबाद, तेलंगाना.

5

राजमाता विजयराजे सिंधिया कृषि विश्व विद्यालय, ग्वालियर, मध्य प्रदेश

 
सहायता प्राप्त एबीआईसी सिंचाई, बीज उत्पादन, जैव-कीटनाशक, जैव उर्वरक, प्रिसीज़न फ़ार्मिंग, कृषि-प्रसंस्करण, विपणन, जैव ईंधन, पेयजल, स्वच्छता, ऊर्जा, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि के क्षेत्र में कार्य करने वाले स्टार्ट-अप्स/ उद्यम और उद्यमियों/ किसानों/ किसान उत्पादक संगठनों आदि का संवर्धन करेंगे. ये एबीआईसी कृषि-स्टार्टअप और कृषि-उद्यमियों को व्यवहार्य वाणिज्यिक संस्थाओं में विकसित करने के लिए उन्हें व्यवसायिक सेवाएँ और संसाधन, विपणन और वित्त प्रदान करेंगे जिसके परिणामस्वरूप किसानों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ होंगे.
 
उत्प्रेरक पूंजी निधि की स्थापना
 
भारत में, कृषि आधारित अधिकांश स्टार्ट-अप को निधीयन स्रोतों के मामले में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. नवोन्मेषी उद्यम के साथ-साथ शुरुआती चरण की तकनीक/ अभिनव उत्पाद/ प्रक्रिया नवोन्मेष/ आपूर्ति श्रृंखला नवोन्मेष/ व्यवसाय मॉडल नवोन्मेष रखने वाले इन स्टार्ट-अप्स को सही समय पर वित्तीय सहायता पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. कृषि स्टार्ट-अप की सहायता करने के लिए नाबार्ड ने "ग्रामीण और कृषि स्टार्ट-अप की सहायता हेतु उत्प्रेरक पूँजी निधि" का सृजन किया है. इस योजना का उद्देश्य है स्टार्टअप्स की शुरुआत के उस चरण में उनकी सहायता करना जब उनका प्रचालन तो शुरू हो चुका हो, किन्तु कोई आय न हो रही हो. इससे स्टार्टअप इकाइयों को व्यवहार्य बनाने में मदद मिलेगी.
 
जीआई उत्पादों का संवर्धन
 
भौगोलिक संकेतक (जीआई) एक बौद्धिक संपदा अधिकार है जो एक विशिष्ट भौगोलिक स्थान से उत्पन्न होने वाले उत्पाद की पहचान करता है. यह उत्पाद विशिष्ट प्रकृति, गुणवत्ता और विशेषताओं से युक्त होता है जो उस स्थान से जुड़ी होती हैं. जीआई अधिकार अपने धारक को किसी तीसरे पक्ष द्वारा इसके उपयोग को रोकने की अनुमति देता है जिसका उत्पाद लागू मानकों के अनुरूप न हो. 
 
नाबार्ड ने 51 उत्पादों के जीआई पंजीकरण के लिए सहायता दी है, जिनमें से 11 आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में पंजीकृत किए गए हैं. नाबार्ड ने मट्टूगुल्ला बैंगन (जीआई उत्पाद) के विपणन के लिए एक एफपीओ का गठन करवाया है जिसके परिणामस्वरूप शहरी बाजारों में प्रत्यक्ष बिक्री के साथ-साथ इसकी कुल बिक्री भी बढ़ी है. नाबार्ड ने 10 जीआई उत्पादों के लिए तीन अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में विशिष्ट उत्पाद सूची तैयार करने के लिए भी वित्तीय सहायता प्रदान की है. दीनदयाल हस्तकला संकुल, वाराणसी में जीआई उत्पादों हेतु विपणन केंद्र की स्थापना के लिए भी वित्तीय सहायता प्रदान की गई है.
 
ऋण सहबद्ध पूँजी सब्सिडी योजना (सीएलसीएसएस)
 
नाबार्ड सूक्ष्म और लघु उद्यमों के प्रौद्योगिकी उन्नयन के लिए भारत सरकार की 'ऋण सहबद्ध पूँजी सब्सिडी योजना (सीएलसीएसएस)' को लागू करने वाली नोडल एजेंसियों में से एक है. इस योजना के तहत निर्दिष्ट उत्पादों/ उप-क्षेत्रों में सूक्ष्म और लघु इकाइयों में प्रमाणित और बेहतर प्रौद्योगिकियों के प्रयोग हेतु सहायता दी जाती है. नाबार्ड ग्रामीण क्षेत्रों से आवेदन के लिए नोडल एजेंसी है.
 
स्टैंड अप इंडिया योजना
 
5 अप्रैल 2016 को भारत सरकार द्वारा शुरू की गई स्टैंड अप इंडिया योजना उद्यम की स्थापना के लिए प्रति बैंक शाखा बैंक कम से कम एक महिला उधारकर्ता, कम से कम एक अनुसूचित जाति या जनजाति उधारकर्ता को ₹10.00 लाख से लेकर ₹1.00 करोड़ तक के ऋण की सुविधा प्रदान करती है. इस सिलसिले में नाबार्ड ने जिला स्तर पर संपर्क केंद्र के रूप में कार्य करना जारी रखा जिसके अंतर्गत संवितरण पूर्व और संवितरण पश्चात मार्गदर्शन दिया जाता है, सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा किया जाता है, कार्यक्रमों की समीक्षा की जाती है, समस्याओं का समाधान किया जाता है और संभावित उधारकर्ताओं को मार्गदर्शन दिया जाता है. 31 मार्च 2020 तक, देश भर के 507 जिलों में कुल 2,199 मार्गदर्शन कार्यक्रम आयोजित किए गए जिनमें 1,01,357 प्रतिभागी शामिल हुए.