Menu

उपलब्धियां

नाबार्ड के मुख्यतः तीन कार्यक्षेत्र हैं - वित्तीय, विकासात्मक और पर्यवेक्षी - जिनके माध्यम से वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लगभग हर पहलू में योगदान कर रहा है. इनके अंतर्गत उसके विभिन्न दायित्व हैं - पुनर्वित्त सहायता उपलब्ध कराना, ग्रामीण आधारभूत संरचनाओं का निर्माण करना, जिला स्तरीय ऋण योजनाएँ तैयार करना, बैंकिंग उद्योग को ऋण वितरण के लक्ष्य प्राप्त करने के लिए दिशानिर्देश देना और प्रेरित करना, सहकारी बैंकों तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का पर्यवेक्षण करना और श्रेष्ठ बैंकिंग पद्धतियाँ विकसित करने में उनकी मदद करना तथा उन्हें सीबीएस प्रणाली में शामिल होने में सहायता देना, ग्रामीण विकास के लिए नई योजनाएँ तैयार करना, भारत सरकार की विकास योजनाएँ कार्यान्वित करना, हस्तशिल्प कारीगरों को प्रशिक्षण प्रदान करना और उन्हें अपने उत्पादों की बिक्री के मंच उपलब्ध कराना.

अ) वित्तीय कार्य

पुनर्वित्त

नाबार्ड ने वर्ष 2020-21 के दौरान अल्पावधि और दीर्घावधि वित्तपोषण के लिए बैंकों को क्रमशः ₹1,30,964 करोड़ और ₹92,786 करोड़ संवितरित किए.

नाबार्ड पुनर्वित्त के माध्यम से सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को उत्पादन, विपणन और अधिप्रापण गतिविधियों के लिए पुनर्वित्त के रूप में ऋण और अग्रिम प्रदान करता है. इसकी चुकौती मांग किए जाने पर अथवा निर्धारित अवधि (अधिकतम 12 महीने) की समाप्ति पर की जाती है. अल्पावधि पुनर्वित्त प्रावधान का मूल प्रयोजन बैंकों के संसाधनों में वृद्धि करना और आधार स्तरीय ऋण प्रवाह को बेहतर करना है.

नाबार्ड विभिन्न संस्थाओं को उनके संसाधनों में वृद्धि के लिए दीर्घावधि और अल्पावधि पुनर्वित्त प्रदान करता है ताकि किसानों और ग्रामीण कारीगरों आदि की निवेश संबंधी गतिविधियों को सहायता प्रदान करने के लिए पर्याप्त ऋण प्रदान किया जा सकें.

अल्पावधि ऋण

वित्तीय संस्थाओं द्वारा किसानों को फसल उत्पादन के लिए फसल ऋण दिए जाते हैं जिससे देश में खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है. वर्ष 2020-21 के दौरान नाबार्ड ने सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को मौसमी कृषि परिचालनों के लिए ₹95,731 करोड़ और मौसमी कृषि परिचालनों से इतर परिचालनों के लिए ₹11,733 करोड़ संवितरित किए.

नाबार्ड ने लघु वित्त बैंकों (एसएफ़बी) को सहायता देने के लिए एक नई सुविधा भी आरंभ की है और इस सुविधा के अंतर्गत पूर्वोत्तर क्षेत्र के लघु वित्त बैंक (एसएफ़बी) को ₹49 करोड़ की अल्पावधि पुनर्वित्त सहायता प्रदान की गई.

दीर्घावधि ऋण

नाबार्ड की दीर्घावधि पुनर्वित्त व्यवस्था के तहत वित्तीय संस्थाओं को कृषि और कृषीतर क्षेत्रों की विभिन्न गतिविधियों के लिए ऋण उपलब्ध कराया जाता है जिसकी अवधि 18 माह से 5 से अधिक वर्ष तक होती है. वर्ष 2020-21 के दौरान, नाबार्ड ने वित्तीय संस्थाओं को ₹92,786 करोड़ की राशि संवितरित की.

कोविड के पश्चात् ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले प्रवासन के मुद्दे का समाधान करने और कृषि तथा ग्रामीण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए नाबार्ड ने 4 विशेष पुनर्वित्त योजनाओं नामतः एमएससी के रूप में पैक्स के लिए योजना, वाटरशेड साथ ही वाडी परियोजना क्षेत्रों के लाभार्थियों के लिए योजना, जल, स्वच्छता और आरोग्य (वॉश) के लिए योजना और सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण गतिविधियों के लिए योजना का आरंभ किया.

नाबार्ड ने विशेष रूप से सहकारी बैंकों (राज्य सहकारी बैंकों और राज्य सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंकों) तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी)के लिए कृषि गतिविधियों में निवेश ऋण के लिए दीर्घावधि पुनर्वित्त सहायता प्रदान करने हेतु भारत सरकार ने नाबार्ड में एलटीआरसीएफ़ की स्थापना की.

विशेष चलनिधि सुविधा

लॉकडाउनके दौरान किसानों को फसल कटाई और उत्पादन संबंधी गतिविधियों के लिए अबाधित ऋण प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए नाबार्ड ने सहकारी बैंकों को ₹16800 करोड़, क्षेग्रा बैंकों को ₹6700 करोड़ और एनबीएफ़सी-एमएफ़आई को ₹2000 करोड़ की राशि संवितरित की जिसकी वजह से भारत ने लॉकडाउन के दौरान भी कृषि उत्पादन में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया. नाबार्ड ने ₹500 करोड़ से कम आस्तियों वाले एनबीएफ़सी-एमएफ़आई को ₹1567 करोड़ की अतिरिक्त विशेष चलनिधि सहायता (एसएलएफ़) प्रदान की. कोविड-19 महामारी के कारण जिन रासकृग्रावि बैंकों को चलनिधि की कमी का सामना करना पड़ा उन पात्र रासकृग्रावि बैंकों को एसएलएफ़ प्रदान की गई थी. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार इस ऋण सुविधा के अंतर्गत 5 राज्यों में रासकृग्रावि बैंकों को ₹908.16 करोड़ की राशि संवितरित की गई.

ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास निधि (आरआईडीएफ़)

भारतीय रिज़र्व बैंक ने ग्रामीण आधारभूत संरचना निर्माण की परियोजनाओं में सहायता के लिए वर्ष 1995- 96 में नाबार्ड में ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास निधि की स्थापना की थी जिसका स्रोत था अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को ऋण वितरण हेतु निर्धारित लक्ष्य में कमी की राशि. इसके तहत नाबार्ड ने 2020-21 के दौरान ₹29,193 करोड़ की राशि संवितरित की. आज देश में ग्रामीण आधारभूत संरचना हेतु निधीयन में आरआईडीएफ बहुत बड़ा योगदान है.

दीर्घावधि सिंचाई निधि

दीर्घावधि सिंचाई निधि (एलटीआईएफ़) की घोषणा 2016-17 के केंद्रीय बजट में की गई थी. इसका प्रयोजन था दिसंबर 2019 तक 18 राज्यों की 99 चयनित मध्यम और बड़ी सिंचाई परियोजनाओं को एक अभियान चलाकर तेजी से पूरा करना. इसके बाद भारत सरकार ने एलटीआईएफ के तहत चार अन्य परियोजनाओं के वित्तपोषण का अनुमोदन किया है, नामत: - आंध्र प्रदेश में पोलावरम परियोजना, बिहार और झारखंड में उत्तर कोयल परियोजना, पंजाब की सरहिंद और राजस्थान फीडर रीलाइनिंग परियोजना, पंजाब में शाहपुर कंडी बांध परियोजना. इन परियोजनाओं के समन्वय और उन्हें पूरा करने में सहयोग प्रदान करने के लिए जल शक्ति मंत्रालय (एमओजेएस) को नोडल मंत्रालय बनाया गया है. दिसंबर 2019 के बाद और 31 मार्च 2021 तक अथवा योजना को जारी रखने के लिए अनुमति प्रदान की गई है जो भी पहले हो उस अवधि तक भारत सरकार ने एलटीआईएफ़ के अंतर्गत निधीयन की व्यवस्था को अनुमोदन प्रदान किया है. वर्ष 2020-21 के दौरान ₹2,461.84 करोड़ की राशि मंजूर की गई और ₹7761.20 करोड़ की राशि संवितरित की गई थी. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार एलटीआईएफ़ के अंतर्गत संचयी रूप से ₹84,326.60 करोड़ की राशि मंजूर की गई और ₹52,479.71 करोड़ की राशि जारी की गई.

भारत सरकार ने योजना के अंतर्गत निधियां जारी करने की अवधि 30 सितंबर 2021 तक बढ़ा दी है.

प्रधानमंत्री आवास योजना - ग्रामीण (पीएमएवाई- जी)

2020-21 के दौरान नाबार्ड ने पीएमएवाई-जी के अंतर्गत राष्ट्रीय ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास एजेंसी (एनआरआईडीए) को ₹20,000 करोड़ की राशि मंजूर की तथा ₹19,999.80 करोड़ की राशि संवितरित की. 31 मार्च 2021 की स्थिति में एनआरआईडीए को मंजूर संचयी राशि ₹61,975 करोड़ थी जिसमें से ₹48,819.03 करोड़ की राशि जारी की जा चुकी है. यह वित्तीय सहायता पीएमएवाई-जी के तहत प्रदान की गई है जिसका उद्देश्य है वर्ष 2022 तक कच्चे और जीर्ण-शीर्ण मकानों में रहने वाले लोगों सहित सभी बेघर परिवारों को बुनियादी सुविधाओं से युक्त पक्के मकान उपलब्ध करवाना.

सूक्ष्म सिंचाई निधि (एमआईएफ़)

2019-20 से नाबार्ड में ₹5,000 करोड़ की समूह निधि के साथ सूक्ष्म सिंचाई निधि संचालित की गई. इस निधि का उद्देश्य राज्य सरकारों को सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत अधिकाधिक परियोजनाओं को शामिल करने के लिए अतिरिक्त संसाधनों के संग्रहण में सहायता करना और पीएमकेएसवाई-पीडीएमसी के प्रावधानों के दायरे से बाहर किए गए काम को प्रोत्साहित करना है. इस कार्य के लिए नोडल मंत्रालय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय (एमओए और एफ़डबल्यू), भारत सरकार है. नाबार्ड ने 2020-21 के दौरान एमआईएफ़ के अंतर्गत ₹1,128.60 करोड़ की राशि मंजूर की और ₹1,827.47 करोड़ की राशि जारी की. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार, संचयी रूप से ₹3,970.17 करोड़ की राशि मंजूर की गई और ₹1,827.47 करोड़ की राशि जारी की गई.

नाबार्ड आधारभूत संरचना विकास सहायता (नीडा)

नाबार्ड आधारभूत संरचना सहायता (नीडा) के तहत ग्रामीण आधारभूत संरचना के वित्तपोषण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की सुप्रबंधित संस्थाओं को लचीला दीर्घकालिक ऋण प्रदान किया जाता है. कृषि आधारभूत संरचना, ग्रामीण कनेक्टिविटी, नवीकरणीय ऊर्जा, विद्युत संचार, पेयजल और स्वच्छता, और अन्य सामाजिक और वाणिज्यिक आधारभूत संरचना परियोजनाओं को नीडा के तहत वित्तपोषित किया जाता है. कॉरपोरेट्स/ कंपनियों, सहकारी संस्थाओं जैसी पंजीकृत संस्थाओं द्वारा कार्यान्वित की जाने वाली सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) परियोजनाओं और गैर-पीपीपी परियोजनाओं को शामिल करने से नीडा के तहत वित्तपोषण का दायरा और व्यापक हो गया है. नीडा के तहत वित्तपोषण के विषय क्षेत्र में राज्य सरकारों को ऑफ-बजट और ऑन-बजट उधार देनल शामिल है जिससे राज्य सरकारों की बजट संबंधी बाध्यताएं कम हो जाती हैं.

वर्ष 2020-21 के दौरान, नीडा के तहत 19 ऋण प्रस्तावों के माध्यम से ₹22,767.75 करोड़ के सावधि ऋण को मंजूरी दी गई जिसमें 08 सिंचाई परियोजनाओं (60.9% ₹13,864.98 करोड़), 4 पेयजल परियोजनाओं (21.66%, ₹4,931.52 करोड़), 03 संचार परियोजनाओं (3.93%, ₹893.68 करोड़) और ग्रामीण कनेक्टिविटी (5.09%, ₹1158.53 करोड़), ग्रामीण आवासन (3.48%, ₹792.44 करोड़), मल-निकास (0.28%, ₹64.87 करोड़) और संचार व्यवस्था क्षेत्र (4.06%, ₹1061.73 करोड़) प्रत्येक के लिए 1 परियोजना को शामिल किया गया था.

नीडा के तहत विभिन्न परियोजनाओं के प्रभाव निम्नानुसार हैं:

क्षेत्र प्रभाव
सिंचाई 13,83,013 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल
सूक्ष्म सिंचाई 1,39,000 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल
नवीकरणीय ऊर्जा 113 मेगावाट शक्ति क्षमता निर्मित
विद्युत संचार संचार आधारभूत संरचना के आधुनिकीकरण में सहयोग प्रदान करने के लिए 15 राज्यों में 52 परियोजनाएँ
ग्रामीण संपर्क (कनेक्टिविटी) 7,410 किलोमीटर लंबी सड़क और 7.93 किलोमीटर लंबा पुल निर्मित
पेयजल की आपूर्ति 31,722 परिवारों को उनके घर तक जल की आपूर्ति की गई.
भंडारण और शीट भंडारण क्षमता 29,600 मीट्रिक टन क्षमता निर्मित
स्वच्छता प्रतिदिन 15 मिलियन लीटर की क्षमता वाली मल-निकास उपचार सुविधा के साथ-साथ मल-निकास प्रणाली का निर्माण
संचार-व्यवस्था 30,000 से अधिक सरकारी कार्यालयों को जोड़ने के लिए नेटवर्क 20 लाख परिवारों के लिए निःशुल्क इन्टरनेट की व्यवस्था

अल्पावधि बहु-उद्देशीय ऋण हेतु जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों को प्रत्यक्ष पुनर्वित्त सहायता (डीआरए)

नाबार्ड जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों द्वारा विभिन्न प्रयोजनों के लिए ऋण वितरण के लिए राज्य सहकारी बैंकों को पुनर्वित्त सहायता प्रदान करता है. जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों को प्रत्यक्ष पुनर्वित्त सहायता की संकल्पना एक अतिरिक्त ऋण सुविधा के रूप में की गई थी ताकि वे ऋण वितरण में विविधीकरण कर सकें और लाभ अर्जक पोर्टफोलियो के माध्यम से अपनी आय बढ़ा सकें. यह ऋण सीमा सुशासित और वित्तीय रूप से सुदृढ़ जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों को मंजूर की जाती है जिन्हें नाबार्ड के नवीनतम निरीक्षण में 'ए' या 'बी' श्रेणी प्राप्त हो. ऋण के पात्र प्रयोजनों में कार्यशील पूंजी, कृषि उपकरणों तथा अन्य उत्पादक आस्तियों की मरम्मत, उत्पाद का भंडारण/ ग्रेडिंग/ पैकेजिंग, विपणन गतिविधियां, कृषीतर गतिविधियां आदि शामिल हैं. यह सीमा नकद ऋण की प्रकृति की होती है जो मंजूरी की तिथि से 1 वर्ष की अवधि के लिए परिचालन में रहती है. यह सीमा बैंकों की विशिष्ट अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए 3 माह की अवधि के लिए भी उपलब्ध रहती है.

वर्ष 2020-21 के दौरान, डीआरए के तहत की गई मंजूरियों में 33% की वृद्धि दर्ज की गई अर्थात वित्तीय वर्ष 2019-20 में ₹8,932 करोड़ की राशि के समक्ष वित्तीय वर्ष 2020-21 में ₹11,890 करोड़ की राशि मंजूर की गई. डीआरए के तहत संवितरणों में 20% की कमी आई अर्थात वित्तीय वर्ष 2019-20 के दौरान ₹9,200 करोड़ के समक्ष वित्तीय वर्ष 2020-21 के दौरान ₹7,373.49 करोड़ का संवितरण किया गया.

महासंघों को ऋण सुविधा (सीएफएफ)

महासंघों को ऋण सुविधा के तहत कृषि जिंसों के विपणन, निविष्टियों की आपूर्ति तथा मूल्य और आपूर्ति श्रृंखला के प्रबंधन हेतु राज्य सरकार की संस्थाओं, जैसे कृषि विपणन महासंघ, सिविल सप्लाई, डेरी सहकारिताओं, मिल्क यूनियनों अथवा महासंघों, अल्पावधि ऋण सहायता प्रदान की जाती है. इस सुविधा के तहत खाद्यान्न, दलहन और तिलहन के साथ-साथ अन्य कृषि जिंसों जैसे दूध की अधिप्राप्ति के लिए ऋण सहायता प्रदान की जाती है. यह सुविधा कृषि जिंसों जैसे बीज और खाद की अधिप्राप्ति और विपणन के लिए भी उपलब्ध है. यह सुविधा 12 माह के लिए अल्पावधि ऋण के रूप में या एजेंसियों की विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु 3 माह के लिए अति अल्पावधि ऋण उपलब्ध कराया जाता है.

वर्ष 2020-21 के दौरान, सीएफ़एफ़ के तहत की गई मंजूरियों में 60% की वृद्धि दर्ज की गई अर्थात वित्तीय वर्ष 2019-20 में ₹25,071 करोड़ की राशि के समक्ष वित्तीय वर्ष 2020-21 में ₹40,160 करोड़ की राशि मंजूर की गई. 14 एजेंसियों को यह सुविधा मंजूर की गई जिनमें से 07 एजेंसियां नई क्लाइंट थीं. जिन नई गतिविधियों को वित्तपोषण प्रदान किया गया है उनमें बीज प्रसंस्करण और मोटे अनाजों की खरीद शामिल हैं. सीएफ़एफ़ के तहत संवितरणों में 29% की वृद्धि हुई अर्थात वित्तीय वर्ष 2019-20 के दौरान ₹37,206.56 करोड़ के समक्ष वित्तीय वर्ष 2020-21 के दौरान ₹47,852.62 करोड़ का संवितरण किया गया. 31 मार्च 2020 की स्थिति के अनुसार, ₹12,123.24 करोड़ की राशि के समक्ष 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार ₹20,038.21 करोड़ की राशि बकाया है जो 65% की वृद्धि दर्शाती है. सीएफ़एफ़ के अंतर्गत 5 वर्षों की मंजूरियों, संवितरणों और बकाया का सीएजीआर क्रमशः 45%, 47% और 32% है.

डेरी प्रसंस्करण और आधारभूत संरचना विकास निधि (डीआईडीएफ़)

केंद्रीय बजट 2017-18 में की गई घोषणा के अनुरूप, भारत सरकार ने नाबार्ड में एक डेयरी प्रसंस्करण और आधारभूत संरचना विकास निधि (डीआईडीएफ़) का सृजन किया, जिसकी समूह निधि ₹8,004 करोड़ है. इस राशि का उपयोग पांच वर्ष की अवधि में किया जाएगा. योजना के उद्देश्य हैं दूध प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन के लिए आधुनिकीकरण करना और आधारभूत संरचना में वृद्धि करना ताकि प्राथमिक उत्पादकों को इष्टतम मूल्य की प्राप्ति सुनिश्चित की जा सके. इस निधि के अंतर्गत कार्यान्वयन अवधि के दौरान प्रतिदिन 12.6 मिलियन लीटर अतिरिक्त दुग्ध प्रसंस्करण क्षमता, प्रतिदिन 210 मिलियन टन दूध पावडर प्रसंस्करण क्षमता और अन्य आधारभूत संरचना सुविधाओं के निर्माण की परिकल्पना की गई है.

वित्तीय वर्ष 2020-21 के दौरान, राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) (6 दुग्ध संघ) और एनसीडीसी (03 दुग्ध संघ) को ₹943.61 करोड़ राशि की मंजूरी की गई थी. वर्ष के दौरान कुल ₹120.70 करोड़ का संवितरण किया गया. •मत्स्यपालन तथा जलचरपालन आधारभूत संरचना विकास निधि (एफ़आईडीएफ़)

केंद्रीय बजट 2017-18 में की गई घोषणा के अनुरूप, भारत सरकार ने नाबार्ड में एक मत्स्यपालन तथा जलचरपालन आधारभूत संरचना विकास निधि (एफ़आईडीएफ़) का सृजन किया है जिसकी समूह निधि ₹7,522.48 करोड़ है. इस राशि का उपयोग पांच वर्ष की अवधि में किया जाएगा. नाबार्ड राज्य सरकारों के माध्यम से विभिन्न सुविधाओं हेतु सार्वजनिक आधारभूत संरचना घटकों के लिए ₹2,600 करोड़ की राशि का निधीयन करेगा. इन गतिविधियों में फिशिंग हार्बर, फिश लैंडिंग सेंटर, आधुनिक राज्य मत्स्य बीज फार्म, आधुनिक मछली बाजार, रोग डायग्नोस्टिक लैब, एक्वाटिक क्वारीन्टाइन सुविधाएँ और प्रशिक्षण आधारभूत संरचना शामिल हैं.

वर्ष 2020-21 के दौरान एफ़आईडीएफ़ के अंतर्गत ₹193.77 करोड़ का कुल संवितरण किया गया.

नया उत्पाद-राज्य सरकारों को ग्रामीण आधारभूत संरचना सहायता (आरआईएएस)

नाबार्ड ने ₹15,000 करोड़ की प्रारम्भिक समूह निधि के साथ “राज्य सरकारों को ग्रामीण आधारभूत संरचना सहायता” नामक नए उत्पाद का शुभारंभ किया है. आरआईएएस के अंतर्गत नाबार्ड पूर्वी क्षेत्र की राज्य सरकारों को ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने के लिए आधारभूत संरचना के निर्माण हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करेगा जो 5-ज दृष्टिकोण – जन (मानव), जल (पानी), जमीन (भूमि), जानवर (पशुधन) और जंगल (वन) पर आधारित होगी.

भंडारागार आधारभूत संरचना निधि

भारत सरकार ने देश में कृषि वस्तुओं के लिए वैज्ञानिक भंडारागार की आधारभूत संरचना आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऋण सहायता उपलब्ध कराने के प्रयोजन से वर्ष 2013- 14 में ₹5,000 करोड़ की समूह निधि के साथ नाबार्ड में भंडारागार आधारभूत संरचना निधि का सृजन किया. 31 मार्च 2021 की स्थिति में इसके तहत ₹7,620.69 करोड़ का संचयी संवितरण किया गया.

खाद्य प्रसंस्करण निधि

क्लस्टर आधार पर संगठित क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारत सरकार ने ₹2,000 करोड़ की समूह निधि के साथ 2014-15 में नाबार्ड में खाद्य प्रसंस्करण निधि (एफ़पीएफ़) स्थापित की. नाबार्ड ने 2020-21 के दौरान 7 कृषि प्रसंस्करण क्लस्टरों और 5 एकल खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना के लिए ₹116.4 करोड़ के ऋण की मंजूरी दी. संचयी रूप से, इस निधि के तहत 31 मार्च 2021 तक 12 मेगा फूड पार्क (एमएफपी) परियोजनाओं, 10 कृषि प्रसंस्करण क्लस्टरों और 10 खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के लिए ₹701.18 करोड़ के संचयी ऋण की मंजूरी दी जा चुकी है. वर्ष के दौरान, ₹53.24 करोड़ की राशि का संवितरण किया गया जिसके साथ मंजूर परियोजनाओं के अंतर्गत कुल संचयी संवितरण ₹409.38 करोड़ हो गया.

भंडारागारों की जिओ टैगिंग

नाबार्ड ने वेब आधारित कृषि-भंडारण व्यवस्था के निर्माण की ज़िम्मेदारी उठाई जो न केवल आधारभूत संरचना के विवरणों को कैप्चर करती है परंतु भू-स्थानिक निर्देशांक को भी कैप्चर करती है. भंडारागारों (सूखे और गीले) की जिओ-टैगिंग की परियोजना प्रायोगिक आधार पर दो राज्यों (हरियाणा और तमिलनाडु) में आरंभ की गई थी और यह कार्य परामर्श का कार्य करने वाली हमारी सहायक संस्था नैबकॉन्स ने किया. इस दौरान केंद्रीय बजट 2020 में 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए 16 बिन्दुओं की कार्य-योजना निर्धारित की गई जिसमें नाबार्ड द्वारा कृषि-भंडारणों, शीत भंडारणों, रेफर वैन सुविधाओं की मैपिंग और जिओ-टैगिंग की प्रक्रिया शामिल है. इसके परिणामस्वरूप यह अध्ययन अखिल भारतीय स्तर पर किया जाएगा और इसे भारत सरकार द्वारा प्राथमिकता दी जा रही है. नवंबर 2020 में यह प्रक्रिया आरंभ की गई और जून 2021 तक इस प्रक्रिया को पूरा किया जाना अपेक्षित है.

जिओ-टैगिंग के कार्य की प्रगति निम्नानुसार है :

क्रम सं. चरण भंडारण संरचनाओं की अनुमानित संख्या जिओ-टैगिंग की जा चुकी संरचनाओं की संख्या जिओ-टैगिंग की गई संरचनाओं का प्रतिशत स्थिति
1 पहला चरण (प्रयोगिक 6772 6310 93.18 पूर्ण
2 दूसरा चरण (अखिल भारतीय स्तर पर) 100463 95459 95.01 चालू
कुल 107235 101769 94.90  

एण्ड्रोइड और आईओएस समर्थित दोनों प्रकार के उपकरणों के लिए फार्मर्स एप (किसान भंडार) विकसित किया गया है जिसका उपयोग किसानों/ व्यापारियों/ उत्पादकों द्वारा अपने इलाके में जिओ-टैगिंग की जा चुकी आस्तियों की पहचान करने के लिए किया जाएगा. भारत सरकार द्वारा इस एप का शुभारंभ किया जाएगा और तत्पश्चात् उपयोगकर्ता गूगल प्ले स्टोर और एपल स्टोर से इसे डाउनलोड कर सकते हैं.

आ) पर्यवेक्षी कार्य

वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए 31 मार्च, 2020 की स्थिति में बैंकों/ अन्य संस्थानों की वित्तीय स्थिति के संदर्भ में 302 सांविधिक निरीक्षण और 9 स्वैच्छिक निरीक्षण निर्धारित किए गए थे जिनका विवरण निम्नानुसार हैं: - निर्धारित और संचालित निरीक्षण – 2020-21

सांविधिक निरीक्षण स्वैच्छिक निरीक्षण कुल
राज्य सहकारी (रास) बैंक जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक क्षेत्रीय ग्रामीण (क्षेग्रा) बैंक राज्य सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास (रासकृग्रावि) बैंक
निर्धारित निरीक्षणों की संख्या 34 216 43 9 302
संचालित निरीक्षण की संख्या 34 216 43 9 302

इ) विकास कार्य

वाटरशेड विकास

31 मार्च 2021 तक संचयी रूप से 3401 वाटरशेड विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी गई जिनके तहत 23.43 लाख हेक्टेयर का क्षेत्र कवर किया गया. 1,914 वाटरशेड परियोजनाएँ सफलतापूर्वक पूरी कर ली गई हैं. इन सभी कार्यक्रमों के लिए ₹2,389.51 करोड़ की प्रतिबद्धता थी जिसमें से ₹1,902.46 करोड़ का संवितण किया जा चुका है.

जनजाति विकास

नाबार्ड द्वारा वर्ष 2003-04 में अपने लाभ में से ₹50 करोड़ समूह निधि के साथ का जनजाति विकास कार्यक्रम की स्थापना की गई. 31 मार्च 2021 तक इसके तहत 835 परियोजनाएँ मंजूर की गई हैं जिनसे 5.33 लाख एकड़ क्षेत्र मैं फैले 5.60 लाख परिवार लाभान्वित हुए हैं. इन परियोजनाओं के तहत संचयी मंजूरियों और संवितरण की राशि क्रमश: ₹2,378 और ₹1,688 लाख है.

जलवायु-अनुकूल परियोजनाएँ

अडाप्टेशन फंड के तहत, छह परियोजनाओं और दो रेडिनेस ग्रांट के लिए संचयी रूप से 9.94 मिलियन अमेरिकी डॉलर (₹60.95 करोड़) की राशि मंजूर की गई है. नाबार्ड ने ग्रीन क्लाइमेट फंड के तहत 134.35 मिलियन अमेरिकी डॉलर (₹ 915.6 करोड़) के कुल परिव्यय वाली दो परियोजनाओं को मंजूरी दी है. वित्तीय वर्ष 2020-21 के अंत तक हमने एनएएफ़सीसी के अंतर्गत संचयी रूप से ₹847 करोड़ की 30 परियोजनाएं मंजूर की हैं. नाबार्ड ने जलवायु परिवर्तन निधि के अंतर्गत वर्ष 2020-21 के दौरान जलवायु परिवर्तन के परिणामों से निपटने, अनुकूलन और शमन के उपायों, जागरूकता निर्माण, ज्ञान को साझा करने और संधारणीय विकास के लिए की जाने वाली गतिविधियों के संवर्धन और सहयोग के लिए ₹ 0.97 करोड़ की राशि संवितरित की.

प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर अम्ब्रेला कार्यक्रम

प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर अम्ब्रेला कार्यक्रम के तहत संचयी रूप से देश के 10 प्रमुख प्राकृतिक संसाधन प्रबंध क्षेत्रों के लिए 334 परियोजनाएँ मंजूर की गई हैं जिनके लिए ₹45.38 करोड़ की अनुदान सहायता सहित ₹738.55 करोड़ की वित्तीय सहायता मंजूर की गई है. 31 मार्च 2021 तक ₹31.54 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ संचयी संवितरण की राशि ₹577.22 करोड़ थी.

वित्तीय समावेशन

बैंकिंग सेवाओं के लिए मांग उत्पन्न करने तथा आधार स्तर पर पर भुगतान/ स्वीकरण की आधारभूत संरचनाओं की स्थापना के फलस्वरूप 31 मार्च 2021 तक वित्तीय समावेशन निधि (एफ़आईएफ़) के तहत कार्यान्वित विभिन्न योजनाओं के लिए संचयी मंजूरियों की राशि ₹4,592.81 करोड़ तथा संवितरण की राशि ₹2,527.67 करोड़ थी. वित्तीय समावेशन के अंतर्गत मांग और पूर्ति में अंतर को पूरा करने के उद्देश्य से क्षेत्रीय भिन्नताओं को दूर करने तथा पूरे देश में समुचित और समावेशी वित्तीय समावेशन हासिल करने के लिए 2019 से एक विभेदीकृत रणनीति अपनाई गई. इसके तहत 358 विशेष फोकस वाले जिलों में 90% की बढ़ी हुई दर से अनुदान सहायता उपलब्ध कराई गई. इन विशेष फोकस जिलों में आकांक्षी जिले, वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिले, ऋण की कमी वाले जिले, लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह तथा पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में स्थित जिले शामिल हैं.

सूक्ष्म वित्त क्षेत्र

नाबार्ड ने 1992 में स्वयं सहायता समूह-बैंक सहबद्धता कार्यक्रम (एसएचजी-बीएलपी) शुरू किया था. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार इसमें लगभग 112.23 लाख स्वयं सहायता समूह और देश के लगभग 13.5 करोड़ ग्रामीण परिवारों का सशक्तीकरण किया गया. लगभग 28.87 लाख समूहों ने 2020-21 के दौरान विभिन्न बैंकों से ₹58070 करोड़ की ऋण सहायता प्राप्त की जिससे प्रति समूह औसत ऋण ₹2.01 लाख हो गया है. 2020-21 के दौरान बैंकों द्वारा 41.30 लाख संयुक्त देयता समूहों का संवर्धन और वित्तपोषण किया गया.

ई-शक्ति

ई-शक्ति परियोजना स्वयं सहायता समूहों को डिजिटाइज़ करने के उद्देश्य से 15 मार्च 2015 को 02 जिलों में प्रायोगिक रूप से शुरू की गई. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार 12.33 लाख स्वयं सहायता समूहों से संबंधित आंकड़ों को ई-शक्ति पोर्टल पर अपलोड किया गया जिसमें 281 जिलों के 1.67 लाख गांवों के 140.91 लाख सदस्य शामिल हैं. इस परियोजना ने पोर्टल में इन बिल्ट ग्रेडिंग व्यवस्था के आधार पर बैंकरों को स्वयं सहायता समूहों को ऋण प्रदान करने में सहायता प्रदान की. 31 मार्च 2021 तक इस परियोजना के कारण बैंकों से सहबद्ध समूह में 4.68 लाख (38% समूह) से बढ़कर 6.49 लाख (53% समूह) हो गए. समूहों के सदस्यों को स्थानीय भाषा (10 भाषाएँ) में बैंकिंग-लेनदेन से संबंधित एसएमएस प्राप्त होने के कारण उनका आत्मविश्वास बढ़ा और महिलाओं का सशक्तीकरण हुआ.

एसएचजी आधारित आजीविका सहयोग

सूक्ष्म उद्यमिता आंदोलन को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से नाबार्ड ने दो कौशल निर्माण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों नामतः सूक्ष्म उद्यम विकास कार्यक्रम (एमईडीपी) और आजीविका और उद्यम विकास कार्यक्रम (एलईडीपी) का शुभारंभ किया. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार वर्ष 2006 से 18434 एमईडीपी के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों के 5.22 लाख सदस्यों को प्रशिक्षित किया जा चुका है और कुल रु. 35 करोड़ की अनुदान सहायता मंजूर की गई. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार 1284 एलईडीपी के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों के 1.36 लाख से अधिक सदस्यों को ₹63 करोड़ की अनुदान की मंजूरी से सहायता प्रदान की गई.

कौशल विकास

भारत सरकार के लक्ष्य के अनुरूप, नाबार्ड ने मांग और परिणाम आधारित कार्यक्रमों के जरिए विभिन्न स्टेकहोल्डरों के माध्यम से ग्रामीण भारत में कौशल की कमी को पूरा करने के लिए एक संरचित दृष्टिकोण विकसित किया है ताकि इन क्षेत्रों में रोजगार/ स्वरोजगार के अवसर सृजित किए जा सकें.

नाबार्ड ने अब तक ₹174 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 35,557 कार्यक्रमों के जरिए 9.58 लाख ग्रामीण युवाओं के प्रशिक्षण हेतु सहायता उपलब्ध कराई है जिससे उन्हें रोजगार/ स्वरोजगार उपलब्ध कराया जा सके. वर्ष 2020-21 के दौरान नाबार्ड ने ₹20 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 679 कौशल विकास कार्यक्रमों के जरिए 31,890 लाख ग्रामीण युवाओं का कौशल विकास किया.

2020-21 के दौरान कोविड-19 के संकट के समय शहरों से गावों की ओर लौटने वाले प्रवासियों के रोजगार की समस्या का समाधान करने के लिए विभिन्न प्रयास किए गए. उत्तर प्रदेश (रायबरेली, गोरखपुर, मिर्ज़ापुर, महाराजगंज और इलाहाबाद), बिहार (मुजफ्फरपुर, वैशाली, रोहतास और गया) और झारखंड (हजारीबाग) में “शहरों से गावों में लौटे 10,000 प्रवासियों के लिए रैपिड रिस्किलिंग और त्वरित रोजगार प्रदान करने की व्यापक परियोजना” के लिए सहायता प्रदान की गई.

नाबार्ड ने ग्रामीण युवाओं को मेकट्रोनिक्स, आर्क वेल्डिंग, रेफ्रीजरेशन आदि नए युग के कौशल में क्षमता निर्माण के लिए एनएसडीसी से सम्बद्ध प्रशिक्षण संस्थाओं के साथ सहयोग किया. कोविड-19 महामारी के दौरान व्यवसाय और आजीविका के अवसरों को ध्यान में रखते हुए नाबार्ड ने कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करने की मांग को समझते हुए ग्रामीण महिलाओं को फेस मास्क और पीपीई किट के निर्माण का प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए सहायता की.

कृषीतर उत्पादक संगठन (ओएफ़पीओ)

दस्तकार/ बुनकर/ कृषीतर गतिविधि क्लस्टरों का उन्नयन करने और उन्हें एक औपचारिक रजिस्टर्ड इकाई का रूप देने के साथ-साथ क्षमता निर्माण, व्यवसाय आयोजना, बाजार लिंकेज, डिजाइन विकास आदि के जरिए उत्पादकों को सामूहिक व्यवसाय शुरू करने में सहायता प्रदान करने के उद्देश्य के साथ वर्ष 2016-17 में कृषीतर उत्पादक संगठन (ओएफ़पीओ) के गठन और संवर्धन की योजना शुरू की गई थी. इस योजना के तहत, पात्र इकाई को उत्पादक संगठन संवर्धन संस्था के रूप में कार्य करने के लिए सहायता प्रदान की जाती है जिससे कृषीतर क्षेत्र के उत्पादक सामूहिक रूप से व्यवसायिक गतिविधियां शुरू कर सकें ताकि उन्हें संख्या बल का लाभ मिले, उनकी मोल-भाव की शक्ति बढ़े तथा उन्हें व्यवसाय के लिए सुविधाएं और अवसर प्राप्त हों.

31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार 20 राज्यों में 40 ओएफ़पीओ को ₹17.4 करोड़ की अनुदान सहायता उपलब्ध कराई गई जिससे 14,043 लाभार्थी लाभान्वित हुए. इनमें से 27 ओएफपीओ कंपनी/ सोसाइटी अधिनियम के तहत पंजीकृत हैं तथा समूहन, विपणन और निविष्टियों के संवितरण के माध्यम से व्यावसायिक गतिविधियों में संलग्न हैं. आठ ओएफपीओ महिलाओं के ओएफ़पीओ हैं और आशा है कि इनसे सीधे तौर पर 3325 महिला बुनकरों / कारीगरों का सशक्तीकरण किया जा सकेगा.

विपणन पहलें

कृषि और कृषीतर क्षेत्र के ग्रामीण उत्पादकों को अपने उत्पादों के प्रभावी विपणन हेतु सहायता उपलब्ध कराने के लिए नाबार्ड ग्रामीण हाट/ मंडियों की स्थापना तथा दस्तकारों द्वारा राष्ट्रीय/ क्षेत्रीय स्तर पर प्रदर्शनियों और मेलों में भागीदारी के लिए सहयोग देता रहा है.

ग्रामीण हाट

ग्रामीण मार्टों के माध्यम से, ग्रामीण समुदायों को अपने कृषि और कृषीतर उत्पादों को खरीदने और बेचने के लिए बाज़ारों तक पहुँचने में सहायता मिलती है. ग्रामीण हाट, उत्पादक संगठनों, ग्राम वाटरशेड और जनजाति विकास समितियों के लिए बाज़ारों तक पहुँचने के एक प्रभावी माध्यम के रूप में उभरे हैं. नाबार्ड ग्रामीण हाटों को आधारभूत संरचना के निर्माण के लिए सहायता प्रदान करना है जिसमें प्लैटफ़ार्म, छत, पेयजल सुविधा, स्वच्छता आदि सुविधाएँ शामिल हैं. वर्ष 2020-21 के दौरान ₹7.6 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 58 ग्रामीण हाटों को मंजूरी प्रदान की गई. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार ₹54.23 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 636 ग्रामीण हाटों को मंजूरी प्रदान की गई.

ग्रामीण मार्ट

ग्रामीण मार्ट उत्पादक समुदायों के बीच उद्यमशीलता को बढ़ावा देने और ग्रामीण समुदाय, विशेषकर महिलाओं और कमजोर वर्गों, द्वारा निर्मित घरेलू उत्पादों के लिए बाजार लिंक प्रदान करने में मदद करते हैं. इससे जमीनी स्तर पर आय और रोजगार सृजन में मदद मिलती है. वर्ष 2020-21 के दौरान, ₹7.6 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 155 ग्रामीण मार्टों को मंजूरी प्रदान की गई. 31 मार्च 2021 तक, 1085 ग्रामीण मार्टों को ₹23.2 करोड़ की अनुदान सहायता प्रदान की गई.

प्रदर्शनी/ मेले

प्रदर्शनियां और मेले कारीगरों को एक सीधा विपणन मंच प्रदान करते हैं जिसके साथ उन्हें बाजार की सूचनाओं और ग्राहकों की पसंद जी जानकारी मिलती है और थोक खरीद के आदेश प्राप्त होते हैं. इन मेलों में भाग लेने से कारीगरों का सशक्तीकरण होता है जिससे वे व्यवसाय में आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकते हैं.

कोविड-19 महामारी और उसके बाद लगाए गए लॉकडाउन और सरकारी प्रतिबंधों ने प्रदर्शनियों और मेलों के आयोजन को प्रभावित किया. स्थिति बेहतर होने के बाद 09 क्षेत्रीय कार्यालयों ने ₹2.74 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 10 प्रदर्शनियों का आयोजन किया.

प्रदर्शनियों के दौरान सहभागी उत्पादकों के सशक्तीकरण के लिए विभिन्न पहलें की जाती हैं, जैसे क्रेता-विक्रेता बैठक का आयोजन, ब्रांडिंग, विपणन, पैकेजिंग, प्रभावी संप्रेषण और उद्यमिता विकास पर वित्तीय समावेशन और डिजिटल भुगतान प्रणालियों के संवर्धन पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों और कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है.

कृषि व्यवसाय उद्भवन केंद्र (एबीआईसी)

कृषि उद्यमियों के लिए एक सहायक वातावरण और कृषि उद्यमियों के विकास के लिए नाबार्ड ने 2017-18 में कृषि व्यवसाय उद्भवन केंद्र की स्थापना हेतु सहायता देना शुरू किया था. इस नीति में एबीआईसी की स्थापना करने और पांच वर्ष की अवधि हेतु उनके कार्यों के लिए पात्र परिचालन व्यय को के लिए कृषि विश्वविद्यालय/ इसी तरह के अन्य संस्थान (मेजबान संस्थान) जैसे पात्र संस्थानों को सहायता प्रदान करने की परिकल्पना की गई है. यह अधिक कृषि स्टार्टअप के संवर्धन, कृषि / ग्रामीण उद्यमियों और उद्यमों को बढ़ावा देने की दिशा में एक कदम है. स्वतंत्र कृषि व्यवसाय उद्भवन केंद्र स्थापित करने के लिए अब तक जिन संस्थानों को सहायता दी गई है उनका विवरण नीचे दिया जा रहा है:

क्रम सं. मेजबान संस्थान का नाम
1 तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, मदुरै, तमिलनाडु.
2 चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय इ) विकास कार्य

वाटरशेड विकास

31 मार्च 2021 तक संचयी रूप से 3401 वाटरशेड विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी गई जिनके तहत 23.43 लाख हेक्टेयर का क्षेत्र कवर किया गया. 1,914 वाटरशेड परियोजनाएँ सफलतापूर्वक पूरी कर ली गई हैं. इन सभी कार्यक्रमों के लिए ₹2,389.51 करोड़ की प्रतिबद्धता थी जिसमें से ₹1,902.46 करोड़ का संवितण किया जा चुका है.

जनजाति विकास

नाबार्ड द्वारा वर्ष 2003-04 में अपने लाभ में से ₹50 करोड़ समूह निधि के साथ का जनजाति विकास कार्यक्रम की स्थापना की गई. 31 मार्च 2021 तक इसके तहत 835 परियोजनाएँ मंजूर की गई हैं जिनसे 5.33 लाख एकड़ क्षेत्र मैं फैले 5.60 लाख परिवार लाभान्वित हुए हैं. इन परियोजनाओं के तहत संचयी मंजूरियों और संवितरण की राशि क्रमश: ₹2,378 और ₹1,688 लाख है.

जलवायु-अनुकूल परियोजनाएँ

अडाप्टेशन फंड के तहत, छह परियोजनाओं और दो रेडिनेस ग्रांट के लिए संचयी रूप से 9.94 मिलियन अमेरिकी डॉलर (₹60.95 करोड़) की राशि मंजूर की गई है. नाबार्ड ने ग्रीन क्लाइमेट फंड के तहत 134.35 मिलियन अमेरिकी डॉलर (₹ 915.6 करोड़) के कुल परिव्यय वाली दो परियोजनाओं को मंजूरी दी है. वित्तीय वर्ष 2020-21 के अंत तक हमने एनएएफ़सीसी के अंतर्गत संचयी रूप से ₹847 करोड़ की 30 परियोजनाएं मंजूर की हैं. नाबार्ड ने जलवायु परिवर्तन निधि के अंतर्गत वर्ष 2020-21 के दौरान जलवायु परिवर्तन के परिणामों से निपटने, अनुकूलन और शमन के उपायों, जागरूकता निर्माण, ज्ञान को साझा करने और संधारणीय विकास के लिए की जाने वाली गतिविधियों के संवर्धन और सहयोग के लिए ₹ 0.97 करोड़ की राशि संवितरित की.

प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर अम्ब्रेला कार्यक्रम

प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर अम्ब्रेला कार्यक्रम के तहत संचयी रूप से देश के 10 प्रमुख प्राकृतिक संसाधन प्रबंध क्षेत्रों के लिए 334 परियोजनाएँ मंजूर की गई हैं जिनके लिए ₹45.38 करोड़ की अनुदान सहायता सहित ₹738.55 करोड़ की वित्तीय सहायता मंजूर की गई है. 31 मार्च 2021 तक ₹31.54 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ संचयी संवितरण की राशि ₹577.22 करोड़ थी.

वित्तीय समावेशन

बैंकिंग सेवाओं के लिए मांग उत्पन्न करने तथा आधार स्तर पर पर भुगतान/ स्वीकरण की आधारभूत संरचनाओं की स्थापना के फलस्वरूप 31 मार्च 2021 तक वित्तीय समावेशन निधि (एफ़आईएफ़) के तहत कार्यान्वित विभिन्न योजनाओं के लिए संचयी मंजूरियों की राशि ₹4,592.81 करोड़ तथा संवितरण की राशि ₹2,527.67 करोड़ थी. वित्तीय समावेशन के अंतर्गत मांग और पूर्ति में अंतर को पूरा करने के उद्देश्य से क्षेत्रीय भिन्नताओं को दूर करने तथा पूरे देश में समुचित और समावेशी वित्तीय समावेशन हासिल करने के लिए 2019 से एक विभेदीकृत रणनीति अपनाई गई. इसके तहत 358 विशेष फोकस वाले जिलों में 90% की बढ़ी हुई दर से अनुदान सहायता उपलब्ध कराई गई. इन विशेष फोकस जिलों में आकांक्षी जिले, वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिले, ऋण की कमी वाले जिले, लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह तथा पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में स्थित जिले शामिल हैं.

सूक्ष्म वित्त क्षेत्र

नाबार्ड ने 1992 में स्वयं सहायता समूह-बैंक सहबद्धता कार्यक्रम (एसएचजी-बीएलपी) शुरू किया था. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार इसमें लगभग 112.23 लाख स्वयं सहायता समूह और देश के लगभग 13.5 करोड़ ग्रामीण परिवारों का सशक्तीकरण किया गया. लगभग 28.87 लाख समूहों ने 2020-21 के दौरान विभिन्न बैंकों से ₹58070 करोड़ की ऋण सहायता प्राप्त की जिससे प्रति समूह औसत ऋण ₹2.01 लाख हो गया है. 2020-21 के दौरान बैंकों द्वारा 41.30 लाख संयुक्त देयता समूहों का संवर्धन और वित्तपोषण किया गया.

ई-शक्ति

ई-शक्ति परियोजना स्वयं सहायता समूहों को डिजिटाइज़ करने के उद्देश्य से 15 मार्च 2015 को 02 जिलों में प्रायोगिक रूप से शुरू की गई. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार 12.33 लाख स्वयं सहायता समूहों से संबंधित आंकड़ों को ई-शक्ति पोर्टल पर अपलोड किया गया जिसमें 281 जिलों के 1.67 लाख गांवों के 140.91 लाख सदस्य शामिल हैं. इस परियोजना ने पोर्टल में इन बिल्ट ग्रेडिंग व्यवस्था के आधार पर बैंकरों को स्वयं सहायता समूहों को ऋण प्रदान करने में सहायता प्रदान की. 31 मार्च 2021 तक इस परियोजना के कारण बैंकों से सहबद्ध समूह में 4.68 लाख (38% समूह) से बढ़कर 6.49 लाख (53% समूह) हो गए. समूहों के सदस्यों को स्थानीय भाषा (10 भाषाएँ) में बैंकिंग-लेनदेन से संबंधित एसएमएस प्राप्त होने के कारण उनका आत्मविश्वास बढ़ा और महिलाओं का सशक्तीकरण हुआ.

एसएचजी आधारित आजीविका सहयोग

सूक्ष्म उद्यमिता आंदोलन को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से नाबार्ड ने दो कौशल निर्माण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों नामतः सूक्ष्म उद्यम विकास कार्यक्रम (एमईडीपी) और आजीविका और उद्यम विकास कार्यक्रम (एलईडीपी) का शुभारंभ किया. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार वर्ष 2006 से 18434 एमईडीपी के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों के 5.22 लाख सदस्यों को प्रशिक्षित किया जा चुका है और कुल रु. 35 करोड़ की अनुदान सहायता मंजूर की गई. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार 1284 एलईडीपी के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों के 1.36 लाख से अधिक सदस्यों को ₹63 करोड़ की अनुदान की मंजूरी से सहायता प्रदान की गई.

कौशल विकास

भारत सरकार के लक्ष्य के अनुरूप, नाबार्ड ने मांग और परिणाम आधारित कार्यक्रमों के जरिए विभिन्न स्टेकहोल्डरों के माध्यम से ग्रामीण भारत में कौशल की कमी को पूरा करने के लिए एक संरचित दृष्टिकोण विकसित किया है ताकि इन क्षेत्रों में रोजगार/ स्वरोजगार के अवसर सृजित किए जा सकें. नाबार्ड ने अब तक ₹174 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 35,557 कार्यक्रमों के जरिए 9.58 लाख ग्रामीण युवाओं के प्रशिक्षण हेतु सहायता उपलब्ध कराई है जिससे उन्हें रोजगार/ स्वरोजगार उपलब्ध कराया जा सके. वर्ष 2020-21 के दौरान नाबार्ड ने ₹20 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 679 कौशल विकास कार्यक्रमों के जरिए 31,890 लाख ग्रामीण युवाओं का कौशल विकास किया. 2020-21 के दौरान कोविड-19 के संकट के समय शहरों से गावों की ओर लौटने वाले प्रवासियों के रोजगार की समस्या का समाधान करने के लिए विभिन्न प्रयास किए गए. उत्तर प्रदेश (रायबरेली, गोरखपुर, मिर्ज़ापुर, महाराजगंज और इलाहाबाद), बिहार (मुजफ्फरपुर, वैशाली, रोहतास और गया) और झारखंड (हजारीबाग) में “शहरों से गावों में लौटे 10,000 प्रवासियों के लिए रैपिड रिस्किलिंग और त्वरित रोजगार प्रदान करने की व्यापक परियोजना” के लिए सहायता प्रदान की गई. नाबार्ड ने ग्रामीण युवाओं को मेकट्रोनिक्स, आर्क वेल्डिंग, रेफ्रीजरेशन आदि नए युग के कौशल में क्षमता निर्माण के लिए एनएसडीसी से सम्बद्ध प्रशिक्षण संस्थाओं के साथ सहयोग किया. कोविड-19 महामारी के दौरान व्यवसाय और आजीविका के अवसरों को ध्यान में रखते हुए नाबार्ड ने कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करने की मांग को समझते हुए ग्रामीण महिलाओं को फेस मास्क और पीपीई किट के निर्माण का प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए सहायता की.

कृषीतर उत्पादक संगठन (ओएफ़पीओ)

दस्तकार/ बुनकर/ कृषीतर गतिविधि क्लस्टरों का उन्नयन करने और उन्हें एक औपचारिक रजिस्टर्ड इकाई का रूप देने के साथ-साथ क्षमता निर्माण, व्यवसाय आयोजना, बाजार लिंकेज, डिजाइन विकास आदि के जरिए उत्पादकों को सामूहिक व्यवसाय शुरू करने में सहायता प्रदान करने के उद्देश्य के साथ वर्ष 2016-17 में कृषीतर उत्पादक संगठन (ओएफ़पीओ) के गठन और संवर्धन की योजना शुरू की गई थी. इस योजना के तहत, पात्र इकाई को उत्पादक संगठन संवर्धन संस्था के रूप में कार्य करने के लिए सहायता प्रदान की जाती है जिससे कृषीतर क्षेत्र के उत्पादक सामूहिक रूप से व्यवसायिक गतिविधियां शुरू कर सकें ताकि उन्हें संख्या बल का लाभ मिले, उनकी मोल-भाव की शक्ति बढ़े तथा उन्हें व्यवसाय के लिए सुविधाएं और अवसर प्राप्त हों.

31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार 20 राज्यों में 40 ओएफ़पीओ को ₹17.4 करोड़ की अनुदान सहायता उपलब्ध कराई गई जिससे 14,043 लाभार्थी लाभान्वित हुए. इनमें से 27 ओएफपीओ कंपनी/ सोसाइटी अधिनियम के तहत पंजीकृत हैं तथा समूहन, विपणन और निविष्टियों के संवितरण के माध्यम से व्यावसायिक गतिविधियों में संलग्न हैं. आठ ओएफपीओ महिलाओं के ओएफ़पीओ हैं और आशा है कि इनसे सीधे तौर पर 3325 महिला बुनकरों / कारीगरों का सशक्तीकरण किया जा सकेगा.

विपणन पहलें

कृषि और कृषीतर क्षेत्र के ग्रामीण उत्पादकों को अपने उत्पादों के प्रभावी विपणन हेतु सहायता उपलब्ध कराने के लिए नाबार्ड ग्रामीण हाट/ मंडियों की स्थापना तथा दस्तकारों द्वारा राष्ट्रीय/ क्षेत्रीय स्तर पर प्रदर्शनियों और मेलों में भागीदारी के लिए सहयोग देता रहा है.

ग्रामीण हाट

ग्रामीण मार्टों के माध्यम से, ग्रामीण समुदायों को अपने कृषि और कृषीतर उत्पादों को खरीदने और बेचने के लिए बाज़ारों तक पहुँचने में सहायता मिलती है. ग्रामीण हाट, उत्पादक संगठनों, ग्राम वाटरशेड और जनजाति विकास समितियों के लिए बाज़ारों तक पहुँचने के एक प्रभावी माध्यम के रूप में उभरे हैं. नाबार्ड ग्रामीण हाटों को आधारभूत संरचना के निर्माण के लिए सहायता प्रदान करना है जिसमें प्लैटफ़ार्म, छत, पेयजल सुविधा, स्वच्छता आदि सुविधाएँ शामिल हैं. वर्ष 2020-21 के दौरान ₹7.6 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 58 ग्रामीण हाटों को मंजूरी प्रदान की गई. 31 मार्च 2021 की स्थिति के अनुसार ₹54.23 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 636 ग्रामीण हाटों को मंजूरी प्रदान की गई.

ग्रामीण मार्ट

ग्रामीण मार्ट उत्पादक समुदायों के बीच उद्यमशीलता को बढ़ावा देने और ग्रामीण समुदाय, विशेषकर महिलाओं और कमजोर वर्गों, द्वारा निर्मित घरेलू उत्पादों के लिए बाजार लिंक प्रदान करने में मदद करते हैं. इससे जमीनी स्तर पर आय और रोजगार सृजन में मदद मिलती है. वर्ष 2020-21 के दौरान, ₹7.6 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 155 ग्रामीण मार्टों को मंजूरी प्रदान की गई. 31 मार्च 2021 तक, 1085 ग्रामीण मार्टों को ₹23.2 करोड़ की अनुदान सहायता प्रदान की गई.

प्रदर्शनी/ मेले

प्रदर्शनियां और मेले कारीगरों को एक सीधा विपणन मंच प्रदान करते हैं जिसके साथ उन्हें बाजार की सूचनाओं और ग्राहकों की पसंद जी जानकारी मिलती है और थोक खरीद के आदेश प्राप्त होते हैं. इन मेलों में भाग लेने से कारीगरों का सशक्तीकरण होता है जिससे वे व्यवसाय में आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकते हैं.

कोविड-19 महामारी और उसके बाद लगाए गए लॉकडाउन और सरकारी प्रतिबंधों ने प्रदर्शनियों और मेलों के आयोजन को प्रभावित किया. स्थिति बेहतर होने के बाद 09 क्षेत्रीय कार्यालयों ने ₹2.74 करोड़ की अनुदान सहायता के साथ 10 प्रदर्शनियों का आयोजन किया.

प्रदर्शनियों के दौरान सहभागी उत्पादकों के सशक्तीकरण के लिए विभिन्न पहलें की जाती हैं, जैसे क्रेता-विक्रेता बैठक का आयोजन, ब्रांडिंग, विपणन, पैकेजिंग, प्रभावी संप्रेषण और उद्यमिता विकास पर वित्तीय समावेशन और डिजिटल भुगतान प्रणालियों के संवर्धन पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों और कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है.

कृषि व्यवसाय उद्भवन केंद्र (एबीआईसी)

कृषि उद्यमियों के लिए एक सहायक वातावरण और कृषि उद्यमियों के विकास के लिए नाबार्ड ने 2017-18 में कृषि व्यवसाय उद्भवन केंद्र की स्थापना हेतु सहायता देना शुरू किया था. इस नीति में एबीआईसी की स्थापना करने और पांच वर्ष की अवधि हेतु उनके कार्यों के लिए पात्र परिचालन व्यय को के लिए कृषि विश्वविद्यालय/ इसी तरह के अन्य संस्थान (मेजबान संस्थान) जैसे पात्र संस्थानों को सहायता प्रदान करने की परिकल्पना की गई है. यह अधिक कृषि स्टार्टअप के संवर्धन, कृषि / ग्रामीण उद्यमियों और उद्यमों को बढ़ावा देने की दिशा में एक कदम है. स्वतंत्र कृषि व्यवसाय उद्भवन केंद्र स्थापित करने के लिए अब तक जिन संस्थानों को सहायता दी गई है उनका विवरण नीचे दिया जा रहा है:

, हिसार, हरियाणा.

 

3 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर, पश्चिम बंगाल
4 ए-आईडीईए, राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी, हैदराबाद, तेलंगाणा.
5 राजमाता विजयराजे सिंधिया कृषि विश्व विद्यालय, ग्वालियर, मध्य प्रदेश
6 प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाणा राज्य कृषि विश्वविद्यालय, हैदराबाद, तेलंगाणा
7 सरदार कृषिनगर दंतिवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय, बनासकांठा, गुजरात

सहायता प्राप्त एबीआईसी सिंचाई, बीज उत्पादन, जैव-कीटनाशक, जैव उर्वरक, प्रिसीज़न फ़ार्मिंग, कृषि-प्रसंस्करण, विपणन, जैव ईंधन, पेयजल, स्वच्छता, ऊर्जा, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि के क्षेत्र में कार्य करने वाले स्टार्ट-अप्स/ कृषि उद्यमों/ उद्यमियों/ किसानों/ किसान उत्पादक संगठनों आदि का विकास। पोषण करेंगे. ये एबीआईसी कृषि-स्टार्टअप और कृषि-उद्यमियों को व्यवहार्य वाणिज्यिक संस्थाओं में विकसित करने के लिए उन्हें व्यवसाय सहायता सेवाएँ और संसाधन, विपणन और वित्त प्रदान करेंगे जिसके परिणामस्वरूप किसानों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ होंगे.

उत्प्रेरक पूंजी निधि की स्थापना

भारत में, कृषि आधारित अधिकांश स्टार्ट-अप को निधीयन स्रोतों के मामले में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. नवोन्मेषी उद्यम के साथ-साथ शुरुआती चरण की तकनीक/ अभिनव उत्पाद/ प्रक्रिया नवोन्मेष/ आपूर्ति श्रृंखला नवोन्मेष/ व्यवसाय मॉडल नवोन्मेष रखने वाले इन स्टार्ट-अप्स को सही समय पर वित्तीय सहायता पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है.

कृषि स्टार्ट-अप की सहायता करने के लिए नाबार्ड ने "ग्रामीण और कृषि स्टार्ट-अप की सहायता हेतु उत्प्रेरक पूँजी निधि" का सृजन किया है. इस योजना का उद्देश्य है स्टार्टअप्स की शुरुआत के उस चरण (वैली ऑफ डेथ स्टेज) में उनकी सहायता करना जब उनका प्रचालन तो शुरू हो चुका हो, किन्तु कोई आय न हो रही हो. इससे स्टार्टअप इकाइयों को व्यवहार्य बनाने में मदद मिलेगी.

जीआई उत्पादों का संवर्धन

भौगोलिक संकेतक (जीआई) एक बौद्धिक संपदा अधिकार है जो एक विशिष्ट भौगोलिक स्थान से उत्पन्न होने वाले उत्पाद की पहचान करता है. यह उत्पाद विशिष्ट प्रकृति, गुणवत्ता और विशेषताओं से युक्त होता है जो उस स्थान से जुड़ी होती हैं. जीआई अधिकार अपने धारक को किसी तीसरे पक्ष द्वारा इसके उपयोग को रोकने की अनुमति देता है जिसका उत्पाद लागू मानकों के अनुरूप न हो.

नाबार्ड ने 72 उत्पादों के जीआई पंजीकरण के लिए सहायता दी है. नाबार्ड ने मट्टू गुल्ला बैंगन (जीआई उत्पाद) के विपणन के लिए एक एफपीओ का गठन करवाया है जिसके परिणामस्वरूप शहरी बाजारों में प्रत्यक्ष बिक्री के साथ-साथ इसकी कुल बिक्री भी बढ़ी है. नाबार्ड ने 10 जीआई उत्पादों के लिए तीन अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में विशिष्ट उत्पाद सूची तैयार करने के लिए भी वित्तीय सहायता प्रदान की है. दीनदयाल हस्तकला संकुल, वाराणसी में जीआई उत्पादों हेतु विपणन केंद्र की स्थापना के लिए भी वित्तीय सहायता प्रदान की गई है.

ऋण सहबद्ध पूँजी सब्सिडी योजना (सीएलसीएसएस)

नाबार्ड सूक्ष्म और लघु उद्यमों के प्रौद्योगिकी उन्नयन के लिए भारत सरकार की 'ऋण सहबद्ध पूँजी सब्सिडी योजना (सीएलसीएसएस)' को लागू करने वाली नोडल एजेंसियों में से एक है. इस योजना के तहत निर्दिष्ट उत्पादों/ उप-क्षेत्रों में सूक्ष्म और लघु इकाइयों में प्रमाणित और उन्नत प्रौद्योगिकियों के प्रयोग हेतु सहायता दी जाती है. नाबार्ड ग्रामीण क्षेत्रों से आवेदन के लिए नोडल एजेंसी है.

स्टैंड अप इंडिया योजना

5 अप्रैल 2016 को भारत सरकार द्वारा शुरू की गई स्टैंड अप इंडिया योजना उद्यम की स्थापना के लिए प्रति बैंक शाखा कम से कम एक अनुसूचित जाति या जनजाति उधारकर्ता और कम से कम एक महिला उधारकर्ता को ₹10.00 लाख से लेकर ₹1.00 करोड़ तक के ऋण की सुविधा प्रदान करती है. इस सिलसिले में नाबार्ड ने जिला स्तर पर संपर्क केंद्र के रूप में कार्य करना जारी रखा जिसके अंतर्गत संवितरण पूर्व और संवितरण पश्चात् मार्गदर्शन दिया जाता है, सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा किया जाता है, कार्यक्रमों की समीक्षा की जाती है, समस्याओं का समाधान किया जाता है और संभावित उधारकर्ताओं को मार्गदर्शन दिया जाता है. 31 मार्च 2021 तक, देश भर के 507 जिलों में कुल 2,437 मार्गदर्शन कार्यक्रम आयोजित किए गए जिनमें 1,06,357 प्रतिभागी शामिल हुए.