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कारपोरेट आयोजना विभाग
1.  प्रारंभ 
 
नाबार्ड का कारपोरेट आयोजना विभाग (सीपीडी) विभिन्न कार्य विभागों के बीच समन्वयन का महत्वपूर्ण कार्य करता है. इस विभाग के माध्यम से नाबार्ड नीतिगत मामलों में भारत सरकार के साथ और विकासात्मक परियोजनाओं के लिए निधि प्राप्त करने के लिए विभिन्न अंतरराष्ट्रीय निकायों से संवाद स्थापित करता है. विभाग द्वारा किए गए विश्लेषण से वार्षिक ऋण आयोजना तैयार करने तथा बजट संबंधी कार्रवार्इ करने के अलावा संस्था को सरकार के समक्ष नीतिगत मामलों में अपना बृहत दृष्टिकोण प्रस्तुत करने में सहायता मिलती है. विभाग का प्रमुख उद्देश्य जोखिम को न्यूनतम और शून्य करते हुए संस्था के निर्णय लेने की क्षमता की गुणवत्ता में सुधार करना है.
 
2.  विभाग के प्रमुख कार्य
 
  • नाबार्ड की वार्षिक कार्य योजना तैयार करना:
विभाग, नाबार्ड की वार्षिक कार्य योजना तैयार करने के लिए अन्य विभागों के साथ समन्वयन का कार्य करता है.
 
  • भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, राज्य सरकारों और नीति आयोग के साथ संपर्क करना:
कारपोरेट आयोजना विभाग कृषि ऋण, ग्रामीण विकास और अन्य संबंधित मामलों पर भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, नीति आयोग और अन्य महत्वपूर्ण स्टेकहोल्डरों के साथ चर्चा करता है और समन्वय करता है. इससे नीति निर्माण में आधारभूत और प्रबंध सूचना प्रणाली से समर्थित सहायता प्राप्त होती है.
 
  • भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ संवाद स्थापित करना:
कारपोरेट आयोजना विभाग कृषि और ग्रामीण विकास, ऋण आयोजना, अनुप्रवर्तन और परिचालनात्मक मामलों के निपटान के संबंध में भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ संपर्क करता है. यह क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और ग्रामीण सहकारी बैंकों की पर्यवेक्षकीय प्रक्रिया और सहयोग के संबंध में भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ समन्वय करता है.
 
  • अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसियों के साथ बातचीत करना:
कारपोरेट आयोजना विभाग, कृषि और ग्रामीण विकास की नवोन्मेषी परियोजनाओं को अंतिम रूप प्रदान करने के लिए विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ बातचीत करता है.
 
  • सूचना प्रदान करना:
संसद और संसदीय समितियों द्वारा उठाए गए विषयों पर सूचना प्रदान करने के लिए कारपोरेट आयोजना विभाग नोडल एजेंसी है. विभाग, सांसदों द्वारा कृषि और सहायक क्षेत्रों तथा ग्रामीण वित्तीय संस्थाओं के बारे में पूछे गए प्रश्नों का नाबार्ड की ओर से उत्तर देता है.
 
  • ऋण आयोजना और अनुप्रवर्तन:
यह विभाग देश के प्रत्येक जिले के लिए संभाव्यतायुक्त ऋण योजना तैयार करने के लिए नीतिगत दिशानिर्देश तैयार करता है. यह योजनाएं बैंकों द्वारा वार्षिक रूप से तैयार की जाने वाली ऋण आयोजनाओं का आधार बनती हैं. 
 
  • स्टेट फोकस पेपर (एसएफपी) तैयार करने के लिए दिशानिर्देश जारी करना:
कारपोरेट आयोजना विभाग स्टेट फोकस पेपर के लिए दिशानिर्देश जारी करता है. प्रत्येक राज्य में वार्षिक रूप से आधारभूत सुविधाओं और ऋण के प्रवाह को सुचारु बनाने के लिए लिंकेज सहायता आवश्यकताओं की पहचान करने के लिए स्टेट फोकस पेपर तैयार किया जाता है.
 
  • जिला विकास प्रबंधक (डीडीएम) और जिला विकास अधिकारी (डीडीओ) के कार्यों का समन्वय करना:
कारपोरेट आयोजना विभाग देशभर के जिला विकास प्रबंधकों और जिला विकास अधिकारियों (डीडीओ) को ऋण आयोजना, अनुप्रवर्तन और समन्वयन के क्षेत्र में मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करता है.
 
  • पूर्वोत्तर के राज्यों के ऋण और विकास से संबंधित मुद्दों का निपटान :
कारपोरेट आयोजना विभाग देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र के ऋण आयोजना, अनुप्रवर्तन और विकासात्मक मामलों पर भी कार्य करता है.
 
  • बैंकों के साथ आवधिक बैठकें आयोजित करना:
कारपोरेट आयोजना विभाग, कृषि ऋण और कृषि ऋण में वृद्धि के लिए आवश्यक पहलों पर विचार-विमर्श करने के लिए बैंकों के प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र के प्रमुखों के साथ आवधिक रूप से बैठकें आयोजित करता है.
 
  • कृषि क्षेत्र को दिए जाने वाले ऋण के प्रवाह का अनुप्रवर्तन और समीक्षा:
कारपोरेट आयोजना विभाग, विभिन्न वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिए गए आधार स्तरीय कृषि ऋण से संबंधित आंकड़ों का अनुप्रवर्तन करता है और उसका मिलान करता है. कारपोरेट आयोजना विभाग  भारत सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक आदि को यह जानकारी उपलब्ध कराता है.
 
  • परिवेदना और शिकायतों का निवारण:
कारपोरेट आयोजना विभाग ग्राहक बैंकों के विरुद्ध भारत सरकार द्वारा भेजी गर्इ या बैंकों से सीधे प्राप्त परिवेदनाओं / शिकायतों का निवारण करता है.
 
  • सेमिनारों का आयोजन: 
कारपोरेट आयोजना विभाग प्रकृति और ग्रामीण विकास से संबंधित मामलों पर राष्ट्रीय सेमिनारों का आयोजन करता है.
 
3. बाहरी एजेंसियों के साथ परियोजनाएं:
 
A. आरंभ – बाहरी सहायता प्राप्त परियोजनाएं
 
बाहरी सहायता प्राप्त परियोजनाएं नाबार्ड और केएफडब्ल्यू, जीआर्इजेड़ जैसी द्विपक्षीय विकास एजेंसियों और इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकन्स्ट्रक्शन एण्ड डेवलपमेंट (आर्इबीआरडी), एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) आदि जैसी बहु-पक्षीय विकास एजेंसियों द्वारा परिकल्पित हैं, उनकी रूपरेखा बनार्इ गर्इ है, उनका कार्यान्वयन तथा अनुप्रवर्तन किया जाता है. चूंकि इस प्रकार की एजेंसियों की विशेषज्ञता और उनके अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से महत्वपूर्ण इनपुट प्राप्त होते हैं, इन परियोजनाओं से देश के अंदरूनी इलाकों में उपयोगी विकासात्मक पहलें की जाती हैं. अनुभव साझा करने के अलावा, इन परियोजनाओं से सभी साझेदारों की क्षमता में वृद्धि होती है और संस्थागत क्षमता में भी बढ़ोतरी होती है. पिछले कुछ वर्षों से नाबार्ड ने स्विस डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन, एडीबी, वर्ल्ड बैंक, र्इयू और जर्मन डेवलपमेंट कोआपरेशन के साथ काम किया है. 
 
पिछले दो दशकों से नाबार्ड केएफडब्ल्यू और जीआर्इजेड़ के सहयोग से कार्य कर रहा है. नाबार्ड, जीआर्इजेड़ और केएफडब्ल्यू जैसी बाहरी एजेंसियों से प्राप्त होने वाली सहायता का उपयोग कृषि और ग्रामीण विकास के विभिन्न क्षेत्रों में विकास माडलों की जांच के लिए करता है. विकास इस प्रकार की प्रायोगिक परियोजनओं/ माडलों/ अनुभवों के आधार पर अपने संसाधनों का उपयोग करते हुए सफल और प्रभावी प्रयासों को मुख्यधारा में लाया जाता है. इस प्रकार के सहयोगों के माध्यम से अन्य विकासशील देशों में जर्मनी और जर्मन विशेषज्ञों के अनुभव नाबार्ड को हमारे देश की आवश्यकताओं और उद्देश्यों के अनुकूलन के लिए उपलब्ध कराए गए हैं. जर्मनी, दीर्घकालिक कृषि और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण विशेषकर, मृदा संरक्षण के क्षेत्र में बहुत ही प्रगतिशील देश है जिससे हमारी आवश्यकताओं के अनुकूलन के लिए नाबार्ड को शिक्षा प्राप्त होती है. 
केएफडब्ल्यू और जीआर्इजेड़ की सहायता से वर्तमान में कार्यान्वित की जाने वाली कुछ परियोजनाओं से संबंधित विवरण नीचे दिया गया है:
 
B. कार्यान्वित की जाने वाली चालू परियोजनाएं
 
a. केएफडब्ल्यू – इंडो-जर्मन वाटरशेड विकास कार्यक्रम – राजस्थान और गुजरात 
 
अवधि: राजस्थान – दिसंबर 2006 से दिसंबर 2016 – दिसंबर 2018 तक समयावधि बढ़ाने के लिए प्रस्तावित; गुजरात – अक्तूबर 2003 से दिसंबर 2015 – जून 2018 तक समयावधि बढ़ाने के लिए प्रस्तावित 
अनुदान परिव्यय – राजस्थान – 11मिलियन यूरो = रु.82.50 करोड़ गुजरात- 9.2 मिलियन यूरो = रु. 69 करोड़ 
 
उद्देश्य: मृदा, जल और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और प्रबंधन करना, कृषि तथा वानिकी उत्पादन को स्थिर करना और उसमें वृद्धि करना और दीर्घकालिक तथा समानरूप से ग्रामीण जनता के जीवन स्तर में सुधार करना. 
 
दो परियोजनाओं के प्रमुख परिणाम
 
  • मृदा के अपकर्ष और क्षरण में कमी 
  • भू-जल तालिका में वृद्धि 
  • फसल उत्पादन, उत्पादकता और फसल सघनता में वृद्धि 
  • जिस क्षेत्र में फसल ली जा रही है उस क्षेत्र में वृद्धि 
  • विविधीकृत खेती 
  • गरीबी और पलायन में कमी  
  • ग्रामीण समुदाय के जीवन स्तर में सुधार 
 
दीर्घकालिकता: उक्त अनुभवों के आधार पर नाबार्ड देशभर में वाटरशेड परियोजनाओं का कार्यान्वयन कर रहा है. अप्रैल 2016 के अंत तक नाबार्ड अपने संसाधनों से रु.408 करोड़ के वित्तीय परिव्यय के साथ 699 परियोजनाओं का कार्यान्वयन कर रहा है. 
 
b.  केएफडब्ल्यू-आदिवासी विकास कार्यक्रम- गुजरात 
 
अवधि : मार्च 2006 से दिसंबर 2016
अनुदान परिव्यय: 7 मिलियन यूरो = 52.5 करोड़ 
 
उद्देश्य: कार्यक्रम क्षेत्र में आदिवासी परिवारों के सुरक्षित वित्तीय आधार और विविधीकृत आजीविका के माध्यम से समग्र जीवनस्तर में दीर्घकालिक सुधार करना. 
 
प्रमुख परिणाम 
 
  • मवेशियों को चरने के लिए वन पर निर्भरता कम होने के कारण वनों के प्राकृतिक पुनर्निर्माण, वृक्षों से अच्छादित क्षेत्र में परिवर्तन, वृक्षों की सघनता और जैव-विविधता में सहायता मिली;
  • भूमिहीन लोगों के पलायन में कमी दिखार्इ दी. 
  • स्वयं सहायता समूहों और वाडी टुकडियों के गठन और कार्यरत होने के कारण साहूकारों पर निर्भरता में कमी दिखार्इ दी. 
  • लाभार्थियों के पोषण संबंधी स्थिति और स्वास्थ्य में विशेष सुधार दिखार्इ दिया. 
  • वाडी लाभार्थियों के कृषीतर आस्तियों के स्वामित्व में वृद्धि हुर्इ.
  • पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान;
  • कार्यक्रम के माध्यम से प्राप्त सहयोगों से आदिवासी किसानों के आय स्तर में काफी सुधार हुआ.
 
दीर्घकालिकता: उपर्युक्त अनुभवों के आधार पर नाबार्ड पूरे देश में आदिवासी विकास परियोजनाएं कार्यान्वित करता है. अप्रैल 2016 की समाप्ति पर नाबार्ड ने अपने संसाधनों का उपयोग करते हुए और जहां भी संभव हो सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के संसाधनों/ अंशदानों का लाभ उठाते हुए रु.2401 करोड़ के वित्तीय परिव्यय के साथ 633 परियोजनाएं कार्यान्वित की. 
 
c.  केएफडब्ल्यू- प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के लिए अम्ब्रेला कार्यक्रम II 
 
अवधि : दिसंबर 2012 से दिसंबर 2017
ऋण परिव्यय: 52 मिलियन यूरो = रु.375 करोड़  
अनुदान परिव्यय: 2 मिलियन यूरो = रु.14.60 करोड़ 
 
उद्देश्य: सार्वजनिक प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन संबंधी नीतियों में सर्वांगीण, सहभागितामूलक और वित्तीय रूप से धारणीय आजीविका से संबंधित समाधान में योगदान के लिए तथा दीर्घकालिक प्राकृतिक संसाधन उपयोग और प्रबंधन पर आधारित ग्रामीण निर्धनों की आजीविका में सुधार के लिए वित्तीय लिखत.
 
  • यूपीएनआरएम के अंतर्गत सहायता प्राप्त परियोजनाओं की प्रभाव निर्धारण अध्ययन की कुछ महत्वपूर्ण बातें निम्नानुसार हैं: 
  • निर्धनों के लिए: यूपीएनआरएम के अंतर्गत कार्यान्वित सभी प्रयासों में आय में तीन गुना (175%) वृद्धि हुर्इ. 
  • पर्यावरण की दृष्टि से दीर्घकालिक: परियोजना के माध्यम से किए गए प्रयासों से रासायनिक उर्वरकों को बदल दिया गया और 3000 हेक्टे. जमीन पर ग्रीन फार्मिंग को प्रोत्साहित किया गया. 
  • महिलाओं के अनुकूल और समावेशक: सभी परियोजना प्रतिभागियों में से 45% महिलाएं हैं, लगभग 80% अनुसूचित जाति और जनजाति तथा पिछड़ी जातियों से हैं. 
  • पर्यावरण के अनुकूल: स्वच्छ विकास प्रणाली (सीडीएम) के रूप में कृषि वानिकी परियोजना को पंजीकृत किया गया और इससे प्रति वर्ष 33,400 टन कार्बन डायऑक्साइड कम होगा. 
d.  केएफडब्ल्यू- जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और मृदा संरक्षण के लिए वाटरशेड विकास का एकीकरण – केएफडब्ल्यू 
 
परियोजना अवधि: 2016-2019
अनुदान: 10 मिलियन यूरो = रु.73 करोड़  
 
उद्देश्य : ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधन आधार में सुधार करना, जलवायु परिवर्तन की जोखिम को कम से कम रखना, उत्पादकता तथा आय में वृद्धि करना. परियोजना से यह अपेक्षित है कि पांच राज्यों में (आंध्र प्रदेश, तेलंगाणा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान) 123 वाटरशेडों में स्थिरीकरण के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के प्रति अतिसंवेदनशीलता को कम करना, मृदा और जल संसाधनों में वृद्धि और उनका दीर्घकालिक उपयोग किया जाए.  
 
e.    जीआर्इजेड़- यूपीएनआरएम II 
 
अवधि: जून 2015 से जून 2017 तक 
परिव्यय: 3 मिलियन यूरो = रु 21.6 करोड़ 
 
उद्देश्य: प्राकृतिक संसाधनों के दीर्घकालिक उपयोग और प्रबंधन के आधार पर ग्रामीण निर्धनों की आजीविका में सुधार के लिए सार्वजनिक प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन नीतियों तथा वित्तीय लिखतों में सर्वांगीण, सहभागितामूलक और वित्तीय रूप से धारणीय आजीविका संबंधी समाधान में योगदान करना. यूपीएनआरएम से ऋण आधारित सहभागितामूलक और समुदायोन्मुख प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन आधारित व्यवसाय मॉडलों और ग्रामीण समुदायों की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मजबूत क्षमता निर्माण सहायता की व्यवहार्यता की जांच की जाती है. कार्यक्रम, नाबार्ड द्वारा चैनल भागीदारों की क्षमता के विकास और यूपीएनआरएम ऋण कार्यक्रम के प्रबंधन को सहायता प्रदान करता है. 
 
f.    जीआर्इजेड़- भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए मृदा संरक्षण और पुनर्वास 
 
अवधि: जून 2015 से दिसंबर 2017 तक 
परिव्यय: 5 मिलियन यूरो = रु. 36.50 करोड़  
 
उद्देश्य: चयनित स्थानों पर मृदा संरक्षण, खराब जमीन का पुनरूद्धार और मृदा की स्थिति में सुधार के लिए दीर्घकालिक और समावेशी दृष्टिकोण अपनाना जिससे फसल उत्पादन में वृद्धि होगी. परियोजना का कार्यान्वयन महाराष्ट्र में वाटरशेड के माध्यम से किया जाएगा और मध्य प्रदेश में किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के माध्यम से किया जाएगा. 
 
4. हाल ही में समाप्त हुए जीआर्इजेड़-ग्रामीण वित्तीय संस्थाएं कार्यक्रम:
 
उद्देश्य: अल्पावधि सहकारी ऋण संरचना (एसटीसीसीएस), सूक्ष्म वित्त संस्थाएं और बैंकों को अपने ग्राहकों को दीर्घकालिक तथा मांग उन्मुख वित्तीय सेवाएं देने के लिए तैयार करना. 
 
जीआर्इजेड़ से प्राप्त एक स्वतंत्र परियोजना मूल्यांकन रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि कुछ मापदंडों (प्रासंगिकता और प्रभावोत्पादकता) पर प्राप्त रेटिंग अत्यधिक सफल थी तथा कुछ मापदंडों (प्रभाव, कार्यक्षमता, दीर्घकालिकता) पर सफल थी. रिपोर्ट के उद्धरण नीचे दिए गए हैं: 
 
  •  प्रासंगिकता – अत्यधिक सफल (अंक 14/16) – परियोजना के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय सेवाएं प्रदान करने में आने वाली प्रमुख बाधाओं का समाधान करती है और इसलिए प्रासंगिक है तथा सरकारी के प्रयासों के अनुरूप है.”
  •  प्रभावोत्पादकता – बहुत सफल (अंक 15/16) - “परियोजना के माध्यम से संबंधितों को प्रशिक्षण और उनकी वित्तीय क्षमता में वृद्धि के लिए व्यापक सहायता प्रदान की गर्इ, संस्था के सुदृढ़ीकरण के लिए सहायता प्रदान की गर्इ और नवोन्मेषी उत्पादों और डिलीवरी चैनलों की शुरुआत की गर्इ.”
  •  प्रभाव  – सफल (अंक 12/16) – “सहायता प्राप्त स्थानों पर काफी प्रभाव रहा, मांग-उन्मुख वित्तीय सेवाओं के साथ जनता को सफलतापूर्वक जोड़ना और ग्राम स्तरीय बैंकिंग कॉरस्पॉडेंट की सेवाओं के माध्यम से भौगोलिक पहुंच बढ़ाना.
  •  कार्यक्षमता – सफल (अंक 12/16) - “चूंकि परियोजना में वैकल्पिक डिलीवरी चैनलों और उत्पादों की जांच के लिए छोटी प्रायोगिक परियोजनाएं विकसित करने और राष्ट्रीय स्तर पर अनुकूल दृष्टिकोणों के माध्यम से बड़े पैमाने पर किफायत प्राप्त करने पर बल दिया गया, परियोजना में संसाधनों को दक्षता पूर्वक उपयोग किया गया.”
  •  दीर्घकालिकता – सफल (अंक12/16) - “मध्यावधि में बहुत से सुधार दीर्घकालिक हैं.”
  महत्वपूर्ण परिणाम :
 
  • प्रमाणन, मानकीकरण और प्रमाणीकरण के माध्यम से सहकारी ऋण संरचना संस्थाओं में मानव संसाधनों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सहकारी संस्थाओं में व्यावसायिक उत्कृष्टता केंद्र (सी-पेक) की स्थापना. 
  • स्वयं सहायता समूहों के विकास के लिए बचतों और प्रेषण से संबंधित नया उत्पाद;
  • बैंक सखियों (बैंकिंग कॉरस्पॉडेंट के रूप में स्वयं सहायता समूह सदस्य) के माध्यम से बैंकों (क्षेग्रा बैंकों) की पहुंच में सुधार करना. 
संपर्क:
 
श्री एम के मुदगल
मुख्य महाप्रबंधक 
दूसरी मंजिल, ‘सी’ विंग
सी-24, 'जी' ब्लॉक
बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स, बांद्रा (पूर्व) 
मुंबर्इ 400 051 
टेलि.: (91) 022-26530106, (91) 022-26539199
फैक्स: (91) 022-26530096 
र्इ-मेल: cpd@nabard.org