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कृषि क्षेत्र

कृषि क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रथाओं का संवर्धन हमारे अधिदेश में ही बद्धमूल है और हम किसी भी ऐसे दिलचस्प आयडिया को सहयोग देने के लिए तत्पर रहते हैं जिसमें बड़े पैमाने पर अपनाए जाने की सम्भावना हो. इन सहयोगों में शामिल हैं आधार स्तरीय ऋण प्रवाह की गति को तेज करना, कृषि उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि करना, क्षमता निर्माण करना, आजीविका को बढ़ावा देना आदि. हमने ऐसे अनेक कार्यक्रम तैयार किए हैं जो कृषि क्षेत्र की विभिन्न समस्याओं का समाधान करते हैं, जैसे किसान क्रेडिट कार्ड योजना, सहभागितामूलक वाटरशेड विकास, प्रौद्योगिकी अंतरण, प्रौद्योगिकी के अंगीकरण के लिए क्षमता निर्माण, किसान क्लब कार्यक्रम आदि.

हम संभवत: देश की ऐसी एकमात्र संस्था हैं जिसने क्षेत्र-विशिष्ट/ विषय-विशिष्ट विकास आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए विशिष्ट निधियाँ सृजित करने की परंपरा स्थापित की है और उसे जारी रखे हुए हैं. जहाँ कृषि क्षेत्र संवर्धन निधि (एफएसपीएफ) कृषि-उत्पादन में वृद्धि के लिए प्रौद्योगिकी अंतरण को सुविधाजनक बनाती है, वहीं वाटरशेड विकास निधि (डब्ल्यूडीएफ) और जनजातीय विकास निधि (टीडीएफ) संधारणीय आजीविका पर बल देते हुए प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के अंतर्गत प्रमुख गतिविधियों के लिए सहायता प्रदान करती है.

कृषि क्षेत्र विकास विभाग (एफएसडीडी)

एफएसडीडी पूर्व विकास नीति विभाग- कृषि क्षेत्र के विभाजन के बाद अस्तित्व में आया. विभाग के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं – प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए कृषि क्षेत्र की विभिन्न पहलों का कार्यान्वयन करना; ग्रामीण वित्तीय संस्थाओं द्वारा आधार-स्तरीय ऋण प्रवाह की गति तेज करने के लिए किसानों में ऋण खपत की क्षमता सृजित करना; आधुनिक कृषि पद्धतियों, खेती की उत्कृष्ट प्रथाओं और किसानों के कौशल निर्माण को बढ़ावा देकर कृषि उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि करना; ग्रामीण रोजगार का सृजन करना; ग्रामीण गरीबों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना; और कृषक समूहों का संपोषण करते हुए और उन्हें सहयोग देते हुए किसानों की आय में वृद्धि करना.

विभाग को जो अन्य दायित्व सौंपे गए हैं, उनमें से कुछ हैं – विभिन्न नीतगत पहलों और अन्य प्रयासों के माध्यम से गत कालावधि में जलवायु सम्बन्धी समस्याओं के निवारण के लिए अपेक्षित जो उपर्युक्त कार्यक्रम विकसित हुए हैं उनका प्रभावी कार्यान्वयन करना, जोखिम शमन के उपाय करना, जलवायु-स्मार्ट/ उच्च तकनीक वाली खेती तथा फसल विविधीकरण का संवर्धन करना और किसानों की आय बढ़ाना, और कृषक समूहों का संवर्धन और संपोषण करना. इसके अतिरिक्त, कार्यान्वयन के दौरान सामने आई परिचालनगत समस्याओं का निवारण करना, कार्यक्रमों का अनुप्रवर्तन करना, बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन के लिए सफल मॉडलों/ पद्धतियों का दस्तावेजीकरण करना और नीति निर्माण/ सुधार के लिए प्रतिसूचना (फीडबैक) उपलब्ध कराना भी विभाग को सौंपी गई जिम्मेदारियों में शामिल हैं. एफएसडीडी के कार्यों के निम्नलिखित वर्टिकल हैं जिनका विवरण निम्नानुसार है:

अ. कृषि क्षेत्र संवर्धन निधि (एफएसपीएफ)

पूर्व में स्थापित दो निधियों, नामतः कृषि नवोन्मेष और संवर्धन निधि (एफआईपीएफ) तथा कृषक प्रौद्योगिकी अंतरण निधि (एफटीटीएफ) का विलय कर 26 जुलाई 2014 को कृषि क्षेत्र संवर्धन निधि (एफएसपीएफ) स्थापित की गई जिसका उद्देश्य कृषि और अनुषंगी क्षेत्रों में उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने और किसानों की आय में वृद्धि के लिए नवोन्मेषी और साध्य संकल्पनाओं/ परियोजनाओं तथा प्रौद्योगिकी अंतरण के संवर्धन पर ध्यान केन्द्रित करना है.

अतिरिक्त जानकारी

आ. वाटरशेड विकास कार्यक्रम

केन्द्रीय वित्त मंत्री ने 1999-2000 के अपने बजट भाषण में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) में वाटरशेड विकास निधि (डब्ल्यूडीएफ) के सृजन की घोषणा की थी जिसका उद्देश्य मोटे तौर पर ग्राम स्तरीय संस्थाओं और परियोजना सहयोगी एजेंसियों (पीएफए) को साथ लेकर अनेक वाटरशेड विकास कार्यक्रमों का एकीकरण करके एकल पहल में बदलना है.

उक्त घोषणा के अनुसरण में नाबार्ड में डब्ल्यूडीएफ की स्थापना की गई जिसमें कृषि मंत्रालय, भारत सरकार और नाबार्ड में से प्रत्येक ने रु.100 करोड़ का अंशदान किया है.

अतिरिक्त जानकारी

इ. जनजातीय विकास निधि (टीडीएफ)

नाबार्ड फलोद्यान आधारित फार्मिंग प्रणालियों के माध्यम से आदिवासी विकास और संधारणीय आजीविका विकास के साथ निकटता से जुड़ा रहा है. संधारणीय आजीविका उपलब्ध कराने की नाबार्ड की प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन नीति के अनिवार्य घटक के रूप में नाबार्ड ने फलोद्यान लगाने को मूल में रखते हुए आदिवासी समुदायों के समग्रतामूलक विकास के लिए सहायता उपलब्ध कराने पर विशेष बल दिया.

आदिवासी विकास कार्यक्रमों की सफलता के अनुभव के आधार पर नाबार्ड ने पूरे देश में वाडी मॉडल को अपनाने का महत्वकांक्षी कार्यक्रम शुरू किया. इस दिशा में, नाबार्ड ने 2003-04 के अपने लाभ की राशि में से रु.50 करोड़ की समूह निधि से जनजातीय विकास निधि (टीडीएफ) सृजित की. इस समूह निधि की राशि समय-समय पर बढ़ाई जाती है. टीडीएफ के अंतर्गत सभी परियोजनाएँ राज्य सरकारों, भारत सरकार, गैर-सरकारी संगठनों और कंपनियों के साथ साझेदारी स्थापित कर चलाई जाती हैं.

अतिरिक्त जानकारी

ई. उत्पादक संगठन विकास निधि (पीओडीएफ)

लचीला दृष्टिकोण अपनाते हुए उत्पादकों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उत्पादक संगठनों (पीओ) के समर्थन के लिए नाबार्ड ने एक पहल की है. इस पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करने के लिए 01 अप्रैल 2011 से रु.50 करोड़ की आरंभिक समूह निधि से उत्पादक संगठन विकास निधि (पीओडीएफ) सृजित की गई.

पीओडीएफ के अंतर्गत निम्नानुसार सहयोग दिया जाता है:

  • एफपीओ को संवर्धन, क्षमता निर्माण और विपणन सहयोग के लिए ऋण से जुड़ी अनुदान सहायता उपलब्ध है.
  • विशेष अध्ययन कराने, हितधारकों की बैठक/ सम्मलेन, गोल मेज़ विमर्श के आयोजन, विद्यमान उत्पादक संगठनों के विशिष्ट क्षमता निर्माण, विपणन/ परिचालनात्मक दक्षता में सुधार के लिए आईसीटी सहयोग और उत्पादक संगठनों की संधारणीयता के लिए आवश्यक अन्य महत्वपूर्ण सहयोगों के लिए पात्र एजेंसियों को संस्थागत ऋण से जुड़ाव के बिना अनुदान सहायता उपलब्ध है.
अतिरिक्त जानकारी

उ. जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन वास्तविकता बन चुका है और सामने दिखाई देने लगा है – पूरी दुनिया में लोगों का जीवन इससे प्रभावित हो रहा है. यह खेती, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के लिए बड़ी चुनौती है. जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने मार्च 2014 में जारी अपनी पाँचवी रिपोर्ट में कहा है कि जलवायु परिवर्तन निर्धनों, हाशिये पर रह रहे और ग्रामीण समुदायों को सर्वाधिक कठोरता से प्रभावित करेगा. इन कमजोर समूहों के लिए जलवायु परिवर्तन “जोखिम को कई गुना बढ़ाने वाले कारक” के रूप में काम करता है और विद्यमान सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय दबावों को और बदतर बना देता है.

वैसे तो जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ने वाला है लेकिन भारत जैसे देशों पर ज्यादा असर पड़ने की सम्भावना है क्योंकि इन देशों की बहुत बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर करती है और कृषि अंततः मौसमी मानसून पर निर्भर है. भारत के सामने जलवायु परिवर्तन के बढ़ते वैश्विक खतरे के बीच तेज आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने की चुनौती है. भारत ने पहले ही वैश्विक जलवायु चुनौती से जूझने में सहयोग की प्रतिबद्धता दर्शाई है और भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चिंताओं के निवारण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है.

सरकार ने जून, 2008 में राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (एनएपीसीसी) तैयार की जिसके अंतर्गत अनुकूलन और शमन उपायों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन से शीघ्र प्रभावित हो जाने की कमजोरी को कम करने के लिए 8 राष्ट्रीय मिशनों का गठन किया गया. एनएपीसीसी के आधार पर राज्य सरकारों और संघराज्य क्षेत्रों ने राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (एसएपीसीसी) तैयार की है.

जलवायु परिवर्तन एक संश्लिष्ट नीतिगत मुद्दा है जिसके वित्तीय दृष्टि से बड़े निहितार्थ हैं. जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों को दूर करने के लिए जो भी कार्रवाई और समाधान अपेक्षित हैं उनमें अंततः आर्थिक लागत आनी है. विकासशील देशों में अनुकूलन और शमन परियोजनाओं की रूपरेखा तैयार करने और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए निधीयन सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू है.

नाबार्ड पहले ही जलवायु परिवर्तन के कारण सामने आई चुनौतियों, खास तौर पर कृषि और ग्रामीण आजीविका के क्षेत्र में आई चुनौतियों के निवारण की दिशा में विविध पहलें कर चुका है. नाबार्ड का लक्ष्य भारत में अनुकूलन और शमन गतिविधियों के लिए राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और निजी क्षेत्र से वित्तपोषण को चैनलाइज़ करना है. प्रत्यक्ष पहुँच वाली संस्था (डीएई)) और राष्ट्रीय कार्यान्वयक संस्था (एनआईई) के रूप में नाबार्ड पूरे देश में निम्नलिखित निधियों के अंतर्गत विभिन्न जलवायु परिवर्तन परियोजनाएँ कार्यान्वित कर रहा है.