Menu

विकासात्मक

कृषि क्षेत्र

कृषि क्षेत्र विकास विभाग (एफ़एसडीडी)
एफ़एसडीडी पूर्ववर्ती विकास नीति विभाग – कृषि क्षेत्र को बदलकर हाल ही में बनाया गया है. इस विभाग का मुख्य कार्य कृषि क्षेत्र के विविध प्रयासों का कार्यान्वयन है जिसका लक्ष्य प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन एवं संरक्षण, ग्रामीण वित्तीय संस्थाओं द्वारा आधार स्तरीय ऋण प्रवाह को बढ़ाना, वृद्धिशील कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता, ग्रामीण रोजगार का सृजन तथा ऋण एवं अनुदान सहायता के माध्यम से ग्रामीण गरीबों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना है.
 
समय समय पर बनाई गई विविध नीतियों के माध्यम से इन कार्यक्रमों के कार्यान्वयन की ज़िम्मेदारी इस विभाग पर है. कार्यक्रमों के कार्यान्वयन, अनुप्रवर्तन के दौरान उभरे परिचालनात्मक मुद्दों से निपटने और नीति तैयार करने / सुधार करने के लिए फीड बैक देने की ज़िम्मेदारी का कार्य विभाग पर सौंपा गया है. इस विभाग द्वारा किए जा रहे पोर्टफोलियो को चार वर्टिकल समूहों में बांटा गया है जिनका विवरण इस प्रकार है:-
 
विभाग के मुख्य कार्यक्षेत्र
 
A. किसान क्षेत्र संवर्धन निधि
 
नाबार्ड के परिचालन लाभ से वर्ष 2008 में कृषि प्रौद्योगिकी अंतरण निधि (एफ़टीटीएफ़) का सृजन प्रौद्योगिकी अंतरण और उसके प्रचार प्रसार के लिए किया गया था. इस निधि से किसानों को विभिन्न बेहतर सुविधाएं यथा तकनीकी, ऋण, विस्तार सेवाएं, विपणन सहायता प्रदान करने वाली एजेंसियों को सहायता प्रदान की जाती है. इसके साथ तकनीकी अपनाने, नवीनतम तकनीक पर प्रदर्शनी इकाइयां तैयार कर किसानों द्वारा पद्धतियों के पैकेज अपनाने के लिए सहायता प्रदान की जाती है.
01 अप्रैल 2014 की स्थिति के अनुसार, निधि के तहत कार्पस रु. 41 करोड़ था. 30.09.2014 की स्थिति के अनुसार एफ़टीटीएफ़ के अंतर्गत रु. 13.44 करोड़ का संवितरण किया गया और इस प्रकार संचयी संवितरण रु. 187.89 करोड़ हो गया है.
 
B. उत्पादक संगठन विकास निधि (पीओडीएफ़)
 
लचीला दृष्टिकोण अपनाकर उत्पादकों की जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादक संगठनों की सहायता करना नाबार्ड की एक पहल थी. उत्पादक संगठनों पर विशेष ध्यान देने के क्रम में 01 अप्रैल 2011 में रु. 50 करोड़ की प्रारंभिक निधि से उत्पादक संगठन विकास निधि (पीओडीएफ़) का सृजन किया गया.
 
उत्पादकों द्वारा गठित ऐसे सभी पंजीकृत उत्पादक संगठन यथा उत्पादक कंपनी (कंपनी अधिनियम 1956 के भाग IXA की धारा 581ए के अंतर्गत यथा परिभाषित), उत्पादक सहकारिताएं, पंजीकृत कृषक संघ, परस्पर सहायता प्राप्त सहकारी समितियां (एमएसीएस), उद्योग संबंधी सहकारी समितियां, अन्य पंजीकृत संघ, प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (पीएसीएस) इत्यादि निधि के तहत पात्र होंगे. पीओडीएफ़ के अंतर्गत सहायता निम्नवत प्रदान की जाएगी:
 
  •  वित्तीय सहायता के लिए ऋण प्रदान किया जाता है. सहायता अनुदान, ऋण के रूप में अथवा इन दोनों के मिश्रण के रूप में भी क्षमता निर्माण और विपणन सहायता के लिए उपलब्ध करायी जाती है.
  • यद्यपि अधिकांश उत्पादक संगठनों का पूंजी आधार कम है इस कारण शेयर पूंजी में योगदान के लिए उत्पादक संगठनों को पीओडीएफ़ के अंतर्गत नाबार्ड से सहायता की संभावनाएं अधिक है.
आदिवासी विकास कार्यक्रम
 
नाबार्ड, आदिवासी विकास और बगानों पर आधारित कृषि व्यवस्था के माध्यम से दीर्घकालिक आजीविका के साथ सहबद्ध है. दीर्घकालिक आजीविका प्रदान करने के लिए नाबार्ड के प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (एनआरएम) नीति के अभिन्न घटक के रूप में, नाबार्ड फलोद्द्यान स्थापना के साथ आदिवासी समुदाय के समग्र विकास के लिए सहायता प्रदान करने पर विशेष बल देता है.
आदिवासी विकास कार्यक्रमों की सफलता को देखते हुए नाबार्ड ने इस महत्वाकांक्षी वाडी मॉडल को पूरे भारत में लागू किया. इस दिशा में, नाबार्ड ने 2003-04 के लाभ में से रु. 50 करोड़ के आरंभिक निधि से आदिवासी विकास निधि (टीडीएफ़) का गठन किया. समय - समय पर इस निधि में बढ़ोत्तरी होती है. टीडीएफ़ के अंतर्गत सभी परियोजनाओं का कार्यान्वयन राज्य सरकार, भारत सरकार, एनजीओ और कार्पोरेट्स के साथ मिलकर किया जाता है.
 
वाटरशेड विकास कार्यक्रम
 
केंद्रीय वित्त मंत्री जी ने 1999-2000 के बजट में ग्रामीण स्तर के संस्थानों और पीएफ़ए के साथ जुड़कर बहुउद्देशीय वाटरशेड विकास कार्यक्रमों को एक राष्ट्रीय पहल के रूप में एकीकृत करने के व्यापक उद्देश्य के साथ राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक में वाटरशेड विकास निधि के सृजन की घोषणा की थी.
 
उपर्युक्त के अनुसरण में कृषि मंत्रालय, भारत सरकार (जीओआई) और नाबार्ड दोनों पक्षों द्वारा रु 100 - 100 करोड़ के अंशदान से नाबार्ड में डबल्यूडीएफ़ का सृजन किया गया. 
 
अतिरिक्त जानकारी
 
A. कृषि क्षेत्र संवर्धन निधि
 
B. उत्पादक संगठन विकास निधि (पीओडीएफ़)
 
C. आदिवासी विकास कार्यक्रम